झारखंड में भाजपा और कांग्रेस के लिए लोकसभा चुनाव में जातिगत समीकरण बिठाना क ठिन चुनौती साबित हो रहा है। खास तौर पर प्रत्याशियों के चयन में जातिगत समीकरण बैठाने में इन दोनों दलों के पसीने छूट रहे हैं। इसमें झारखंड की सबसे बड़ी पार्टी भाजपा को ब्राह्मण, राजपूत, भूमिहार और कुर्मी जाति के ठेकेदार आंख दिखा रहे हैं, तो कांग्रेस को अल्पसंख्यकों खासकर इसाई और मुसलमानों के बिदकने का भय सता रहा है। यही कारण है कि झारखंड में भाजपा राजधानी रांची सहित कोडरमा और चतरा पर अब तक उम्मीदवार की घोषणा नहीं कर सकी है, तो कांग्रेस अपने हिस्से की सात सीटों के उम्मीदवारों की औपचारिक घोषणा करने का साहस अब तक नहीं कर पायी है। कांग्रेस को खूंटी, चतरा, हजारीबाग और धनबाद में उम्मीदवार चयन में पसीने छूट रहे हैं। दूसरी तरफ झारखंड के क्षेत्रीय दल खासकर झामुमो, झाविमो और आजसू अब तक कास्ट रोग की चपेट में नहीं आ पाये हैं। वहां दल की तरफ से जिसे उम्मीदवार बनाया जाता है, उसे लोग सहर्ष स्वीकार कर लेते हैं। भाजपा और कांग्रेस में जातीय समीकरण किस हद तक हावी है, यह इसी से स्पष्ट हो जाता है कि इतनी बड़ी पार्टी को एक अदना सा उम्मीदवार ललकार देता है कि इस बार चुनाव में औकात बता देंगे। भाजपा के खिलाफ रांची से रामटहल चौधरी और गिरिडीह से रवींद्र पांडेय आग उगल रहे हैं, तो कांग्रेस के इरफान अंसारी अपने पिता को टिकट नहीं मिलने के कारण झारखंड के आसमान को ही सिर पर उठाने को तैयार हैं। यहां तक धमकी दे दी है कि झारखंड की सिर्फ 14 ही नहीं, बिहार की सीटों पर भी असर डालेंगे, मानो उन्होंने अपनी पूरी बिरादरी का ठेका ले रखा है। इस रोग की पड़ताल कर रहे हैं हमारे राज्य समन्वय संपादक दीपेश कुमार।
भाजपा और उसके बाद कांग्रेस (सदस्य के हिसाब से) को पंद्रह दिन लग गये, कुछ सीटों पर प्रत्याशी चुनने में। अभी भी सर्वमान्य हल नहीं निकल पाया है। भाजपा सबसे ज्यादा परेशान रांची सीट को लेकर है। इस सीट पर उसके सांसद रामटहल चौधरी ने खुली चुनौती दे दी है। उन्होंने यहां तक कह दिया है कि उन्हीं के कारण रांची सीट भाजपा के खाते में जाती रही है। उनकी धमकी का असर पार्टी पर है और यही कारण है कि वह योग्यता के आधार पर किसी उम्मीदवार का चयन नहीं कर पा रही है।
उम्मीदवार चयन में जातीय समीकरण हावी हो जा रहा है। कभी वह वैश्य की तरफ झांक रही है, तो कभी कुर्मी की तरफ तो कभी व्यवसायी वर्ग की तरफ। गिरिडीह में रवींद्र पांडेय की धमकी का असर यह हुआ कि भाजपा ने वह सीट आजसू को दे दी। दरअसल उस सीट पर उम्मीदवार चयन को लेकर उसे भारी परेशानी हो रही थी। उम्मीदवार चयन में कभी उसे ढुल्लू महतो का भय सताने लगता था, तो कभी ब्राह्मण उम्मीदवार का। काफी जद्दोजहद के बाद भी वह प्रत्याशी का चयन नहीं कर पायी। इस बीमारी से निजात पाने के लिए उनसे आजसू को वह सीट ही कुर्बान कर दी। रांची में भाजपा यह नहीं समझ पा रही है कि रामटहल चौधरी का विकल्प वह किसे बनाये। कभी आदित्य साहू का नाम सामने आ जाता है, तो कभी संजय सेठ का। कभी अमर चौधरी चर्चा में आ जाते हैं, तो कभी किसी बड़े सेलेब्रेटी का नाम उछलने लगता है। हालत यह