विशेष
देश की जातीय संरचना को पूरी तरह छिन्न-भिन्न कर रहा है धर्मांतरण
देश को मजबूत करेगा यह फैसला, आने वाली पीढ़ी रहेगी सुरक्षित और जागरूक
राजनीतिक रूप से इस फैसले के बहुआयामी प्रभाव से इनकार नहीं किया जा सकता
नमस्कार। आजाद सिपाही विशेष में आपका स्वागत है। मैं हूं राकेश सिंह।
देश के सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति के संदर्भ में अत्यंत ही महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। इस फैसले से धर्मांतरण के अवैध और असामाजिक कृत्यों से देश को बहुत हद तक मुक्ति मिलेगी। हालांकि यह फैसला अभी अधूरा है। जनजातीय समाज को भी इस फैसले में सम्मिलित करने से ही देश आरक्षण के दुरुपयोग को रोक पायेगा। फिर भी इस फैसले से भारत में आरक्षण कानून की आत्मा की आंशिक रक्षा तो होगी ही। हालांकि यह फैसला समय की मांग के अनुसार जनजातीय समाज को अपने प्रभाव में नहीं ले रहा है, जबकि हकीकत यह है कि इस प्रकार के फैसले की प्रतीक्षा देश का अनुसूचित जनजातीय समाज बड़ी आतुरता से कर रहा है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि अनुसूचित जाति के अंतर्गत मिलने वाले आरक्षण का लाभ केवल उन्हीं को मिलेगा, जो मूल रूप से उस सामाजिक-धार्मिक श्रेणी में बने रहते हैं। यदि कोई व्यक्ति धर्म परिवर्तन कर इसाई या इस्लाम धर्म अपना लेता है, तो वह स्वत: उस आरक्षण के अधिकार से वंचित हो सकता है, क्योंकि यह आरक्षण ऐतिहासिक सामाजिक वर्गीकरण के आधार पर दिया गया है। यह फैसला केवल एक कानूनी व्याख्या नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता को, सामाजिक संरचना को और हिंदुत्व के खिलाफ चल रहे कुचक्र को रोकने वाला महत्वपूर्ण कदम है। साफ है कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला देश में राजनीतिक और सामाजिक असर भी डालेगा। क्या है इस फैसले का अर्थ और क्या होगा इसका असर, बता रहे हैं आजाद सिपाही के संपादक राकेश सिंह।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक अहम फैसले में यह स्पष्ट कर दिया है कि यदि कोई व्यक्ति हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म से बाहर जाकर धर्म परिवर्तन करता है, तो उसे अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जा सकता। दरअसल, आंध्र प्रदेश के एक धर्मांतरित इसाई पादरी से जुड़े मामले में आये इस नवीनतम फैसले के व्यापक राजनीतिक और सामाजिक मायने हैं। इससे हिंदू समुदाय के दलितों और पिछड़ों को निशाना बनाकर धर्मांतरित करवाये जाने का पूरा खेल ही अब हतोत्साहित हो जायेगा।
यह फैसला जस्टिस पीके. मिश्रा और जस्टिस एनवी. अंजारिया की पीठ ने सुनाया। अदालत ने कहा कि अनुसूचित जाति का दर्जा भारतीय संविधान के तहत केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म को मानने वाले लोगों तक सीमित है। ऐसे में अगर कोई व्यक्ति इसाई या किसी अन्य धर्म को अपनाता है और उसका सक्रिय रूप से पालन करता है, तो वह एससी श्रेणी के लाभों का हकदार नहीं रहेगा।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने इस निर्णय में आंध्र प्रदेश हाइकोर्ट के पहले दिये गये फैसले को भी सही ठहराया। आंध्र प्रदेश हाइकोर्ट ने कहा था कि जो लोग इसाई धर्म अपना लेते हैं, वे अपनी अनुसूचित जाति की पहचान बनाये नहीं रख सकते और उन्हें इससे जुड़े कानूनी संरक्षण भी नहीं मिलेंगे।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि धर्म परिवर्तन के बाद व्यक्ति की सामाजिक और धार्मिक पहचान बदल जाती है, जिसका सीधा असर उसकी कानूनी स्थिति पर पड़ता है। इसी आधार पर कोर्ट ने कहा कि अनुसूचित जाति से जुड़े विशेष अधिकार और संरक्षण, जैसे कि एससी/एसटी एक्ट के तहत मिलने वाले लाभ, धर्म परिवर्तन के बाद स्वत: समाप्त हो जाते हैं।
