Close Menu
Azad SipahiAzad Sipahi
    Facebook X (Twitter) YouTube WhatsApp
    Sunday, May 31
    • Jharkhand Top News
    • Azad Sipahi Digital
    • रांची
    • हाई-टेक्नो
      • विज्ञान
      • गैजेट्स
      • मोबाइल
      • ऑटोमुविट
    • राज्य
      • झारखंड
      • बिहार
      • उत्तर प्रदेश
    • रोचक पोस्ट
    • स्पेशल रिपोर्ट
    • e-Paper
    • Top Story
    • DMCA
    Facebook X (Twitter) Instagram
    Azad SipahiAzad Sipahi
    • होम
    • झारखंड
      • कोडरमा
      • खलारी
      • खूंटी
      • गढ़वा
      • गिरिडीह
      • गुमला
      • गोड्डा
      • चतरा
      • चाईबासा
      • जमशेदपुर
      • जामताड़ा
      • दुमका
      • देवघर
      • धनबाद
      • पलामू
      • पाकुर
      • बोकारो
      • रांची
      • रामगढ़
      • लातेहार
      • लोहरदगा
      • सरायकेला-खरसावाँ
      • साहिबगंज
      • सिमडेगा
      • हजारीबाग
    • विशेष
    • बिहार
    • उत्तर प्रदेश
    • देश
    • दुनिया
    • राजनीति
    • राज्य
      • मध्य प्रदेश
    • स्पोर्ट्स
      • हॉकी
      • क्रिकेट
      • टेनिस
      • फुटबॉल
      • अन्य खेल
    • YouTube
    • ई-पेपर
    Azad SipahiAzad Sipahi
    Home»स्पेशल रिपोर्ट»‘परिवार’ की छाया से मुक्त क्यों नहीं हो पा रही है कांग्रेस
    स्पेशल रिपोर्ट

    ‘परिवार’ की छाया से मुक्त क्यों नहीं हो पा रही है कांग्रेस

    adminBy adminMarch 12, 2023No Comments7 Mins Read
    Facebook Twitter WhatsApp Telegram Pinterest LinkedIn Tumblr Email
    Share
    Facebook Twitter WhatsApp Telegram LinkedIn Pinterest Email

    विशेष
    -यही हाल रहा, तो 2024 की राह हो जायेगी और भी कठिन

    देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी और करीब साढ़े छह दशक तक देश की सत्ता पर एकछत्र शासन करनेवाली कांग्रेस वाकई अपने इतिहास के सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। पार्टी ने पिछले साल बड़े तामझाम के साथ नये अध्यक्ष का चुनाव कर आंतरिक लोकतंत्र का स्वर मजबूत किया, लेकिन राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा और फिर पिछले महीने रायपुर में पार्टी के महाधिवेशन में लिये गये फैसलों से साफ पता चलता है कि पार्टी अब भी ‘परिवार’ की छाया से पूरी तरह मुक्त नहीं हो सकी है। कांग्रेस का हर फैसला अब भी उस ‘परिवार’ की मर्जी से लिया जाता है या यों कहा जाये कि पार्टी के हर फैसले के पीछे ‘परिवार’ की इच्छा होती है। अपने इतिहास के सबसे बुरे दौर से गुजर रही किसी पार्टी के लिए इससे बुरा कुछ भी नहीं हो सकता है। मल्लिकार्जुन खड़गे के अध्यक्ष बनने, भारत जोड़ो यात्रा और रायपुर अधिवेशन के बाद लगा था कि कांग्रेस अब खुद को बदल रही है, लेकिन यात्रा और महाधिवेशन को एक साथ देखा जाये, तो ऐसा कुछ भी नजर नहीं आता है। कांग्रेस को समझना होगा कि राजनीति के इस आक्रामक दौर में उसे भी रक्षात्मक रुख छोड़ कर सामने आना होगा। लेकिन खड़गे का अब तक का कामकाज साबित करता है कि वह अपनी मर्जी से कुछ भी नहीं कर सकते हैं। उन्हें अपने हर फैसले के लिए उस ‘परिवार’ पर निर्भर रहना पड़ रहा है। इससे और तो कुछ नहीं हो रहा, केवल कांग्रेस के लिए 2024 की राह कठिन होती जा रही है। कांग्रेस की इस हालत का विश्लेषण कर रहे हैं आजाद सिपाही के विशेष संवाददाता राकेश सिंह।