है कि यहां भावी उम्मीदवारों की आंख की नींद गायब हो गयी है और दूसरी तरफ रामटहल चौधरी है कि मैदान में फेटा बांध कर उतर गये हैं। उनकी एक ही लालसा है कि रांची में भाजपा को औकात बतायी जाये। उन्हें गुमान है कि उनसे रांची सीट है, भाजपा से नहीं। उसी तरह भाजपा को भूमिहार जाति का भी भय सता रहा है। रवींद्र राय का टिकट कटने के बाद उस जाति विशेष के कुछ तथाकथित ठेकेदारों ने यह मनादी कर दी कि इसका भारी खामियाजा भाजपा को उठाना पड़ेगा। वहीं चतरा में राजपूत ललकार रहे हैं। सुनील सिंह समर्थक खुलेआम कह रहे हैं कि अगर टिकट नहीं मिला, तो वे पूरी बिरादरी को भाजपा के खिलाफ खड़ा कर देंगे। इसी कारण अभी तक भाजपा कोडरमा और चतरा में भी उम्मीदवार के नाम की घोषणा नहीं कर पायी है।
यह सही है कि रांची, जमशेदपुर, गिरिडीह सीट पर (कुछ हद तक) महतो वोट निर्णायक साबित होते रहे हैं। लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं कि वहां अगर महतो उम्मीदवार नहीं दिया गया, तो हार हो जायेगी। आंकड़े गवाह हैं कि रांची में महतो वोट की बहुलता के बावजूद गैर महतो उम्मीदवार 11 बार जीत दर्ज करा चुके हैं। वहीं, चतरा में यादव, क्षत्रीय एवं मुस्लिम, कोडरमा में यादव, कुशवाहा, वैश्य और भूमिहार मतदाताओं की तादाद ज्यादा है। इस लोकसभा क्षेत्र में मुस्लिम मतदाता की संख्या भी अच्छी खासी है। पलामू में एससी के साथ पिछड़े वर्ग के मतदाताओं और ब्राह्मण वोट का विशेष महत्व है। वहीं खूंटी वैसे तो अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीट है, पर वहां वैश्य समुदाय भी जीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है। इसके साथ ही लोहरदगा और कोडरमा में भी वैश्य की जनसंख्या अच्छी खासी है। धनबाद और गोड्डा में सवर्ण के साथ साथ पिछड़ा वर्ग के वोटों का महत्व दिखता रहा है। हालांकि धनबाद में अब तक बाहर के उम्मीदवार ही ज्यादा थोपे जाते रहे हैं। गोड्डा में मुस्लिम, होटवार, ब्राह्मण और यादव वोटों की बहुलता है।
रांची, जमशेदपुर ही नहीं, गिरिडीह और हजारीबाग सीटों पर भी जब निर्णय होता है, तो सबसे पहले जातिगत समीकरण पर गौर किया जाता है।
भाजपा के लिए कड़ी चुनौती
भाजपा की बात करें, तो इस पार्टी में जातिगत समीकरण बिठाने में सबसे ज्यादा मगजमारी होती है। भाजपा द्वारा गिरिडीह सीट आजसू को देने और वहां से चंद्रप्रकाश चौधरी (महतो) के आजसू प्रत्याशी बनने के बाद गिरिडीह से रवींद्र पांडेय (ब्राह्मण) का टिकट कटने से भी यह चुनौती और बढ़ गयी है। इसके अलावा चतरा सीट पर प्रत्याशी बदलने की भी चर्चा है। इस सीट पर राजपूत सांसद हैं। ऐसे में समीकरण बैठाना मुश्किल हो रहा है। झारखंड में फिलहाल भाजपा के 12 सांसद हैं। इनमें रांची और जमशेदपुर में महतो सांसद (रामटहल चौधरी और विद्युतवरण महतो) हैं। यह चुनौती इसलिए भी बढ़ जाती है, क्योंकि झारखंड की कुल 14 सीटों में दुमका, राजमहल, लोहरदगा, खूंटी और सिंहभूम अनुसूचित जनजाति और पलामू कुल छह सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है। इसका मतलब है कि शेष आठ सीटों पर बाकी सभी जातियों को प्रतिनिधत्वि देना राजनीतिक दलों की विवशता है। रांची, जमशेदपुर और गिरिडीह में महतो प्रत्याशी होने के बाद बाकी के लिए पांच सीटें बचेंगी। इसी समस्या से भाजपा और कांग्रेस को भी जूझना पड़ रहा है।
