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    Home»स्पेशल रिपोर्ट»कोरोना लॉकडाउन के मारे हजारों नाप रहे सड़क
    स्पेशल रिपोर्ट

    कोरोना लॉकडाउन के मारे हजारों नाप रहे सड़क

    azad sipahiBy azad sipahiMarch 29, 2020No Comments5 Mins Read
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    कोरोना को लेकर देशव्यापी लॉकडाउन का आज चौथा दिन है। देश में एक तरफ जहां संक्रमित लोगों की संख्या बढ़ रही है, वहीं मरनेवालों का आंकड़ा भी बढ़ रहा है। देश में आवागमन के तमाम साधन बंद हैं, लेकिन दिल्ली और मुंबई से बाहर निकलनेवाली सड़कों पर भारी भीड़ है। जो सूचनाएं आ रही हैं, उनके अनुसार करीब डेढ़ लाख लोग इन सड़कों पर हैं और लगातार यूपी, बिहार और झारखंड में अपने घरों की ओर लौट रहे हैं। इनके पास न कोई वाहन है और न कोई सुविधा। सुनहरे भविष्य का सपना लेकर महानगर गये लोगों की रोजी-रोटी और घर-बार, सब कुछ कोरोना ने छीन लिया है। इसलिए इनके सामने अपने गांव लौटने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है। इन्हें न कोई मदद मिल रही है और न ही कोई राहत। ये मजबूर लोग कह रहे हैं कि वायरस तो बाद में मारेगा, पहले भूख हमारी जान ले लेगी। राज्य सरकारें इन्हें यथासंभव मदद पहुंचा रही हैं, लेकिन अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। लॉकडाउन का असली असर इन लोगों पर ही पड़ा है। ऐसे लोगों की पीड़ा को रेखांकित करती आजाद सिपाही ब्यूरो की रिपोर्ट।
    मंगलवार 24 मार्च को जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैश्विक महामारी कोरोना के संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए देशव्यापी लॉकडाउन का एलान किया, शायद किसी को अंदाजा नहीं था कि इसका वास्तविक असर क्या होगा।
    लेकिन प्रधानमंत्री को इसका अंदाजा था और इसलिए उन्होंने अपने संबोधन में साफ कहा कि जो जहां है, अगले 21 दिन तक वहीं रहे। प्रधानमंत्री की अपील का कोई विशेष असर नहीं हुआ और लाखों लोग महानगरों से यूपी, बिहार और झारखंड में अपने गांव की ओर लौटने को बेताब हो गये। उन्हें बार-बार समझाया गया कि ऐसा करना उनके गांव के लिए, राज्य के लिए खतरनाक हो सकता है, लेकिन मुख्य रूप से निम्न वर्ग और निम्न मध्य वर्ग के ये लोग पैदल ही महानगरों से निकल पड़े। आज लॉकडाउन के चौथे दिन यह सूचना मिल रही है कि करीब डेढ़ लाख लोग सड़कोें पर लगातार पैदल चल रहे हैं। कुछ लोग तो साइकिल या रिक्शा-ठेला से भी गांव पहुंच रहे हैं।
    बेसहारा हो चुके इन लोगों को रोकने के तमाम प्रयास नाकाफी साबित हो रहे हैं। हालांकि राज्य सरकारें लगातार इस कोशिश में जुटी हैं कि बाहरी लोगों को कोई तकलीफ न हो और उनके खाने-पीने या रहने की समुचित व्यवस्था की जाये। झारखंड सरकार ने अपने यहां फंसे बाहर के लोगों की सुख-सुविधा के लिए पूरी व्यवस्था कर रखी है, लेकिन अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। झारखंड सरकार के प्रयास की इसलिए भी तारीफ होनी चाहिए, क्योंकि इसने अधिकारियों की एक टास्कफोर्स ही बना दी, जिसमें अलग-अलग राज्यों में फंसे झारखंडी को मदद पहुंचाने के लिए अलग-अलग अधिकारी नियुक्त किये गये। यह टास्कफोर्स अपना काम बखूबी कर रही है, लेकिन यह काम उतना आसान भी नहीं है। संकट के इस दौर में सरकार और खास कर कार्यपालिका अत्यधिक दबाव में रहती है। ऐसे में दूसरे राज्यों से लगातार समन्वय स्थापित करना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं हो सकता। तब प्रभावित पक्ष में असंतोष और क्षोभ पैदा होता है, जिससे बेवजह विवाद होता है।
