रांची। झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) द्वारा आयोजित सहायक वन संरक्षक मुख्य परीक्षा में सामने आई गंभीर त्रुटियों को लेकर नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने राज्य सरकार पर तीखा हमला बोला है। 6 अप्रैल 2026 को हुई इस परीक्षा के प्रश्नपत्र में 100 से अधिक त्रुटियां पाई गई हैं, जिससे अभ्यर्थियों में भारी रोष है।
बाबूलाल मरांडी ने सोशल मीडिया पर सवाल उठाते हुए कहा, “क्या प्रश्न पत्र? कैसी परीक्षा?” उन्होंने आरोप लगाया कि स्थिति इतनी चिंताजनक है कि सर्वोच्च न्यायालय जैसे संवैधानिक शब्दों से लेकर झारखंड के महापुरुषों के नाम तक गलत छापे गए हैं। मरांडी ने आरोप लगाया कि जब परीक्षा से पहले ही राज्य सरकार सीटों का सौदा कर ले तो फिर परीक्षा महज औपचारिकता बनकर रह जाती है। उनका कहना था कि यही लापरवाही का परिणाम है कि आज प्रश्नपत्र में इतनी बड़ी गड़बड़ी सामने आई है।
नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि JPSC से चयनित अधिकारी राज्य के नीति निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसी लापरवाही न केवल अभ्यर्थियों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है, बल्कि संस्थान की विश्वसनीयता को भी गहरा आघात पहुंचाती है। उन्होंने आरोप लगाया कि हेमंत सोरेन ने भ्रष्ट अधिकारी को अध्यक्ष और झामुमो कार्यकर्ताओं को सदस्य के रूप में नियुक्त कर JPSC जैसी संस्था की गरिमा धूमिल कर दी है। मुख्यमंत्री के राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण JPSC की विश्वसनीयता भी प्रभावित हो रही है।
बाबूलाल मरांडी ने मांग की है कि यह भद्दा मजाक किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं है। हेमंत सोरेन को JPSC अध्यक्ष को तत्काल पदमुक्त करना चाहिए और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषियों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई सुनिश्चित करनी चाहिए।
दरअसल, 78 पदों के लिए हुई इस मुख्य परीक्षा के 200 अंकों के प्रश्नपत्र में हिंदी भाषा की कई बड़ी त्रुटियां सामने आई हैं। बुनियादी शब्दों की वर्तनी तक गलत पाई गई। ‘सिद्धू-कान्हू’ को ‘सिडो-कान्हू’, ‘ऐतिहासिक’ को ‘इतिहासिक’, ‘गठन’ को ‘गढ़न’ और ‘मुख्य’ को ‘उखय’ लिखा गया। इसके अलावा ‘कारणों’ को ‘कारणे’, ‘जन आंदोलन’ को ‘आएंलनों’, ‘मिशनरियों’ को ‘मिशनीयों’, ‘गतिविधियों’ को ‘गतिदिधियों’, ‘प्रश्न’ को ‘प्रशन’ और ‘शैक्षणिक’ को ‘शांसिक’ जैसे कई गलत शब्द प्रश्नपत्र में शामिल थे। कई जगह पूरे वाक्य ही गलत ढंग से लिखे गए, जिससे अभ्यर्थियों को प्रश्न समझने में भारी परेशानी हुई।
अभ्यर्थियों का कहना है कि इस तरह की त्रुटियों से न केवल परीक्षा की गुणवत्ता प्रभावित हुई, बल्कि इसकी निष्पक्षता पर भी सवाल खड़े हो गए हैं। इस पूरे मामले को लेकर अब राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है और आयोग की कार्यप्रणाली एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गई है।



