विशेष
बातचीत का प्रस्ताव देकर नक्सलियों ने मान ली अपनी हार
अब इसे खत्म करने के लिए अंतिम प्रहार करना आवश्यक

नमस्कार। आजाद सिपाही विशेष में आपका स्वागत है। मैं हूं राकेश सिंह।
केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा मार्च 2026 तक नक्सलवाद को पूरी तरह से खत्म करने के एलान और सुरक्षा बलों की आक्रामक कार्रवाई से घबराये नक्सली संगठनों ने सरकार से वार्ता का प्रस्ताव रखा है। भाकपा माओवादी की ओर से आये इस प्रस्ताव के बाद यह साफ हो गया है कि पिछले करीब पांच दशक से देश के विभिन्न इलाकों में बिना मतलब खून-खराबा करने और ‘बंदूक की नोक पर सत्ता हासिल करने’ का दंभ भरनेवाले नक्सली अब घुटनों पर आ गये हैं। हाल के दिनों में सुरक्षा बलों की कार्रवाई ने नक्सलियों की कमर तोड़ दी है। नक्सल समस्या इस देश के लिए और खास कर झारखंड-छत्तीसगढ़ के लिए बड़ी समस्या है। बंगाल के नक्सलबाड़ी से शुरू हुआ नक्सलवाद आज देश के आधा दर्जन राज्यों में गंभीर बीमारी का रूप ले चुका है। पिछले पांच दशक में नक्सलियों ने 50 हजार से अधिक लोगों की हत्या की है और सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया है, सो अलग। अब जब ये नक्सली चारों तरफ से घिर गये हैं और पिछले 15 महीने में इनके बड़े नेताओं को मार गिराया गया है, तब ये शांति वार्ता का प्रस्ताव लेकर आये हैं। नक्सलियों के साथ किसी भी किस्म की नरमी अब नहीं बरती जानी चाहिए, क्योंकि इसने देश और समाज को बड़ा नुकसान पहुंचाया है। अब तो सरकार को इस समस्या को जड़ से खत्म करने के लिए अंतिम प्रहार कर ही देना चाहिए। क्या है नक्सली समस्या और क्या है नक्सलियों के प्रस्ताव का सच, बता रहे हैं आजाद सिपाही के विशेष संवाददाता राकेश सिंह।

पिछले महीने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था कि मार्च 2026 तक देश से नक्सलियों का सफाया कर दिया जायेगा। उनकी यह बात अब सच साबित होने लगी है, क्योंकि अब नक्सलियों की तरफ से बातचीत का प्रस्ताव आ गया है। पिछले पांच दशक से ‘बंदूक के बल पर सत्ता हासिल करने’, लोकतंत्र को सर्वहारा वर्ग के साथ मजाक बताने और वोट बहिष्कार का नारा देकर हजारों लोगों की हत्या करने वाले नक्सलियों ने सरकार से वार्ता का प्रस्ताव ऐसे ही नहीं दिया है। भाकपा माओवादी की केंद्रीय समिति के प्रवक्ता अभय ने एक पर्चा जारी किया है। इसमें लिखा गया है कि पिछले 15 महीनों में नक्सलियों के चार सौ साथी मारे गये हैं। अगर नक्सलियों के खिलाफ अभियान रुकता है, तो वे शांति वार्ता के लिए तैयार हैं। लंबे समय के बाद यह पहली बार है, जब नक्सलियों ने बातचीत की इच्छा जतायी है। लेकिन नक्सल समस्या से जूझ रहे छत्तीसगढ़ के गृह मंत्री विजय शर्मा ने साफ कर दिया है कि बातचीत बिना शर्त होगा और इसके लिए नक्सल विरोधी अभियान को रोका नहीं जायेगा। उन्होंने कहा कि सरकार किसी भी प्रकार की सार्थक वार्ता के लिए तैयार है। उन्होंने कहा कि यदि नक्सली वास्तव में मुख्यधारा में लौटना चाहते हैं, तो उन्हें सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करना होगा कि वे क्या चाहते हैं। शर्मा ने कहा कि वार्ता का स्वरूप इस्लामिक स्टेट जैसी किसी कट्टरपंथी विचारधारा की तर्ज पर नहीं हो सकता। अगर कोई चर्चा करना चाहता है, तो उसे भारतीय संविधान की मान्यता स्वीकार करनी होगी।

