विशेष
कार्यकर्ताओं की जगह पेशेवरों की फौज बना रही पार्टियों की रणनीति
जनता के मुद्दे नहीं, आक्रामक और भड़कीले विषय हैं इस चुनाव के केंद्र में
अपनी उपेक्षा का चुपचाप तमाशा देख रहे हैं हाशिये पर खड़े पार्टी कार्यकर्ता
नमस्कार। आजाद सिपाही विशेष में आपका स्वागत है। मैं हूं राकेश सिंह।
भारतीय उपमहाद्वीप में सांस्कृतिक और सामाजिक पुनर्जागरण का केंद्र माने जानेवाले बंगाल इस समय पूरी तरह चुनावी मोड में आ चुका है। प्रदेश की विधानसभा के लिए चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और अगले करीब डेढ़ महीने तक पश्चिम बंगाल के साथ पूरे देश का सियासी माहौल इसे लेकर बेहद गर्म रहनेवाला है। बंगाल विधानसभा का यह चुनाव सियासी नजरिये से भले ही कितना भी रोमांचक क्यों न हो, एक ऐसी परिघटना के लिए हमेशा याद रखा जायेगा, जिसका अंदाजा किसी को भी नहीं है। इस बार बंगाल के चुनाव में पारंपरिक राजनीति की विदाई तय है। लगातार चौथी बार सत्ता में आने के लिए जूझ रही ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस, उसे कड़ी चुनौती दे रही भारतीय जनता पार्टी और अपना अस्तित्व कायम रखने की जद्दोजहद कर रहीं वामपंथी पार्टियां और कांग्रेस ने इस चुनाव को पारंपरिक तरीके की बजाय पेशेवर तरीके से लड़ने की तरकीब लगायी है। अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के बाद से जीवन के हर क्षेत्र में पेशेवरों का महत्व बढ़ा है, लेकिन राजनीति और चुनाव में अब तक इनका इतना अधिक इस्तेमाल पहले कभी नहीं हुआ था। पहले 2014 के संसदीय चुनाव में और फिर 2015 में बिहार विधानसभा चुनाव में प्रशांत किशोर के रूप में देश ने पहली बार चुनावों में पेशेवरों की भूमिका देखी थी। इस बार बंगाल के चुनाव प्रबंधन में लगभग सभी दलों ने पेशेवरोें की फौज उतार दी है। इसलिए इस बार जनता से जुड़े मुद्दे सीन से गायब हैं और उनकी जगह भड़कीले विषयों पर बात अधिक हो रही है। कभी बंगाल चुनाव में राजनीतिक क्रिएटिविटी देखी जाती थी, जैसे लोकलुभावन नारे, गीत, दीवार लेखन, चित्रकारी, ग्रामीण इलाकों में विविध सांस्कृतिक कार्यक्रम, लेकिन अब वह अतीत की बात हो गयी है। क्या है भारतीय राजनीति के इस नये अध्याय की शुरूआत का कारण और क्या हो सकता है इसका असर, बता रहे हैं आजाद सिपाही के संपादक राकेश सिंह।
इन दिनों चुनावी तपिश में झुलस रहे पश्चिम बंगाल के बारे में कहा जाता है कि बंगाल जो आज सोचता है, शेष भारत उसके बारे में कल सोचता है। इस बार यह कथन एक बार फिर सच साबित होता दिख रहा है। राज्य में चल रही अब तक की सबसे आक्रामक और रोमांचक चुनावी प्रक्रिया में इस बार राजनीति का नया रंग दिखने को मिल रहा है। इसमें कार्यकर्ता पूरी तरह गायब हैं और उनका स्थान पेशेवरों ने ले लिया है। जनता से जुड़े मुद्दों के स्थान पर भड़कीले और तात्कालिक मुद्दों पर बात हो रही है। पाला बदलने का खेल अब तक के सारे कीर्तिमान ध्वस्त कर चुका है।
इस बात में कोई संदेह नहीं है कि पश्चिम बंगाल ने बौद्धिक, सांस्कृतिक और सामाजिक विकास के संघर्ष में देश ही नहीं, पूरे भारतीय उपमहाद्वीप का हमेशा नेतृत्व किया है। इसलिए यहां जो कुछ होता है, उसका असर पूरे भारत पर पड़ता है। इस लिहाज से इस बार का चुनाव भी खास मायने रखता है।