    कांग्रेस नेता राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा और कांग्रेस के नया रायपुर महाधिवेशन को जोड़ कर देखें, तो लगता है कि विचारधारा, संगठन और चुनावी रणनीति की दृष्टि से पार्टी कुछ नया नहीं गढ़ना चाहती। वह ‘राहुल गांधी सिद्धांत’ पर चल रही है, जो 2019 के चुनाव के पहले तय हुआ था। पार्टी के कार्यक्रमों पर नजर डालें, तो वे 2019 के घोषणापत्र के ‘न्याय’ कार्यक्रम की कार्बन कॉपी हैं। इसमें न्यूनतम आय और स्वास्थ्य के सार्वभौमिक अधिकार को भी शामिल किया गया है। तब और अब में फर्क केवल इतना है कि पार्टी अध्यक्ष अब मल्लिकार्जुन खड़गे हैं, जिनकी अपनी कोई लाइन नहीं है। संयोग से परिणाम वैसे नहीं आये, जिनका दावा किया जा रहा है, तो जिम्मेदारी खड़गे ले ही लेंगे।
    कांग्रेस के कार्यक्रमों पर नजर डालें, तो दिखाई पड़ेगा कि पार्टी ने भाजपा के कार्यक्रमों की तर्ज पर ही अपने कार्यक्रम बनाये हैं। इसमें कोई नयापन नहीं है। इस महाधिवेशन से दो-तीन बातें और स्पष्ट हुई हैं। कांग्रेस अब सोनिया गांधी से बाद की राहुल-प्रियंका पीढ़ी के पूरे नियंत्रण में है। अधिवेशन में जो भी फैसले हुए, वे परिवार की मर्जी को व्यक्त करते हैं। पार्टी में पिछली पीढ़ी के ज्यादातर नेता या तो किनारे कर दिये गये हैं या राहुल के शरणागत हो गये हैं। जी-23 जैसे ग्रुप का दबाव खत्म है।
    दूसरी तरफ राहुल-सिद्धांत की विसंगतियां कायम हैं। राहुल ने खुद को ‘सत्याग्रही’ और भाजपा को ‘सत्ताग्रही’ बताया। नौ साल सत्ता से बाहर रहना उनकी व्यथा है। दूसरी तरफ पार्टी का अहंकार बढ़ा है। वह विरोधी दलों से कह रही है कि हमारे साथ आना है, तो हमारे नेतृत्व को स्वीकार करो। बगैर किसी चुनावी सफलता के उसका ऐसा मान लेना आश्चर्यजनक है। सवाल है कि गुजरात में मिली जबरदस्त हार के बावजूद पार्टी के गौरव गान के पीछे कोई कारण है या सब कुछ हवा-हवाई है? पार्टी मान कर चल रही है कि राहुल गांधी का कद बढ़ा है। उनकी भारत जोड़ो यात्रा ने चमत्कार कर दिया है। छोटे से लेकर बड़े नेताओं तक ने ‘भारत जोड़ो’ का जैसा यशोगान किया, वह रोचक है।

