विशेष
नेताओं ने लगाया नगर निकायों में अपना कुनबा बढ़ाने का जुगाड़
दलों ने दूरगामी रणनीति के तहत नेताओं के परिजनों पर लगाया दांव
लेकिन इससे समर्पित कार्यकर्ता खुद को उपेक्षित महसूस करने लगे हैं
नमस्कार। आजाद सिपाही विशेष में आपका स्वागत है। मैं हूं राकेश सिंह।
भारत की सियासत में परिवारवाद-वंशवाद को लेकर अक्सर बहस शुरू होती है और इसकी परिणति कुछ नामचीन और बड़े राजनीतिक परिवारों की आलोचना के साथ खत्म हो जाती है। झारखंड में इस बार यह बहस थोड़ी तीखी हो गयी है, क्योंकि राज्य में नगर निकाय चुनाव हो रहे हैं। इस चुनाव के लिए नाम वापस लेने का समय खत्म हो चुका है और चुनावी मुकाबले की तस्वीर लगभग साफ हो चुकी है। कहने को तो ये चुनाव गैर-दलीय आधार पर हो रहे हैं, लेकिन इसमें राजनीतिक दल पर्दे के पीछे से अपनी पूरी ताकत लगा रहे हैं। राज्य के नगर निकायों में जिस तरह से बड़े नेताओं के परिजन मैदान में उतरे हैं और उन्हें बड़े राजनीतिक दलों ने समर्थन की घोषणा की है, उससे साफ हो जाता है कि इस चुनाव में वंशवाद और परिवारवाद की बेल बड़ी तेजी से फलेगी-फूलेगी। कहीं विधायक के पति, तो कहीं पूर्व विधायक की पत्नी, बेटी या बहू, कहीं सांसद के पुत्र और कहीं बड़े नेताओं के भाई-भतीजे निकाय चुनाव में उतर कर इसे रोमांचक बना तो रहे हैं, लेकिन पार्टी के समर्पित कार्यकर्ता खुद को उपेक्षित महसूस करने लगे हैं। निकाय चुनाव में नेताओं के परिजनों-रिश्तेदारों को समर्थन देने के बाद पार्टी कार्यकतार्ओं के भीतर यह चर्चा होने लगी है कि जब किसी भी चुनाव में उन्हें अवसर नहीं दिया जायेगा, तो फिर वे पार्टी का झंडा क्यों और कब तक उठाते रहेंगे। समर्पित कार्यकतार्ओं के भीतर इस तरह की भावना का पैदा होना राजनीतिक दलों के लिए खतरे का संकेत तो है ही, नयी राजनीतिक पौध के विकास के रास्ते में बड़ी बाधा भी है। झारखंड के निकाय चुनाव में वंशवाद और परिवारवाद के इस पहलू पर शायद किसी का ध्यान नहीं गया है। क्या है निकाय चुनाव में परिवारवाद और वंशवाद का परिदृश्य और क्या हो सकता है इसका राजनीतिक असर, बता रहे हैं आजाद सिपाही के संपादक राकेश सिंह।
झारखंड में नगर निकाय चुनाव भले ही दलीय आधार पर नहीं हो रहा है, लेकिन नाम वापस लेने की समयावधि खत्म होते ही इस चुनावी मुकाबले की असली तस्वीर सामने आ गयी है। यह चुनाव परिवारवाद और वंशवाद की नर्सरी बनती दिख रही है। सांसद-विधायक और पूर्व मंत्रियों के बेटे-बेटी, पति-पत्नी और भाई-भतीजे चुनावी मैदान में ताल ठोंक रहे हैं। नतीजा यह हुआ है कि वर्षों से पार्टी संगठन में पसीना बहाने वाले जमीनी कार्यकर्ता हाशिये पर धकेल दिये गये हैं।
फिर चर्चा के केंद्र में परिवारवाद
चुनावी मैदान में उतरे कई प्रत्याशियों की राजनीतिक पहचान सीधे तौर पर बड़े दलों और दिग्गज नेताओं से जुड़ी हुई है। इस बार शहरी सरकार की कमान संभालने की होड़ में दो पूर्व मंत्रियों की पत्नी और बेटी के साथ एक मौजूदा विधायक के पति उतर चुके हैं। एक सांसद के पुत्र और दो विधायकों के भाई के अलावा एक विधायक की जेठानी भी मैदान में हैं। ऐसे में परिवारवाद का मुद्दा एक बार फिर राज्य की राजनीति में चर्चा के केंद्र में आ गया है।
