कोरोना की दूसरी लहर से परेशान हाल झारखंड और महामारी की दहशत के साये में जी रहे यहां के सवा तीन करोड़ लोगों की नजरें अब अपने सांसदों और विधायकों की तरफ उठने लगी हैं। हालांकि पिछले पांच दिनों में कई सांसदों और विधायकों ने अपने चुनाव क्षेत्रों में कोरोना राहत के लिए कुछ-कुछ रकम देने की घोषणा और अनुशंसा की है। इन घोषणाओं का सकारात्मक संदेश भी गया है, साथ ही यह उम्मीद भी बंधी है कि अब झारखंड अपने सामने उत्पन्न संसाधनों की कमी की चुनौती से बहुत हद तक निबट लेगा। लेकिन सांसदों-विधायकों की मदद का बहुत अधिक असर इसलिए नहीं पड़ेगा, क्योंकि यह मदद टुकड़े-टुकड़े में मिली है। यदि सभी सांसद और विधायक मिल कर एक साथ सामूहिक मदद करें, तो फिर बड़ा अंतर पड़ सकता है और कोरोना से लड़ाई के लिए झारखंड को मजबूत हथियार भी मिल सकता है। अभी जो मदद मिल रही है, उसका एक पहलू यह भी है कि अपने विकास निधि का एक हिस्सा राहत के नाम पर खर्च करने की अनुमति देने के बाद इसका प्रचार इस तरह किया जा रहा है, मानो ये सांसद और विधायक विकास निधि के कुछ पैसे की अनुशंसा कर झारखंड पर एहसान कर रहे हों। यही नहीं, इक्का-दुक्का सांसद केंद्र सरकार के पास मदद के लिए पत्र भी लिख रहे हैं। लेकिन जब तक झारखंड के 14 सांसदों की सोच, नजरिया एक नहीं होगा, ये सामूहिकता में नहीं सोचेंगे, तब तक झारखंड का भला नहीं हो सकता। अब समय आ गया है, जब 14 सांसद किसी न किसी रूप में बैठक करें, वर्चुअल या बेविनार के माध्यम से ही सही, एक निर्णय पर पहुंचें और फिर एक साथ केंद्र सरकार के पास अनुरोध करें। यही काम झारखंड के 82 विधायकों (81+1) को भी करना होगा। उन्हें दलगत राजनीति से ऊपर उठ कर यह निर्णय लेना होगा कि उनकी विकास निधि का इस्तेमाल कैसे जनहित में हो सकता है। झारखंड के विधायक नली और गली में तो 20 साल से पैसा बहा रहे हैं, लेकिन उसकी हकीकत क्या है। नली बन गयी , तो उसमें पानी नहीं बहता, गली बन गयी, तो उसमें वाहन नहीं जा सकता। अब उन्हें ठोस संसाधन के लिए विकास मद का पैसा खर्चना पड़ेगा, तभी झारखंड का भला हो सकता है। जब केंद्र सरकार सांसदों की विकास निधि को रोक कर संसाधन में खर्च कर सकती है, तो राज्य सरकार विधायकों की विकास निधि को रोक कर संसाधन बढ़ाने में उसका इस्तेमाल क्यों नहीं कर सकती। सांसदों-विधायकों को अपनी दलगत राजनीति की संकीर्ण प्रवृत्ति से बचना होगा, क्योंकि अभी पूरे झारखंड का वजूद खतरे में है। मदद के लिए बढ़नेवाले हरेक हाथ का सम्मान किया जाना जरूरी होता है, लेकिन यह सम्मान हासिल करने की कोशिश करना ही मदद के महत्व को कम कर देता है, यह बात भी समझने की जरूरत है। झारखंड को बचाने के लिए सामूहिक प्रयास की जरूरत है और इसकी शुरूआत राजनीतिक दलों की ओर से हो जाये, तो सबसे बेहतर होगा। सांसदों-विधायकों की मदद और उसके परिणाम का विश्लेषण करती आजाद सिपाही के टीकाकार राहुल सिंह की रिपोर्ट।
खूंटी के सांसद अर्जुन मुंडा, पलामू के सांसद वीडी राम, रांची के संजय सेठ, गोड्डा के सांसद निशिकांत दुबे, धनबाद के सांसद पीएन सिंह और कई अन्य सांसदों ने अपने-अपने चुनाव क्षेत्रों में कोरोना राहत के लिए अपने विकास कोष का एक हिस्सा खर्च करने की सिफारिश की है या फिर अपने-अपने स्तर से केंद्रीय मंत्रियों से मदद की अपील कर रहे हैं। इसी तरह कई विधायकों ने भी अपनी विकास निधि के हिस्से का इस्तेमाल इस मद के लिए करना शुरू कर दिया है। विधायकों की सिफारिशें लगातार जिला प्रशासनों को मिल रही हैं। कोरोना महामारी के इस आपदा भरे दौर में यह राहत की बात है और इससे साफ हो गया है कि राज्य के सांसदों और विधायकों को भी झारखंड की स्थिति की फिक्र है। मदद का हाथ बढ़ा कर उन्होंने साबित किया है कि झारखंड को सुरक्षित रखने और उसे जरूरी संसाधन हासिल करने में वे सक्रिय भूमिका निभाने के लिए तैयार हैं।