यह फैसला उन मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जहां धर्म परिवर्तन के बाद भी अनुसूचित जाति के अधिकारों का दावा किया जाता रहा है। सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय से अब इस विषय पर कानूनी स्थिति और अधिक स्पष्ट हो गयी है, जिससे भविष्य में ऐसे मामलों में मार्गदर्शन मिलेगा।
फैसले के राजनीतिक मायने
इस फैसले के अहम राजनीतिक मायने हैं। यह फैसला धर्मांतरण पर आधारित आरक्षण दावों को रोक सकता है, जो दक्षिणपंथी दलों के लिए समर्थन बढ़ायेगा। वहीं, अल्पसंख्यक आरक्षण बहस (जैसे दलित इसाई/मुस्लिम) को प्रभावित कर चुनावी राजनीति में हिंदू एकता पर जोर देगा। राज्य सरकारें ओबीसी/एससी सूचियों की समीक्षा के दबाव में आ सकती हैं। वहीं, इस फैसले के बाद धर्म परिवर्तन और आरक्षण से जुड़ी बहस जोर पकड़ सकती है। चूंकि सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के आलोक में फैसला दिया है, लेकिन कुछ मसले ऐसे होते है, जहां कानून और जमीनी हकीकत आमने-सामने आ जाते हैं। भारत में जाति एक सच्चाई है, जिसे नहीं बदला जा सकता, लेकिन इससे जुड़ी बुराइयों को खत्म करने की तमाम कोशिश होनी चाहिए, जो राजनीतिक और न्यायिक अदूरदर्शिता वश नहीं हो पा रही है और तरह तरह के संवैधानिक विवाद जन्म ले रहे हैं, जिससे राष्ट्रीय हितों को लगातार धक्का लग रहा है।
फैसले का राजनीतिक असर
अब सवाल यह है कि इस फैसले का राजनीतिक असर क्या हो सकता है। इस सवाल का जवाब बहुआयामी है। सबसे पहले, इस फैसले से सत्तारूढ़ भाजपा को वैचारिक मजबूती मिलती दिखायी देती है। भाजपा लंबे समय से ‘धर्मांतरण विरोध’ को अपने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के एजेंडे का हिस्सा बनाती रही है। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों के बाद पार्टी यह दावा करने की स्थिति में है कि उसकी चिंताओं को अब न्यायपालिका ने भी मान्यता दी है। इससे न केवल उसके समर्थकों में संदेश जाता है कि सरकार सही दिशा में है, बल्कि यह मुद्दा चुनावी मंचों पर और अधिक मजबूती से उठाया जा सकता है।
इसके विपरीत विपक्षी दलों, विशेषकर कांग्रेस के सामने एक जटिल स्थिति उत्पन्न हो गयी है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल परंपरागत रूप से धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यक अधिकारों के पक्षधर रहे हैं। लेकिन जब सुप्रीम कोर्ट जैसे संस्थान जबरन धर्मांतरण पर चिंता व्यक्त करते हैं, तो विपक्ष के लिए इस मुद्दे पर खुलकर विरोध करना आसान नहीं रह जाता। परिणामस्वरूप, उनका रुख कई बार अस्पष्ट और रक्षात्मक नजर आता है, जो राजनीतिक रूप से नुकसानदेह हो सकता है।
क्षेत्रीय राजनीति पर भी होगा असर
