आजाद सिपाही संवाददाता
रांची। झारखंड विधानसभा में बजट सत्र के दौरान पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा विधायक दल के नेता बाबूलाल मरांडी ने हेमंत सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि नियोजन नीति के मुद्दे पर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के चेहरे पर लगा नकाब पूरी तरह से उतर गया है। विधानसभा परिसर में मीडियाकर्मियों से बात करते हुए बाबूलाल मरांडी ने कहा कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, जो झारखंड के हितैषी होने का दंभ भरते थे, पूरी तरह से साफ हो गया है कि राज्य का हितैषी कौन है। जनता सब जान चुकी है। बाबूलाल मरांडी ने पूर्ववर्ती रघुवर सरकार के द्वारा 2016 में बनायी गयी नियोजन नीति की सराहना करते हुए कहा कि अगले 10 वर्षों के लिए तृतीय और चतुर्थ वर्गों की नौकरी को स्थानीय लोगों के लिए रिजर्व कर दिया गया था। लेकिन हेमंत सोरेन की सरकार ने आते ही उसे खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि अब तो झारखंड की जनता खुद ही उस पर विचार करेगी कि यहां के नौजवानों के हितों के लिए कौन सी सरकार हितैषी रही है। जो सरकार बार- बार दावा कर रही थी कि 1932 और इसके लिए यात्राएं निकाल रही थीं और अब उनके पास कुछ भी कहने के लिए नहीं है। अब साफ हो गया है कि रघुवर सरकार के फैसले राज्य की जनता के लिए उचित थे। 1985 स्थानीयता का मापदंड बनाया गया था और झारखंड के नौजवानों के लिए सरकारी नौकरी के लिए 10 वर्षों के लिए आरक्षित किया गया था। उसे यदि चाहते तो हेमंत सोरेन अगले 10 वर्षों के लिए आरक्षित कर सकते थे, लेकिन उसे पूरी तरह से समाप्त करके उन्होंने कुछ भी नहीं किया। अब झारखंड की जनता देख रही है कि वर्तमान सरकार ने क्या किया। वर्तमान सरकार नियोजन नीति के मुद्दे पर राजनीतिक खेल ही खेलने में लगी रही और राज्य के नौजवानों के साथ छल करने का काम करती रही।
ओबीसी विरोधी है हेमंत सरकार
बाबूलाल मरांडी ने सरकार को ओबीसी विरोधी बताते हुए कहा कि यह सरकार चाहती नहीं है कि पिछड़ों को वाजिब हक मिले। गलत नियोजन नीति के कारण राज्य सरकार की नियोजन नीति हाइकोर्ट में खारिज होती रही। याद करिए, जब हमारी सरकार थी और हमने आरक्षण का दायरा 73 प्रतिशत करने का निर्णय लिया, तो हाइकोर्ट में यह कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट में तमिलनाडु का एक मामला चल रहा है, वह फैसला आने के बाद सरकार इस पर निर्णय लेगी। रघुवर सरकार ने बाद में ओबीसी आरक्षण को लेकर सर्वे कराने का काम शुरू ही किया था कि उनकी सरकार चली गयी। कायदे से हेमंत सोरेन को एक आयोग गठित कर ट्रिपल टेस्ट के जरिए एक बार सर्वे कराना चाहिए। उसके बाद ओबीसी की आबादी को ध्यान में रख कर रिजर्वेशन की पॉलिसी बनायी जानी चाहिए।