घुटने पर आ गये हैं नक्सली
नक्सलियों की तरफ से बातचीत का प्रस्ताव ऐसे ही नहीं आया है। इनको पता चल गया है कि यदि इन्होंने हथियार नहीं डाला, तो इनका सफाया निश्चित है। पिछले पांच दशकों में इन नक्सलियों ने अपने प्रभाव वाले इलाके में पूरे सिस्टम को बंधक बना लिया था। वे लोगों की हत्या कर रहे थे, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचा रहे थे और लेवी वसूल कर अपनी जेब भर रहे थे। नक्सलियों की उग्र विचारधारा कहीं पीछे छूट चुकी थी। ऐसे में जब सुरक्षा बल उन पर भारी पड़ने लगे हैं और नक्सलियों के सफाये में जुट गये हैं, नक्सलियों के लिए बातचीत का प्रस्ताव करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बच गया है।

क्या है सरकार का रवैया
नक्सल समस्या के खात्मे के लिए सरकार दो तरह से काम कर रही है, सरेंडर या गोली। सरकार का पूरा फोकस सरेंडर पर है। नयी नक्सल पॉलिसी भी तैयार है, जिसे केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह लांच करेंगे। नयी सरेंडर पॉलिसी में एक तरह से सरकार आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों की पूरी चिंता करेगी या यूं कहें कि माओवादियों को तीन साल के लिए गोद लेगी। यही नहीं, वे सरेंडर करते ही लखपति बन जायेंगे। लेकिन ऐसा होना आसान नहीं है। नक्सलियों को ये फायदा तभी मिलेगा, जब यह तय हो जायेगा कि वे असलियत में नक्सली हैं। और यह तय करेगी जिला स्तर पर बनायी गयी कमेटी।

पहले ठुकरा चुके हैं सरकार की पेशकश
नक्सलियों के साथ सरकार ने पहले भी कई बार बातचीत की पेशकश की है, लेकिन हर बार नक्सली कोई न कोई ऐसी शर्त रख देते हैं कि बातचीत की संभावना ही खत्म हो जाती है। कई बार तो सामाजिक संगठनों ने बातचीत के लिए पहल शुरू की, लेकिन सब कुछ बेकार हो गया।

सरकार को क्या करना चाहिए
वैसे भारतीय संविधान में हर किसी को अपनी बात रखने का अधिकार है। संविधान के दायरे में सरकार बातचीत कर सकती है, लेकिन इसके लिए माहौल बनाने की जिम्मेवारी नक्सलियों की है। सरकार को नक्सलियों से जरूर बातचीत करनी चाहिए, लेकिन यह सब उस गारंटी के साथ होना चाहिए कि नक्सली अब खून-खराबा नहीं करेंगे और लेवी नहीं वसूलेंगे। सरकार को यह गारंटी भी लेनी चाहिए कि नक्सली अपनी गतिविधियों को पूरी तरह बंद कर देंगे और जो सरकार को चुनौती देगा, उससे कड़ाई से निपटा जायेगा। सरकार पर दबाव बनाकर कोई मनोवैज्ञानिक लाभ लेना चाहता है, तो उसे ये छूट नहीं दी जानी चाहिए। नक्सली भी जानते हैं कि सरकार उनकी शर्तों को नहीं मानेगी। माओवादी जानबूझ कर ऐसी शर्तें रखते हैं, जिससे सरकार बातचीत के लिए तैयार नहीं हो।

कुल मिलाकर बातचीत के जरिये नक्सलवाद का कोई अंत होता भविष्य में तो नजर नहीं आ रहा है। सरकार नक्सलियों की सशर्त बातचीत की पेशकश कभी स्वीकार नहीं करेगी। नक्सली भी यही चाहते हैं कि वार्ता शुरू होने से पहले ही टूटने का ठीकरा उनके माथे पर नहीं फोड़ा जाये।

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