धर्मांतरण का मुद्दा क्षेत्रीय राजनीति को भी गहराई से प्रभावित करता है। झारखंड, ओड़िशा, छत्तीसगढ़, यूपी, बिहार और दक्षिण और पूर्वोत्तर के कई राज्यों में आदिवासी समुदायों के बीच धर्मांतरण एक संवेदनशील विषय रहा है। इन क्षेत्रों में सक्रिय दलों, जैसे झामुमो, को स्थानीय सामाजिक वास्तविकताओं और राष्ट्रीय राजनीतिक दबावों के बीच संतुलन बनाना पड़ता है। एक ओर उन्हें आदिवासी पहचान और परंपराओं की रक्षा करनी होती है, तो दूसरी ओर धार्मिक स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकारों का सम्मान भी करना होता है। इस फैसले का एक महत्वपूर्ण प्रभाव यह है कि यह पहचान की राजनीति को और तेज कर सकता है। धर्मांतरण का मुद्दा सीधे-सीधे धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा हुआ है। जब न्यायपालिका इस पर टिप्पणी करती है, तो यह बहस और गहरी हो जाती है कि व्यक्ति की स्वतंत्रता और समुदाय की सांस्कृतिक सुरक्षा के बीच सीमा कहां खींची जाये। राजनीतिक दल इस बहस को अपने-अपने तरीके से प्रस्तुत करेंगे, जिससे समाज में वैचारिक ध्रुवीकरण बढ़ने की संभावना है।
इसके अलावा, इस फैसले के बाद कई राज्यों में पहले से लागू ‘धर्म स्वतंत्रता कानूनों’ को और सख्ती से लागू करने की मांग तेज हो सकती है। प्रशासनिक स्तर पर निगरानी बढ़ेगी और गैर-सरकारी संगठनों तथा मिशनरी गतिविधियों पर अधिक ध्यान दिया जायेगा। यह स्थिति एक ओर कानून व्यवस्था को मजबूत कर सकती है, लेकिन दूसरी ओर नागरिक स्वतंत्रताओं पर अंकुश के आरोप भी सामने आ सकते हैं। ऐसे में राजनीतिक दलों के लिए यह एक संवेदनशील संतुलन का विषय बन जायेगा।
चुनावी दृष्टिकोण से देखा जाये, तो धर्मांतरण का मुद्दा आने वाले समय में एक प्रमुख एजेंडा बन सकता है। भाजपा इसे सांस्कृतिक अस्मिता और राष्ट्रीय पहचान के प्रश्न के रूप में प्रस्तुत कर सकती है, जबकि विपक्ष इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों के संदर्भ में उठाने की कोशिश करेगा। इस प्रकार यह मुद्दा न केवल वैचारिक बहस को प्रभावित करेगा, बल्कि वोटबैंक की राजनीति को भी पुनर्परिभाषित कर सकता है।
फैसले का सामाजिक प्रभाव
जहां तक इस फैसले के सामाजिक प्रभाव की बात है, तो धर्म परिवर्तन के बाद एससी/ओबीसी का लाभ न मिलने से सामाजिक न्याय की नीति मजबूत होगी, लेकिन धार्मिक रूपांतरण रोकने या जातिगत अस्मिता पर बहस तेज हो सकती है। चूंकि दलित समुदायों में हिंदू/सिख/बौद्ध रहने का दबाव बढ़ेगा, जबकि इसाई/मुस्लिम समुदायों में असंतोष उत्पन्न हो सकता है। फिर भी कुल मिलाकर देखा जाये, तो यह आरक्षण को ऐतिहासिक अन्याय सुधार तक सीमित रखने की दिशा में उठाया गया निर्णायक कदम है। इस पर मौजूदा मोदी सरकार के वैचारिक असर से भी इनकार नहीं किया जा सकता है, क्योंकि यह सरकार दलित/ओबीसी हिंदुओं की एकजुटता और समग्र उत्थान के लिए प्रतिबद्ध है।
हालांकि देश में जाति से जुड़ा सवाल बहुत टेढ़ा और जटिल है, क्योंकि सामाजिक स्तर पर हमेशा से यह बहस का विषय रहा है कि क्या धर्म बदलने भर से जातिगत भेदभाव खत्म हो जाता है? गाहे-बगाहे ऐसे मामले सामने आते रहे हैं, जिनमें दलित या ओबीसी समुदाय के लोगों को दूसरा धर्म अपनाने के बाद भी भेदभाव का सामना करना पड़ता है। पिछले साल मार्च में ही तमिलनाडु के कुछ इसाई परिवारों, जो पहले दलित थे, ने आरोप लगाया था कि उनके साथ समान व्यवहार नहीं होता। यहां तक कि कब्रिस्तान में उनके लोगों के शवों को दफनाने के लिए भी अलग जगह है।
क्या है फैसले का आधार