    यात्रा की राजनीति
    हालांकि यात्रा को पार्टी के कार्यक्रम के रूप में शुरू नहीं किया गया था और उसे राजनीतिक कार्यक्रम बताया भी नहीं गया था, पर पार्टी यह भी मानती है कि इस यात्रा ने उसमें ‘प्राण फूंक दिये हैं’ और अब ऐसे ही कार्यक्रम और चलाये जायेंगे, ताकि राहुल गांधी के ही शब्दों में उनकी ‘तपस्या’ के कारण पैदा हुआ उत्साह भंग न होने पाये। तपस्या बंद नहीं होनी चाहिए।
    बहरहाल ‘यात्रा की राजनीति’ ही अब कांग्रेस की रणनीति है। उनकी समझ से भाजपा के राष्ट्रवाद का जवाब भी यही है। भाजपा पर हमला करने के लिए कांग्रेस ने वर्तमान चीनी घुसपैठ के राजनीतिकरण और 1962 में चीनी आक्रमण के दौरान तैयार हुई राष्ट्रीय चेतना का श्रेय लेने की रणनीति तैयार की है। नरेंद्र मोदी के मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत जैसे कार्यक्रमों की देखा-देखी अधिवेशन में पारित एक प्रस्ताव में कहा गया है कि देश के उत्पादों को बढ़ावा देने का समय आ गया है। इसके लिए मझोले और छोटे उद्योगों, छोटे कारोबारियों को संरक्षण देने तथा जीएसटी को सरल बनाने की जरूरत है।

    राहुल का चेहरा
    लगता है, राहुल गांधी अपनी वामपंथी छवि बनाना चाहते हैं। विरोधी दलों की एकता से जुड़े प्रस्ताव में सेकुलर और सोशलिस्ट पार्टियों की एकता शब्द का इस्तेमाल किया गया है। खड़गे ने दावा किया है कि कांग्रेस 2024 के लिए एक विजन दस्तावेज तैयार करेगी। चुनाव राहुल गांधी के नेतृत्व में लड़ा जायेगा। उन्हें प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित करने या नहीं करने का अब कोई मतलब नहीं है। अध्यक्ष कोई भी हो, कमान परिवार के हाथ में होगी। एक तस्वीर सामने आयी है, जिसमें मंच पर खड़गे और कुछ अन्य नेता खड़े हैं। धूप से बचाने के लिए छतरी केवल सोनिया गांधी के ऊपर तनी है। छत्र के इस प्रतीक को आप इस रूप में देख सकते हैं। अधिवेशन में जो बातें उभर कर आयी हैं, उनमें पार्टी के लोकसभा चुनाव में पूरी ताकत से लड़ने, भाजपा को परास्त करने की हरसंभव कोशिश करने, सामाजिक न्याय को महत्व देने, युवाओं को आगे लाने और समान विचारों वाले विरोधी दलों को एकजुट करने जैसी बातें शामिल हैं। बार-बार दोहरायी जाने वाली इन बातों के मुकाबले तत्व की बातें दो हैं। नरेंद्र मोदी पर सीधे हमले जारी रहेंगे। इसके अलावा सीबीआइ तथा इडी के दुरुपयोग के आरोपों को धार दी जायेगी।

    चुनाव नहीं, मनोनयन
    पिछले साल से पार्टी की दो प्रवृत्तियां साफ दिखाई पड़ रही हैं। जी-23 का दबाव कहें या वक्त की जरूरत, पार्टी ने लोकतांत्रिक- कर्मकांड का सहारा लेना शुरू कर दिया है। उदयपुर के चिंतन शिविर से कुछ सिद्धांत निकल कर आये और पार्टी के अध्यक्ष का चुनाव हुआ। उस चुनाव में स्पष्ट था कि खड़गे परिवार के प्रत्याशी हैं। कार्यसमिति के गठन की प्रक्रिया को लेकर चली चर्चा पर रायपुर में विराम लग गया और स्पष्ट है कि चुनाव नहीं होगा, मनोनयन होगा। सदस्यों की संख्या भी बढ़ा दी गयी है। विडंबना है कि देश में लोकतंत्र की मांग करनेवाली पार्टी आंतरिक लोकतंत्र से भाग रही है। महाधिवेशन में कांग्रेस ने अपने संविधान के जिन 16 नियमों और 32 प्रावधानों में संशोधन के प्रस्ताव तकरीबन मंजूर किये हैं, वे सभी राहुल गांधी के विचारों से निकले हैं। सबसे बड़ा फैसला यह लिया गया कि कार्यसमिति के सदस्यों की संख्या बढ़ायी जायेगी और इसमें एससी, एसटी, ओबीसी, महिला और युवा वर्ग की हिस्सेदारी सुनिश्चित की जायेगी। उदयपुर में 50 प्रतिशत पदों पर 50 से कम उम्र के लोगों को रखने का सिद्धांत बना था। उसका क्या हुआ, पता नहीं। बहरहाल कार्यसमिति में वंचितों, अल्पसंख्यकों और महिलाओं को कितना स्थान मिलेगा और किस तरह मिलेगा, यह कुछ समय बाद ही पता चलेगा। उसका व्यावहारिक रूप कुछ समय बाद ही स्पष्ट होगा। वस्तुत: यह आंतरिक लोकतंत्र से ज्यादा चुनावी रणनीति का हिस्सा है। पार्टी आरक्षित वर्गों को आकर्षित करना चाहती है। उसने जातिगत जनगणना कराने की मांग भी की है। लोकतंत्र की दृष्टि से देखें, तो यह देखना होगा कि विभिन्न प्रदेशों की कांग्रेस समितियों के सदस्य किस प्रकार चुन कर आये थे।
    इस पूरे परिप्रेक्ष्य में साफ नजर आता है कि कांग्रेस का अध्यक्ष भले ही उस ‘परिवार’ का हिस्सा नहीं है, लेकिन पार्टी का आंतरिक लोकतंत्र अब पूरी तरह दम तोड़ चुका है। उसके नेताओं को जरा भी आभास नहीं है कि 2024 में यही ‘परिवार’ पार्टी की राह में कांटे बोयेगा।

