ढाका। ढाका में संवैधानिक सुधारों को लेकर सियासी माहौल गरमा गया है। इस मुद्दे पर सरकार और विपक्ष के बीच विश्वास का गंभीर संकट पैदा हो गया है। जातीय संसद में विपक्ष के नेता और बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी के अमीर शफीकुर रहमान ने आरोप लगाया है कि संसदीय बहस के दौरान कानून मंत्री ने उनके बयान को गलत तरीके से पेश किया, जिससे भ्रम की स्थिति पैदा हो गई।
मंगलवार देर रात आयोजित एक ब्रीफिंग में शफीकुर रहमान ने कहा कि संवैधानिक सुधारों पर चर्चा के दौरान सत्ताधारी दल ने एक समिति बनाने का प्रस्ताव रखा था। उन्होंने स्पष्ट किया कि विपक्ष इस मुद्दे का समाधान चाहता है, न कि कोई नया विवाद खड़ा करना। उन्होंने कहा कि यदि सुधार परिषद को लेकर कोई समिति बनाई जाती है, तो विपक्ष उसे सकारात्मक रूप से लेने के लिए तैयार है।
हालांकि, उन्होंने यह भी साफ किया कि समिति में दोनों पक्षों का समान प्रतिनिधित्व होना जरूरी है। उनका कहना था कि यदि समिति का गठन आनुपातिक आधार पर किया गया, तो निष्पक्ष और सकारात्मक परिणाम की संभावना कम हो जाएगी। इस मुद्दे पर उन्होंने सरकार से संतुलित और पारदर्शी प्रक्रिया अपनाने की मांग की।
शफीकुर रहमान ने यह भी आरोप लगाया कि जब विपक्ष ने लचीला रुख अपनाया, तब कानून मंत्री ने उनके बयान को इस तरह पेश किया मानो विपक्ष ने संवैधानिक संशोधन के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया हो। उन्होंने कहा कि विपक्ष ने किसी भी संशोधन प्रस्ताव पर सहमति नहीं दी थी, बल्कि केवल सुधार की प्रक्रिया पर चर्चा की थी। उनके अनुसार, यह पूरी तरह गलत व्याख्या है, जिससे अनावश्यक विवाद उत्पन्न हुआ।
उन्होंने बताया कि जब वे इस पर स्पष्टीकरण देना चाहते थे, तब तक संसदीय सत्र समाप्त हो चुका था। स्पीकर ने चर्चा खत्म होने की घोषणा कर दी थी और उन्हें बोलने का मौका नहीं मिल सका। हालांकि, उन्हें अगले दिन अपनी बात रखने का आश्वासन दिया गया है।
विपक्ष के नेता ने देश के ऐतिहासिक आंदोलनों का हवाला देते हुए कहा कि 1952 का भाषा आंदोलन, 1971 का मुक्ति संग्राम, 1990 का जन आंदोलन और 2004 का जन-विद्रोह—इन सभी के बावजूद जनता की आकांक्षाएं पूरी नहीं हो सकीं। ऐसे में संवैधानिक सुधार समय की मांग बन गया है।
उन्होंने यह भी कहा कि विभिन्न अंतरिम सरकारी सुधार आयोगों और राष्ट्रीय आम सहमति आयोग की सिफारिशों के आधार पर ‘जुलाई राष्ट्रीय चार्टर’ तैयार किया गया था, जिसमें सुधार से जुड़े महत्वपूर्ण प्रस्ताव शामिल हैं। इसके तहत संसद के गठन के 30 कार्य दिवसों के भीतर सुधार परिषद की बैठक होना अनिवार्य है, लेकिन अब तक इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।
मौजूदा स्थिति को देखते हुए यह स्पष्ट है कि बांग्लादेश में संवैधानिक सुधार का मुद्दा अब राजनीतिक टकराव का रूप ले चुका है। यदि सरकार और विपक्ष के बीच विश्वास बहाल नहीं होता, तो सुधार प्रक्रिया और अधिक जटिल हो सकती है।