नेताओं के परिजनों ने चुनाव को रोचक बनाया
निकाय चुनाव में नामांकन दाखिल करने के दौरान पूरे राज्य में उम्मीदवारों की भीड़ दिखी, लेकिन इस भीड़ में सबसे ज्यादा दम-खम बड़े नेताओं के परिजनों का नजर आया। अब नाम वापस लिये जाने के बाद नेताओं के वंशवाद का खेल असली रंग में सामने नजर आने लगा है। गैर-दलीय चुनाव होने के बावजूद नेताओं के परिजन उम्मीदवारों को राजनीतिक दलों का मौन समर्थन मिल रहा है। कहीं प्रचार की पूरी टीम पार्टी की है, तो कहीं संसाधन और रणनीति पहले से तय नजर आ रही है। नाम वापस लिये जाने के बाद ऐसे कई चेहरे सामने आये, जो बड़े नेताओं के रिश्तेदार हैं और निकाय चुनाव में भाग्य आजमा रहे हैं।
किन नेताओं के रिश्तेदार हैं मैदान में
शुरूआत राजधानी रांची से करते हैं। राज्यसभा सांसद डॉ महुआ माजी के पुत्र सोमवित माजी ने रांची नगर निगम के वार्ड 18 से नामांकन दाखिल किया है। चुनाव की घोषणा से पहले से ही वह अपना प्रचार शुरू कर चुके थे। पूरे वार्ड में उनके पोस्टर दिखने लगे थे। सोमवित को डिप्टी मेयर का दावेदार भी माना जा रहा है, क्योंकि इस बार डिप्टी मेयर का चुनाव अप्रत्यक्ष होगा, यानी पार्षद ही डिप्टी मेयर का चुनाव करेंगे। मेदिनीनगर नगर निगम की मेयर के लिए पूर्व मंत्री केएन त्रिपाठी की बेटी नम्रता त्रिपाठी ने नामांकन किया है। उन्हें कांग्रेस का समर्थन हासिल है। आदित्यपुर नगर निगम में वार्ड 18 से पूर्व भाजपा विधायक अरविंद सिंह के भतीजे अंकुश सिंह ने वार्ड सदस्य के लिए नामांकन दाखिल किया है। उनके प्रचार अभियान की पूरी जिम्मेवारी मंडल भाजपा निभा रही है। इसी तरह धनबाद नगर निगम के मेयर पद के लिए झरिया की भाजपा विधायक रागिनी सिंह के पति संजीव सिंह ने नामाकन किया है। दिलचस्प यह है कि संजीव सिंह की मौसी इंदू देवी भी यहां से मैदान में हैं। चास नगर निगम में भी पूर्व मंत्री स्व समरेश सिंह की बड़ी बहू डॉ परिंदा सिंह भी मेयर पद के लिए चुनाव मैदान में हैं। वह बोकारो की कांग्रेस विधायक श्वेता सिंह की जेठानी भी हैं। जामताड़ा नगर पंचायक में अध्यक्ष पद के लिए झामुमो के पूर्व विधायक स्व विष्णु प्रसाद भैया की पत्नी चमेली देवी मैदान में हैं। मानगो नगर निगम की मेयर के लिए झारखंड के पूर्व स्वास्थ्य मंत्री बन्ना गुप्ता की पत्नी सुधा गुप्ता मैदान में हैं। उन्हें कांग्रेस ने समर्थन दिया है। इसी तरह चक्रधरपुर नगर परिषद के अध्यक्ष पद के लिए झामुमो विधायक सुखराम उरांव के बेटे सन्नी उरांव मैदान में हैं, जबकि यहां से खरसावां विधायक दशरथ गगरई के छोटे भाई डॉ विजय गगरई और पश्चिम सिंहभूम के पूर्व सांसद स्व विजय सिंह सोय की बेटी अनुप्रिया सोय भी दावेदार हैं।
क्या है परिवारवाद के पीछे की रणनीति