उल्लेखनीय है कि शीर्ष अदालत के फैसले का आधार संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 है, जिसका क्लॉज 3 कहता है कि हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म को मानने वाले ही एससी श्रेणी में आ सकते है। धर्म परिवर्तन और जाति से जुड़ी यह बहस बहुत पुरानी है। इसके दो पहलू है। एक, जिन धर्मों में जाति व्यवस्था नहीं है, उन्हें अपनाकर फिर जाति से जुड़े लाभ कैसे लिये जा सकते हैं। पिछले साल दिसंबर में इलाहाबाद हाइकोर्ट ने यूपी सरकार को यह सुनिश्चित करने का आदेश दिया था कि जिन्होंने इसाई धर्म अपना लिया है, उन्होंने अनुसूचित जाति से जुड़े लाभ छोड़ दिये हों। तब हाइकोर्ट ने कहा था कि धर्म परिवर्तन के बाद भी अनुसूचित जाति समुदाय को मिलने वाले फायदे लेते रहना संविधान के साथ धोखा है। राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के पास इस तरह की कई शिकायतें हैं और उसने पिछले साल देशभर में जांच भी शुरू की थी। कुल मिलाकर उद्देश्य यह है कि संविधान के तहत मिले अधिकार का दुरुपयोग न होने पाये, क्योंकि जाति और धर्म का दुरुपयोग होने की चिंता शुरू से ही न्यायिक विमर्श का मुद्दा बनी हुई है। लिहाजा ब्रेक के बाद न्यायादेश मिलते रहते हैं।
इंद्रा साहनी केस (1992) से इस फैसले का संबंध
इंद्रा साहनी केस (1992) मुख्य रूप से ओबीसी आरक्षण पर केंद्रित था, लेकिन हालिया सुप्रीम कोर्ट फैसले (धर्म परिवर्तन पर एससी दर्जा समाप्ति) से इसका अप्रत्यक्ष संबंध है। दोनों आरक्षण को जाति-आधारित ऐतिहासिक अन्याय सुधार तक सीमित रखने के सिद्धांत साझा करते हैं। इंद्रा साहनी केस में सुप्रीम कोर्ट ने ओबीसी को 27% आरक्षण मान्य किया, लेकिन 50% कुल सीमा तय की और स्पष्ट किया कि आरक्षण का आधार धर्म या जाति, अकेला नहीं हो सकता। फैसले में क्रीमी लेयर बहिष्कार और पिछड़ापन के सामाजिक-शैक्षिक मापदंड निर्धारित किये गये।
इस तरह सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले में संविधान के अनुसूचित जाति आदेश 1950 का हवाला दिया गया, जो इंद्रा साहनी के सिद्धांतों से मेल खाता है कि आरक्षण धर्म पर आधारित नहीं। ओबीसी मामलों में (जैसे मुस्लिम आरक्षण रद्द), कोर्ट ने इंद्रा साहनी का जिक्र कर धर्म को आधार बनाने से रोका, जो एससी केस की भावना से जुड़ता है। हालांकि, सीधा उल्लेख नहीं मिला, लेकिन सामान्य आरक्षण दर्शन समान है, जिसका सर्वकालिक महत्व जगजाहिर है।
इस पूरे विमर्श में यह ध्यान रखना आवश्यक है कि न्यायपालिका का उद्देश्य किसी राजनीतिक एजेंडे को बढ़ावा देना नहीं, बल्कि संविधान की रक्षा करना है। सुप्रीम कोर्ट ने केवल यह स्पष्ट किया है कि धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार पूर्ण नहीं है और इसे सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के दायरे में रहकर ही प्रयोग किया जा सकता है। लेकिन राजनीति की प्रकृति ऐसी है कि वह हर मुद्दे को अपने हितों के अनुसार ढालने की कोशिश करती है। अंतत:, धर्मांतरण पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का राजनीतिक असर बहुआयामी है। यह सत्तारूढ़ दल को वैचारिक बल देता है, विपक्ष को नयी रणनीति बनाने पर मजबूर करता है और क्षेत्रीय दलों के लिए संतुलन की चुनौती खड़ी करता है। साथ ही, यह समाज में पहचान, अधिकार और कर्तव्य के बीच चल रही बहस को और तीखा करता है। जरूरत इस बात की है कि इस संवेदनशील मुद्दे को राजनीतिक लाभ-हानि के चश्मे से देखने के बजाय संवैधानिक मूल्यों और सामाजिक सद्भाव के दृष्टिकोण से समझा जाये। यदि राजनीति इस दिशा में संतुलन बनाये रखने में सफल होती है, तो यह फैसला देश के लोकतंत्र को मजबूत करेगा, अन्यथा यह विभाजन और अविश्वास को और गहरा कर सकता है।



