- 1980 के पहले यहां सैकड़ों माइंस का संचालन हुआ करता था
- बिहार माइका एक्ट को विलोपित कर झारखंड माइका एक्ट बनाये सरकार
आजाद सिपाही संवाददाता
रांची। भाजपा विधायक दल के नेता बाबूलाल मरांडी ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को पत्र लिखकर गिरिडीह और कोडरमा के माइका उद्योग को पुनर्जीवित करने का आग्रह किया है। श्री मरांडी ने कहा है कि कोरोना संकट में इस उद्योग को पुनर्जीवित करना जिले के लोगों के लिए वरदान साबित हो सकता है। इससे न सिर्फ लाखों लोगों को रोजगार मिलेगा बल्कि सरकार को भी राजस्व की प्राप्ति होगी। उन्होंने कहा कि गिरिडीह और कोडरमा जिला पूरी दुनिया में अबरख नगरी के रूप में विख्यात रहा है। यहां के अबरख की गुणवत्ता भी अच्छी है। 1980 के पहले यहां सैकड़ों माइंस का संचालन हुआ करता था जिससे लाखों लोगों को रोजगार मिलता था। विभिन्न कारणों से जीर्ण-शीर्ण अवस्था में पड़े इस व्यवसाय को पुनर्जीवित किया जाना चाहिए।
मनरेगा और पौधारोपण से बड़ी आबादी को रोजगार देना मुश्किल
उन्होंने कहा कि गिरिडीह और कोडरमा से लाखों की संख्या में मजदूर देश के विभिन्न हिस्सों में जाकर अपना जीविकोपार्जन करते हैं। कोरोना महामारी के कारण हुए लॉकडाउन के बाद से प्रवासी मजदूरों की घर वापसी का सिलसिला जारी है। बड़ी तादाद में प्रवासी मजदूर अपने घर वापस लौट भी आये हैं। अभी जो परिस्थितियां हैं उसमें स्थिति सामान्य होने में महीनों लगेंगे। प्रवासी मजदूर तुरंत अपने कार्यस्थल पर लौटेंगे इसकी संभावना दूर-दूर तक नहीं दिखती है। ऐसे में इन लाखों मजदूरों के समक्ष रोजी-रोटी की चिंता स्वाभाविक है। सरकार की ओर से मनरेगा और पौधा रोपण से रोजगार के अवसर उपलब्ध कराये जा रहे हैं पर ये नाकाफी हैं। उन्होंने कहा कि बिहार माइका एक्ट को विलोपित कर सरकार को झारखंड माइका एक्ट के रूप में नया एक्ट बनाना चाहिए। वहीं माइका व्यवसायियों के लाइसेंस का नवीकरण नहीं होने से भी सरकार को राजस्व की हानि हो रही है। 6 इंच से छोटे माइका और ढिबरा चुनने और उसके भंडारण तथा परिवहन पर वन विभाग तथा पुलिसिया कार्रवाई पर रोक लगाने की जरूरत है।
ढिबरा चुननेवाले गरीबों को स्वनियोजन का अधिकार देने की जरूरत
उन्होंने कहा कि वन विभाग और उसके बाहर ढिबरा चुननेवाले गरीबों को ढिबरा पिकर का नाम देकर उन्हें स्वनियोजन का अधिकार देने की जरूरत है। वहीं समुचित मात्रा में ढिबरा जमा होने पर विभाग की ओर से तय दर या नीलामी से माइका व्यवसासी को बेचकर उसकी कीमत का भुगतान तत्काल सुनिश्चित करना चाहिए। इसके अलावा भी माइका व्यवसायियों को उनके व्यवसायिक गंतव्य तक बिना व्यवधान के परिवहन की पारदर्शी व्यवस्था सरकार को करनी चाहिए। रैयती और गैर मजरुआ जमीन पर तो खनन पट्टा और अधिकार मिले ही, वैसे वन क्षेत्र जो नाम मात्र के वन रह गये हैं उन्हें भी वनभूमि के दायरे से बाहर कर वहां भी खनन पट्टा दिये जाने की जरूरत है। लगभग पचास माइका के माइंस चालू होने से 50 हजार से अधिक कुशल, अकुशल और अर्द्धकुशल मजदूरों को नियोजन मिल सकता है। शीट माइका और अन्य माइका के प्रसंस्करण से दो लाख मजदूरों का नियोजन किया जा सकता है। झारखंड में निवेश करने को इच्छुक व्यवसायी को बड़े भू-भाग पर माइंस की स्वीकृति देने की जरूरत है। इससे न सिर्फ हजारों करोड़ का निवेश होगा बल्कि प्रवासी मजदूरों को रोजगार मिलने का मार्ग भी प्रशस्त होगा। केवल माइका ही क्यों, जहां, जिस क्षेत्र में जिसकी बहुलता है उसे उस क्षेत्र के लिए रोजगार का प्रमुख साधन बनाकर अपने ही क्षेत्र में लोगों को रोजगार उपलब्ध कराने की दिशा में पहल करने की जरूरत है।