गाइडलाइन के अभाव में पैदा हो रहीं समस्याएं
दोहरे दबाव में फंस रहे हैं झारखंड जैसे छोटे प्रदेश

देश भर में पिछले 28 दिन से जारी लॉकडाउन में सोमवार 20 अप्रैल से थोड़ी छूट दी गयी है, लेकिन समस्याएं लगातार बढ़ती जा रही हैं। झारखंड जैसे छोटे राज्य दोहरे दबाव में आ गये हैं, क्योंकि केंद्र सरकार द्वारा जारी गाइडलाइन पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। जो राज्य सरकारें इस गाइडलाइन का पूर्णत: पालन कर रही हैं, उन्हें विपक्ष के दबाव के साथ-साथ लोगों के अविश्वास का भी सामना करना पड़ रहा है। कोटा से बच्चों की वापसी का मुद्दा हो या प्रवासी मजदूरों को राहत पहुंचाने का सवाल, झारखंड जैसे राज्य दुविधा में फंसे हुए हैं। वे यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि वे केंद्र की गाइडलाइन का पालन करें या फिर इसका उल्लंघन करनेवाले राज्यों जैसा व्यवहार करें। इन राज्यों को यह भी समझ में नहीं आ रहा है कि वे हिंदपीढ़ी की महिला को प्रसव के लिए अस्पताल ले जाने की अनुमति नहीं दें या फिर नवादा के विधायक की तरह किसी प्रभावशाली व्यक्ति को कोटा जाकर अपने बच्चे को वापस लाने की अनुमति दें। इस तरह यह लॉकडाउन एक तरह से भारत के संघीय ढांचे और सामाजिक-राजनीतिक स्वरूप के लिए बड़ा खतरा बनता जा रहा है। यह केंद्र सरकार की जिम्मेदारी बन गयी है कि वह कोरोना के खिलाफ जारी जंग को जीतने के लिए स्पष्ट गाइडलाइन तैयार करे। लॉकडाउन पर मंडरा रहे खतरे को रेखांकित करती आजाद सिपाही ब्यूरो की खास रिपोर्ट।