यहां सवाल उठता है कि आखिर परिवारवाद और वंशवाद पर बार-बार की बहस के बावजूद राजनीतिक दल अपने नेताओं के परिजनों-रिश्तेदारों का समर्थन क्यों कर रहे हैं। दरअसल गैर-दलीय चुनाव में नगर निकायों पर प्रभुत्व कायम करने की राजनीतिक दलों की रणनीति का यह एक हिस्सा है। नगर निकायों पर कब्जा करने के पीछे कहीं न कहीं विधानसभा और लोकसभा चुनाव ही होता है। नगर निकाय चुनाव में किसी की उम्मीदवारी को केवल एक व्यक्तिगत राजनीतिक कदम नहीं, बल्कि राजनीतिक दलों की रणनीतिक चाल के रूप में देखा जा सकता है। इसे राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने और इलाके में संगठनात्मक पकड़ मजबूत करने का प्रयास माना जा रहा है।
क्या है कांग्रेस की रणनीति
मानगो में पूर्व मंत्री बन्ना गुप्ता की पत्नी सुधा गुप्ता को मेयर पद के लिए समर्थन देकर कांग्रेस ने कोल्हान क्षेत्र में अपनी कमजोर होती पकड़ को बन्ना गुप्ता के राजनीतिक प्रभाव और नेटवर्क के सहारे मजबूत करना चाहती है। उधर मेदिनीनगर नगर निगम से कांग्रेस ने पूर्व मंत्री केएन त्रिपाठी की बेटी नम्रता त्रिपाठी को समर्थन देकर पार्टी ने पारंपरिक वोट बैंक को साधने के साथ साथ-साथ युवा मतदाताओं को आकर्षित करने की कोशिश की है। केएन त्रिपाठी लंबे समय तक पलामू की राजनीति में प्रभावशाली भूमिका निभाते रहे हैं. वर्ष 2009 में उन्होंने डालटनगंज विधानसभा सीट से जीत दर्ज कर विधायक बनने के बाद ग्रामीण विकास मंत्री का पद संभाला था। पार्टी को उम्मीद है कि युवा नेतृत्व और पारिवारिक पहचान का संयोजन चुनावी समीकरण को उनके पक्ष में मोड़ सकता है। कांग्रेस का मानना है कि शहरी मतदाता अब अनुभव के साथ-साथ नयी सोच और ऊर्जा को भी महत्व दे रहे हैं।
भाजपा भी वंशवाद में पीछे नहीं
निकाय चुनाव में वंशवाद और परिवारवाद के खेल में भाजपा भी बहुत पीछे नहीं है। धनबाद नगर निगम में मेयर पद के लिए उसने झरिया विधायक रागिनी सिंह के पति और पूर्व विधायक संजीव सिंह को समर्थन दिया है। संजीव सिंह झरिया क्षेत्र में लंबे समय तक प्रभावशाली नेता रहे हैं और संगठन में उनकी मजबूत पकड़ मानी जाती है। वर्ष 2014 में वे झरिया विधानसभा से चुनाव जीतकर विधायक बने थे। भाजपा में संजीव सिंह की उम्मीदवारी को संगठनात्मक मजबूती का प्रतीक माना जा रहा है। पार्टी के रणनीतिकारों का मानना है कि धनबाद जैसे औद्योगिक और शहरी क्षेत्र में अनुभवी नेतृत्व मतदाताओं को आकर्षित कर सकता है।
परिवारवाद बनाम अनुभव की बहस
नगर निकाय चुनावों में नेताओं के परिजनों की बढ़ती भागीदारी ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या गैर-दलीय चुनाव वास्तव में राजनीति से मुक्त रह पाते हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि भले ही चुनाव चिन्ह पार्टी के न हों, लेकिन उम्मीदवारों की पहचान, संसाधन और जनसंपर्क पूरी तरह से दलीय ढांचे से जुड़े रहते हैं। ऐसे में परिवारवाद और अनुभव के बीच की बहस और गहरी होती जा रही है।