झामुमो और झाविमो को ज्यादा परेशानी नहीं
झामुमो और झाविमो को इस जातीय समीकरण से ज्यादा परेशानी नहीं है। क्योंकि झामुमो में शिबू सोरेन ही एक तरह से सिंबल हैं। वहां जातीय समीकरण पर ज्यादा गौर नहीं किया जाता। पार्टी को जिसे टिकट देना होता है, सामनेवाले की चुनौती को आधार बनाकर दे दिया जाता है। हालांकि भाजपा द्वारा जमशेदपुर से विद्युतवरण महतो को टिकट दिये जाने से झामुमो पर महतो उम्मीदवार को ही प्रत्याशी बनाये जाने का दबाव बढ़ गया है। ऐसे में ज्यादा उम्मीद है कि झामुमो आस्तिक महतो ही को उम्मीदवार घोषित करे। अब यह जरूरी नहीं है कि एक महतो उम्मीदवार देने के बाद गिरिडीह से पार्टी दूसरी जाति का उम्मीदवार तलाशे। झामुमो को चार सीटें ही मिली है। संथाल परगना की सीटों पर उसे कोई फर्क नहीं पड़ेगा। दुमका से शिबू सोरेन और राजमहल से विजय हांसदा का लड़ना तय है। गिरिडीह सीट पर महतो प्रत्याशी के बीच ही मुकाबला होने की संभावना है। झामुमो को देखना होगा कि वह चार सीटों में बंटवारा किस आधार पर करता है। दो सीट आरक्षित हैं, लेकिन बाकी दो में भी उसे जातिगत समीकरण को लेकर ज्यादा चिंता नहीं है। क्योंकि गिरिडीह सीट पर जगन्नाथ महतो का खड़ा होना लगभग तय है। ऐसे झामुमो दो महतो उम्मीदवारों को उतार सकता है।
झारखंड में आधी सीटों पर अब तक महतो वोटों का बोलबाला देखने को मिलता रहा है। रांची, जमशेदपुर, गिरिडीह के अलावा कुछ हद तक धनबाद, हजारीबाग लोहरदगा में भी महतो वोटरों की बहुलता है। यही कारण है कि इस बार भी अब तक पांच से छह महतो उम्मीदवारों की दावेदारी तय मानी जा रही है। जमशेदपुर से इससे पहले दो बार शैलेंद्र महतो (झामुमो), दो बार आभा महतो (भाजपा) और एक-एक बार सुनील महतो (झामुमो) और सुमन महतो (झामुमो, उपचुनाव में) चुनाव जीत चुके हैं।
रांची : 16 चुनाव में 11 बार गैर महतो विजयी
रांची सीट पर सभी की निगाहें हैं। हाल के चुनावों में यहां भाजपा और कांग्रेस के बीच ही मुकाबला होता आया है। अभी भले ही प्रत्याशियों के चयन में महतो, गैर महतो की बात उठती है, लेकिन एक समय था, जब रांची सीट पर मुसलिम और पारसी प्रत्याशी भी जीतते थे। 1952 के पहले चुनाव में रांची से अब्दुल इब्राहिम कांग्रेस के टिकट पर विजयी हुए थे। 1957 में झारखंड पार्टी ने पारसी प्रत्याशी एमआर मसानी (मुंबई) को उतारा था और वे चुनाव जीत गये थे।
सबसे रोचक परिणाम 1962 से 1971 तक हुआ था। रांची में बंगालियों की आबादी अच्छी खासी रही है। अब रांची सीट पर मुख्य दल बंगालियों को भले ही टिकट न दें (लोकसभा चुनाव में) लेकिन इसी रांची सीट पर एक बंगाली नेता प्रशांत कुमार घोष लगातार तीन बार (1962, 1967, 1971) विजयी रहे थे। पहली बार स्वतंत्र प्रत्याशी के तौर पर और दूसरी-तीसरी बार कांग्रेस के प्रत्याशी के तौर पर। रांची सीट पर हुए 16 चुनावोें में पांच बार (1991, 1996, 1998, 1999, 2014) भाजपा के रामटहल चौधरी (महतो) और 11 बार गैर-महतो विजयी रहे हैं।