    इस संकट का एक सामाजिक पहलू भी है। जो लोग पैदल अपने देस के लिए निकले हुए हैं, यहां उनके परिजन भी सरकार पर दबाव बना रहे हैं कि उनकी मदद की जाये। ऐसा करते समय लोग भूल जाते हैं कि बाहर फंसे लोगों की मदद करने में सरकार की भूमिका सीमित हो सकती है, क्योंकि जिस प्रदेश में ये फंसे हैं, वहां की स्थानीय आबादी को मदद देना वहां की सरकार की पहली जिम्मेदारी है। इस जिम्मेदारी को पूरा करते-करते संसाधन कम पड़ जाते हैं और बाहरी लोगों को समुचित मदद नहीं मिल पाती।
    लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है कि इन बेसहारा-बेघर लोगों को उनकी नियति पर छोड़ दिया जाये। इनको पूरी मदद मिलनी ही चाहिए और जब ये लोग देस लौटने के लिए निकल ही पड़े हैं, तो इनका समुचित समाधान निकालना ही चाहिए। ठीक वैसे ही, जैसे हमने दूसरे देशों में फंसे अपने लोगों को लाने के लिए विमान भेजा। यूपी सरकार ने अगले दो दिन में इन लोगों को उनके गंतव्य तक पहुंचाने के लिए एक हजार बसें चलाने का फैसला किया है। बिहार और झारखंड को अब आगे आना चाहिए। खास कर झारखंड को इस काम में अत्यधिक सतर्कता बरतने की जरूरत है, क्योंकि यह प्रदेश अब तक कोरोना के संक्रमण से अछूता है। बाहर से यहां आनेवाले हर व्यक्ति की सघन स्क्रीनिंग होनी चाहिए। झारखंड सरकार ने स्क्रीनिंग की व्यवस्था तो की है, लेकिन लोग ही जागरूकता की कमी के कारण जांच कराने से कतरा रहे हैं। ऐसे लोगों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी।
    झारखंड सरकार ने अब तक कोरोना से बचाव के लिए जो काम किया है या जो कदम उठाये हैं, उनके सकारात्मक परिणाम तो मिले हैं, लेकिन बाहर से आ रहे इन अपने लोगों की मदद करने की बड़ी चुनौती अब सामने आनेवाली है। इस चुनौती से राज्य सरकार को कुछ इस तरह निपटना होगा, ताकि लोगों को दिक्कत भी नहीं हो और राज्य को संक्रमण से भी बचा लिया जाये। इस पहाड़ सी चुनौती और दोधारी तलवार पर झारखंड कैसे और कितनी दूर चलता है, यह देखनेवाली बात होगी। और यकीन मानिए, यदि इस चुनौती का सामना हमने सफलतापूर्वक कर लिया, तो फिर वैश्विक महामारी के इस संकट को हम पराजित करके रहेंगे। लेकिन इसके लिए जरूरी है आत्म संयम, आत्मविश्वास और एकजुट होकर सरकार के कंधे से कंधा मिला कर काम करने की। हमारे जो अपने बाहर से आ रहे हैं, उनकी पूरी जांच करायें और डॉक्टरों के निर्देशों का अनुपालन करें, ताकि बाहर से आये हमारे अपने भी सुरक्षित रहें और झारखंड भी सुरक्षित रह जाये। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन इस बारे में जरूर कुछ रणनीति बना रहे हैं। हमें उनकी घोषणा का इंतजार करना चाहिए, क्योंकि झारखंड के लोगों का दर्द वह जानते-समझते हैं।

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