लेकिन इस मदद का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि सांसदों-विधायकों द्वारा की जा रही मदद की घोषणा टुकड़े-टुकड़े में हो रही है, जिससे बहुत बड़ा अंतर पड़नेवाला नहीं है। यह अंतर तब दिखेगा, जब यह मदद सामूहिक रूप से की जाये और एक बड़ी रकम एकत्र की जाये। इसके अलावा सांसदों-विधायकों की मदद का इस्तेमाल कोई बड़ा संसाधन, जैसे अस्पताल या कोई उपकरण खरीदने में नहीं हो सकता है। इसलिए जरूरी है कि मदद का यह सिलसिला व्यक्तिगत और टुकड़े-टुकड़े में न होकर सामूहिक हो, ताकि राज्य को स्थायी रूप से संसाधन हासिल हो सके।
यह काम बहुत मुश्किल भी नहीं है। आपदा के दौर में मदद का यह सिलसिला यदि निजी की बजाय पार्टी स्तर पर शुरू किया जाये, तो सामूहिकता का रास्ता आसान हो सकता है। उदाहरण के लिए झारखंड से भाजपा के 12 सांसद और 26 विधायक हैं। यदि ये सभी मिल कर एक कोष बना कर रकम जमा करें और फिर उसे राज्य में संसाधन जुटाने के लिए दे दें, तो बहुत बड़ा काम हो सकता है। इसी तरह झामुमो के एक सांसद और 29 विधायक भी मिल कर एक कोष बना सकते हैं। कांग्रेस के 18 विधायक (बंधु तिर्की और प्रदीप यादव को मिला कर) और एक सांसद भी यह कदम उठा सकते हैं। यह एक सुझाव मात्र है, लेकिन इसका अंतिम परिणाम कितना बड़ा होगा, इसकी कल्पना आसानी से की जा सकती है। इसके लिए जरूरी है कि झारखंड की सभी राजनीतिक पार्टियां इस तरफ सक्रियता से सोचें। वे अपने सांसदों और विधायकों के साथ विचार-विमर्श कर इस तरह का अभियान शुरू कर सकती हैं। इसका परिणाम यह होगा कि संसाधन की कमी से जूझ रही झारखंड की स्वास्थ्य मशीनरी को बड़ी राहत मिल जायेगी। अस्पताल बनवाये जा सकेंगे और उपकरण खरीदे जा सकेंगे। अभी जिस तरह से सांसद और विधायक मदद के लिए लगातार आगे आ रहे हैं, उसी तरह राजनीतिक दलों को भी आगे आना होगा, क्योंकि आपदा के इस दौर का सबसे अधिक असर राजनीतिक दलों पर ही पड़ने की आशंका है। संकट के समय की गयी छोटी सी मदद को भी लोग हमेशा याद रखते हैं और यदि इस मदद में दलों का नाम जुड़ जाये, तो उसका अलग से राजनीतिक लाभ भी मिलेगा।
सांसदों-विधायकों द्वारा मदद किये जाने का एक दुखद पहलू भी है। उनके द्वारा की गयी हर मदद का प्रचार-प्रसार ऐसे किया जाता है, मानो यह एक एहसान है, जबकि हकीकत इसके ठीक विपरीत है। झारखंड का सांसद और विधायक होने से पहले वे झारखंड के वाशिंदे हैं, इस बात को हमेशा याद रखना चाहिए। इसके साथ उन्हें यह भी समझना होगा कि झारखंड का कुछ अधिकार उनके ऊपर भी है और आपदा के समय की गयी मदद उसी अधिकार का एक हिस्सा है। वैसे भी भारतीय धर्मग्रंथों में कहा गया है कि मदद तभी सार्थक होती है, जब बायें हाथ को पता नहीं चले कि दाहिने हाथ ने क्या और किसे दिया। यदि मदद का ढिंढोरा पीटा जाता है, तो यह उस महान कदम के प्रति अपमान के समान होता है।
इस सबके बावजूद झारखंड को आपदा की स्थिति से बचाने के लिए सांसदों-विधायकों की मदद का स्वागत ही किया जाना चाहिए, क्योंकि इससे लोगों को उम्मीद की रोशनी दिखाई दे रही है और हर तरफ निराशा के माहौल में कुछ सकारात्मक होता दिखता है। मदद का यह अभियान रुकना नहीं चाहिए, क्योंकि झारखंड को इसकी जरूरत है। अब राज्य सरकार और समाज के दूसरे वर्ग भी इस दिशा में आगे बढ़ेंगे और झारखंड को इस संकट से बाहर निकालने में अपनी सक्रिय भूमिका निभायेंगे। अब उम्मीद की जानी चाहिए कि झारखंड अपनी इच्छाशक्ति और आत्मबल से यह जंग भी जरूर जीतेगा।
झारखंड के सांसदों-विधायकों से एक और उम्मीद। झारखंड के हित में ये सांसद और विधायक दलगत राजनीति से ऊपर उठ कर एक साथ क्यों नहीं बैठ सकते। 14 लोकसभा सांसद और राज्यसभा के शिबू सोरेन, दीपक प्रकाश, महेश पोद्दार, समीर उरांव, मुख्तार अब्बास नकवी, धीरज प्रसाद साहू आखिर एक साथ बैठ कर झारखंड हित में कोई रणनीति क्यों नहीं बना सकते। वे एक साथ केंद्र सरकार से कोई बड़ा आग्रह क्यों नहीं कर सकते। यही काम यहां के विधायकों को भी करना पड़ेगा। अगर झारखंड के 82 विधायक (81 विधायक और एक मनोनीत) एक साथ बैठक करके किसी बड़ी सहमति पर पहुंचे और एक बड़ी निधि को संसाधन के मद में खर्च करें। महामारी काल में विधायकों और सांसदों को नली-गली से ऊपर उठना ही पड़ेगा। यह आजाद सिपाही का सुझाव मात्र है। किसी सांसद और विधायक को ठेस पहुंचाने की नियत से यह नहीं कहा जा रहा।