बंगाल में विधानसभा चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और अगले करीब डेढ़ महीने तक इस प्रदेश के साथ पूरे देश की निगाहें इस पर टिकी रहेंगी। लेकिन इस चुनाव की सबसे खास बात यह देखने को मिल रही है कि इस बार यहां का चुनाव परंपरागत तरीके से नहीं, बल्कि पेशेवर तरीके से लड़ा जा रहा है। चाहे 15 साल की अपनी सत्ता को बचाने के लिए जूझ रही ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस हो या उसे अब तक की सबसे कठिन चुनौती देने के लिए तैयार भाजपा हो, अपने अस्तित्व की रक्षा की जद्दोजहद में जुटीं वामपंथी पार्टियां हों या देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस, सभी ने बंगाल के चुनाव में पेशेवरों की फौज उतार दी है, जिसने कार्यकर्ताओं को बहुत हद तक महत्वहीन बना दिया है। इसका परिणाम यह हुआ है कि इस बार जनता से जुड़े मुद्दों को उतनी तरजीह नहीं मिल रही है, जितनी मिलनी चाहिए थी।
इसकी शुरूआत ममता बनर्जी ने पिछले चुनाव में की थी। 2014 के संसदीय चुनाव और फिर 2015 में बिहार विधानसभा चुनाव में कमाल दिखाने का दावा करनेवाले प्रशांत किशोर को उन्होंने अपना सलाहकार बनाया। यह बंगाल की राजनीति का नया अध्याय था, जब वर्षों से जनता के बीच रह कर काम करनेवाले कार्यकर्ताओं को मोटी रकम लेनेवाले एक पेशेवर से मान्यता हासिल करना अनिवार्य बना दिया गया। खुद ममता बनर्जी भी इस नये किस्म की राजनीति में फंस गयीं और उस चुनाव में चुनावी रणनीति बनाने की उनकी अपराजेय क्षमता कमजोर होती महसूस होती दिखी। इस बार प्रशांत किशोर तो ममता के साथ नहीं हैं, लेकिन कभी उनकी कंपनी रही आइ-पैक इस बार टीएमसी का पूरा चुनाव प्रबंधन देख रही हैं। इसके जवाब में स्वाभाविक तौर पर भाजपा और दूसरी पार्टियों ने भी पेशेवरों की फौज उतारी है, लेकिन बंगाल का वर्तमान सियासी माहौल विश्वसनीयता की हर कसौटी पर फेल होता दिख रहा है।
इस नये माहौल का परिणाम भी कम खतरनाक नहीं होनेवाला है। यदि ममता की सत्ता में वापसी हो जाती है, तो भारतीय राजनीति में पेशेवरों का सिक्का चल निकलेगा। उस स्थिति में पार्टी का झंडा ढोनेवाले आम कार्यकर्ता लगातार महत्वहीन होते जायेंगे, जिसके संभावित सामाजिक असर का आकलन अब तक नहीं किया गया है। चार मई को बंगाल का चुनाव परिणाम यदि ममता बनर्जी के विपरीत गया, तो वह स्थिति राजनीति के सामाजिक स्वरूप को छिन्न-भिन्न कर देगी और देश उस रास्ते पर चल पड़ेगा, जहां हर काम पेशेवर तरीके से होगा।
ये दोनों स्थितियां खतरनाक हो सकती हैं। तो फिर इसका विकल्प क्या है, इस सवाल का उत्तर खोजना जरूरी हो गया है। बंगाल ने देश को दिशा दी है, तो इस खोज की अगुवाई भी निश्चित रूप से उसे ही करनी होगी। कोलकाता के ब्रिगेड मैदान में आयोजित प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली के माध्यम से भाजपा ने इस नेतृत्व की जिम्मेदारी स्वीकार करने का एलान तो किया है, लेकिन इसका कितना असर आम मतदाता पर पड़ेगा, यह देखना अभी बाकी है। बंगाल की राजनीति में भाजपा का यह नया अवतार है। कहा जाता है कि नवान्न (बंगाल का मुख्यालय) का रास्ता ब्रिगेड मैदान से होकर जाता है। तो क्या प्रधानमंत्री की रैली से बंगाल की सत्ता का दरवाजा भगवा झंडे के स्वागत के लिए तैयार हो गया है। इस सवाल का जवाब बहुत आसान नहीं है, क्योंकि पेशेवर सलाहकारों और आंकड़ों की बाजीगरी का नतीजा निकालने में जल्दबाजी अक्सर पश्चाताप का कारण बनती है। इसलिए अब इंतजार चार मई का है, जब बंगाल की जनता अपना फैसला सुनायेगी और तब देश की राजनीति और चुनावी मैदान के धुरंधर अपनी दिशा तय करने के रास्ते पर आगे बढ़ते नजर आयेंगे।