वाकया रांची में कोरोना के हॉटस्पॉट बन चुके हिंदपीढ़ी का है। पूरी तरह सील इस इलाके का एक युवक प्रसव पीड़ा से कराह रही अपनी गर्भवती पत्नी को लेकर रात को अस्पताल ले जाने के लिए अपनी गाड़ी से निकलता है। लेकिन उसे पुलिसवाले यह कह कर लौटा देते हैं कि किसी को भी बाहर जाने की इजाजत नहीं है। काफी मिन्नतें करने के बावजूद युवक को अनुमति नहीं मिलती है। थक-हार कर वह घर लौट जाता है। उसकी पत्नी का प्रसव घर में ही कराया जाता है, लेकिन नवजात की मौत हो जाती है।
दूसरा वाकया इसी हिंदपीढ़ी का है। एक युवक अपने आधा दर्जन साथियों के साथ अपनी गाड़ी से दिन में निकलता है और एक पास लेकर बिना किसी रुकावट के लोहरदगा पहुंच जाता है। यह पास उसे अपने बीमार पिता को ले जाने के लिए जारी किया गया था। बाद में उसके बारे में पता चलने पर अधिकारी उसे क्वारेंटाइन में भेजते हैं। उस युवक ने बताया कि एक प्रभावशाली राजनेता की पैरवी पर उसे यह पास मिला।
कोरोना संकट से बचने के लिए पिछले 28 दिन से लॉकडाउन में रह रहे झारखंड की राजधानी के ये दो वाकये यह बताने के लिए काफी हैं कि लॉकडाउन का अनुपालन कितना और कैसे हो रहा है। यह केवल झारखंड नहीं, बल्कि पूरे देश की हकीकत है। बिहार सरकार कहती है कि वह अपने यहां के छात्रों को कोटा से वापस नहीं ला सकती है, लेकिन सत्ताधारी गठबंधन के एक विधायक कोटा जाकर अपने बच्चे को पटना ले आते हैं। उत्तरप्रदेश सरकार चार सौ बसें भेज कर कोटा से अपने यहां के बच्चों को वापस ले आती है, लेकिन छत्तीसगढ़ सरकार को इसकी अनुमति नहीं दी जाती। झारखंड में विपक्ष कहता है कि यदि उत्तरप्रदेश सरकार अपने बच्चों को वापस ला सकती है, तो झारखंंड सरकार ऐसा क्यों नहीं कर सकती। सरकार पर आरोप लगाया जाता है कि वह ऐसा करना नहीं चाहती।
यह स्थिति बेहद खतरनाक रूप लेती जा रही है। झारखंड के लिए तो यह और भी विकट है। अपनी पूरी ताकत और पूरा संसाधन झोंक देने के बावजूद राज्य सरकार पर अनावश्यक दबाव बनाया जा रहा है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने जब इस मुद्दे को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बात की, तो ये समस्याएं सामने आयीं। बातचीत के दौरान केंद्र की ओर से भी कोई स्पष्ट आश्वासन झारखंड को नहीं मिला। यह कहना बड़ा आसान है कि जब उत्तरप्रदेश सरकार अपनी बसें कोटा भेज सकती है, तो झारखंड क्यों नहीं भेज सकता। लेकिन व्यवहार में इसमें कई दिक्कतें हैं। झारखंड से यदि बसें भेजी भी गयीं, तो उन्हें कोटा पहुंचने के लिए बिहार और उत्तरप्रदेश से होकर गुजरना होगा, जिसकी अनुमति लॉकडाउन की शर्तों के अनुसार, नहीं मिलेगी। झारखंड पूरी ईमानदारी से लॉकडाउन की शर्तों का पालन करने की कोशिश कर रहा है और यहां विधायकों को भी अपने क्षेत्र में घूमने की अनुमति नहीं दी जा रही है। ऐसे में यदि झारखंड सरकार ने इस मुद्दे पर केंद्र सरकार से हस्तक्षेप करने की मांग की है, तो यह अनुचित नहीं है।
कोरोना संकट शुरू होने से पहले केंद्र सरकार ने शानदार पहल करते हुए चीन, ईरान और इटली समेत दूसरे देशों में फंसे अपने लोगों को वापस लाने की व्यवस्था की। लेकिन देश के भीतर जहां-तहां फंसे लोगों की तरफ कोई ध्यान नहीं दिया गया। इस जले पर लॉकडाउन गाइडलाइन नामक नमक छिड़क दिया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि लाखों लोग दिल्ली के आनंद विहार टर्मिनल और मुंबई के बांद्रा स्टेशन पर जमा हो गये और सोशल डिस्टेंसिंग की धज्जियां उड़ीं। उसके बाद कोई साधन नहीं मिलने पर हजारों लोग पैदल ही अपने घर चले गये। रास्ते में कितनों ने दम तोड़ दिया। कई-कई हजार किलोमीटर की यात्रा लोगों ने साइकिल से, ठेले पर या आॅटो रिक्शा से तय की। और ये लोग जब गिरते-पड़ते अपने गृह राज्य की सीमा पर पहुंचे, तो उन्हें यह कह कर रोक दिया गया कि दूसरे राज्यों से आनेवालों का प्रवेश गाइडलाइन के अनुसार बंद है।
यह सब एक स्पष्ट गाइडलाइन के अभाव में हो रहा है। और इसका सीधा असर देश की अंदरूनी स्थिति पर पड़ रहा है। केंद्र और राज्य सरकारें अब तक जहां एकजुट होकर कोरोना के खिलाफ जंग लड़ रही थीं, अब इनमें दूरियां पैदा हो रही हैं। इन दरारों में राजनीति का कीचड़ भर रहा है, जो भविष्य के लिए खतरे का संकेत है। यदि इन दरारों को मजबूत सीमेंट से अभी नहीं भरा गया, तो कीचड़ के सूखने पर ये दरारें स्थायी हो जायेंगी, जिससे भारत का संघीय ढांचा ही खतरे में पड़ जायेगा। लॉकडाउन अंतत: टोटल ब्रेकडाउन में बदल जायेगा और भारत की 130 करोड़ की आबादी कोरोना के खिलाफ जंग जीत कर भी सब कुछ हार जायेगी। इसलिए केंद्र सरकार को इस जटिल मुद्दे पर तत्काल ध्यान देना चाहिए और हरेक के लिए न सिर्फ एक नीति तैयार करनी चाहिए, बल्कि उसे हर हाल में पालन भी करवाना चाहिए, ताकि इस जंग में जीत हासिल हो और हमारा अस्तित्व भी बचा रह सके।

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