    Share. Facebook Twitter WhatsApp Telegram Pinterest LinkedIn Tumblr Email
    Previous Articleबांग्लादेश में विद्यार्थियों और नागरिकों में झड़प, 200 लोग घायल
    Next Article अब तीन बड़े राज्यों के चुनाव की तैयारियों में जुटी भाजपा-कांग्रेस
    admin

      Related Posts

      भाजपा के लिए बड़ी चुनौती होगी टीएमटी के नेटवर्क को तोड़ना, हलके में लेने की गलती ना करे भाजपा

      May 8, 2026

      बंगाल का ‘भगवा’ सूर्योदय: भय हार गया है और भरोसा जीत गया

      May 7, 2026

      भद्रलोक में दशकों बाद भगवा का उदय

      May 5, 2026
      Add A Comment

      Comments are closed.

      Recent Posts
      • मणिपुर में सुरक्षा बलों की बड़ी कार्रवाई, आरपीएफ/पीएलए का कैडर गिरफ्तार
      • डीसी और एसपी के निर्देश पर रामगढ़ जेल का हुआ औचक निरीक्षण
      • डोरंडा में तनवीर अंसारी हत्याकांड का खुलासा, पुलिस ने दो आरोपितों को किया गिरफ्तार
      • पुत्री की डंडे से पीटकर हत्या, आरोपित पिता को ग्रामीणों ने पेड़ से बांधा
      • झारखंड में मतदाता मैपिंग अभियान को मिली रफ्तार, 75.19 फीसदी कार्य पूरा, 15 जून तक चलेगा अभियान
      Read ePaper

      City Edition

      Follow up on twitter
      Tweets by azad_sipahi
      Facebook X (Twitter) Pinterest Vimeo WhatsApp TikTok Instagram

      Palamu Division

      • Garhwa
      • Palamu
      • Latehar

      Kolhan Division

      • West Singhbhum
      • East Singhbhum
      • Seraikela Kharsawan

      North Chotanagpur Division

      • Chatra
      • Hazaribag
      • Giridih
      • Koderma
      • Dhanbad
      • Bokaro
      • Ramgarh

      South Chotanagpur Division

      • Ranchi
      • Lohardaga
      • Gumla
      • Simdega
      • Khunti

      Santhal Pargana Division

      • Deoghar
      • Jamtara
      • Dumka
      • Godda
      • Pakur
      • Sahebganj

      Subscribe to Updates

      Get the latest creative news from FooBar about art, design and business.

      © 2026 AzadSipahi. Designed by Launching Press.
      • Privacy Policy
      • Terms
      • Accessibility

      Type above and press Enter to search. Press Esc to cancel.

      Go to mobile version