आज से ठीक दो महीने पहले जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोरोना के खिलाफ जंग की शुरुआत करते हुए देशव्यापी लॉकडाउन की घोषणा की थी, पूरा देश उनके साथ खड़ा था। कश्मीर से कन्याकुमारी तक और कच्छ से अरुणाचल प्रदेश तक हर राज्य की सरकारोें ने तमाम राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता को किनारे रख कर इस वैश्विक महामारी को हराने के लिए एकजुटता दिखायी और इस कारण आज भारत इस जंग में जीत के मुहाने पर खड़ा है। लेकिन पिछले कुछ दिनों से, खास कर केंद्र सरकार द्वारा विशेष आर्थिक पैकेज घोषित किये जाने के बाद से इस चट्टानी एकजुटता में दरार दिखने लगी है। पहले प्रवासी मजदूरों की वापसी के लिए विशेष ट्रेन चलाने को लेकर केंद्र और राज्य सरकारों के बीच कटुता पैदा हुई। उसके बाद आज से शुरू हुई विमान सेवाओं के मुद्दे पर जिस एकता की जरूरत थी, उसकी कहीं न कहीं कमी दिखाई देने लगी है। यह खाई कोरोना के खिलाफ जंग में देश की सुनिश्चित जीत की संभावना को कमजोर करेगी। केंद्र और राज्यों के बीच का विवाद सामान्य दिनों में तो ठीक है, लेकिन संकट के इस दौर में, जब सभी का ध्यान इस संक्रमण को फैलने से रोकने के उपायों पर केंद्रित होना चाहिए, इस तरह का कन्फ्यूजन दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जा सकता है। केंद्र को पहले राज्य सरकारों की जरूरतों और उनकी समस्याओं को समझना होगा और राज्यों को भी केंद्र के साथ विवाद की बजाय मिल-बैठ कर समस्याओं को सुलझाना होगा, तभी देश इस जंग को जीतने की दिशा में आगे बढ़ सकेगा। केंद्र और राज्य सरकारों के बीच चौड़ी हो रही खाई का विश्लेषण करती आजाद सिपाही ब्यूरो की विशेष रिपोर्ट।
हमने प्रवासी श्रमिकों को उनके घर भेजने के लिए 80 ट्रेनें मांगी थीं, लेकिन केवल 40 ही मिलीं। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे रविवार को जिस समय यह बयान दे रहे थे, लगभग उसी समय रेल मंत्री पीयूष गोयल ट्विटर पर महाराष्ट्र सरकार से ट्रेनों और उसमें सफर करनेवालों की सूची मांग रहे थे। रात दो बजे तक यह वाक युद्ध जारी रहा, लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला। इसी तरह केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री हरदीप पुरी ने अचानक एलान कर दिया कि 25 मई से घरेलू उड़ानें शुरू होंगी। दो महीने से विभिन्न स्थानों पर फंसे लोगों ने टिकट खरीदे और तय समय पर हवाई अड्डे पर पहुंच गये। लेकिन अंतिम समय में उन्हें पता चला कि उनकी उड़ान रद्द कर दी गयी है। पुरी के एलान के बावजूद आंध्रप्रदेश, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र ने अपने राज्य में विमानों के आने की अनुमति देने से इनकार कर दिया। झारखंड की सत्तारूढ़ पार्टी झामुमो ने भी कहा कि विमानों का आवागमन शुरू होने से समस्या और गहरायेगी।
इससे पहले श्रमिकों के लिए विशेष ट्रेन के किराये के मुद्दे पर कई राज्य सरकारों के साथ रेल मंत्रालय का विवाद हो चुका है। यह विवाद इतना बढ़ गया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इसमें दखल देना पड़ा और श्रमिकों का किराया केंद्र द्वारा चुकाये जाने की बात कही गयी। इसी तरह राज्य सरकारों के बीच बसों के परिचालन को लेकर अप्रिय स्थिति पैदा हुई। पश्चिम बंगाल ने झारखंड और बिहार से आनेवाली बसों को अपने राज्य में प्रवेश करने से रोक दिया, तो यूपी सरकार ने किसी भी दूसरे राज्य से आनेवाले किसी भी वाहन या व्यक्ति के राज्य में घुसने पर पाबंदी लगा दी। इसी विवाद के कारण राजस्थान और यूपी की पुलिस के बीच एक स्थान पर मारपीट भी हो गयी। अब मध्यप्रदेश और यूपी सरकार ने कहा है कि उनकी अनुमति के बिना उनके यहां के लोग दूसरे राज्यों में काम करने के लिए नहीं जा सकते हैं। इतना ही नहीं, दूसरे राज्यों के लोग यूपी में बिना अनुमति के काम करने के लिए आ भी नहीं सकते हैं।
इन तमाम विवादों से साफ हो गया है कि वैश्विक महामारी कोरोना के खिलाफ जंग के लिए आवश्यक एकजुटता कमजोर पड़ रही है। दो महीने पहले जब दुनिया के सबसे बड़Þे लोकतंत्र ने इस जंग के लिए खुद को आगे किया था, तब किसी ने यह कल्पना भी नहीं की होगी कि भारत इतनी जल्दी और इतनी कुशल रणनीति से कोरोना के संक्रमण को फैलने से रोक देगा। जब यह संकट शुरू हुआ था, तब विशेषज्ञों ने भविष्यवाणी की थी कि एक महीने के बाद भारत में कोरोना संक्रमितों की संख्या 5.35 लाख और इस बीमारी से मरनेवालों की संख्या 38 हजार से अधिक होगी। इन विशेषज्ञों में देश के शीर्षस्थ वैज्ञानिक और डॉक्टर शामिल थे। लेकिन देश की एकजुटता ने उनकी भविष्यवाणी को गलत साबित कर दिखाया। आज लॉकडाउन के दो महीने बाद भी देश में न तो इतने संक्रमित हैं और न ही इतनी मौतें हुई हैं। लॉकडाउन और सोशल डिस्टेंसिंग समेत दूसरे प्रोटोकॉल का सख्ती से पालन करने के कारण ही यह संभव हो सका। जिन राज्यों में कोरोना का कोई संक्रमण नहीं था या बेहद कम था, उन राज्यों ने भी लॉकडाउन और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन किया।
लेकिन हाल के इन विवादों ने देश की चिंता बढ़ा दी है। विशेष कर केंद्र द्वारा घोषित विशेष आर्थिक पैकेज के बाद विवादों का तांता लग गया। चाहे केंद्र हो या राज्य सरकार, हर फैसले पर विवाद शुरू हो गया। श्रमिक स्पेशल ट्रेन हो या पीपीइ किट और वेंटीलेटर उपलब्ध कराने का मुद्दा हो या फिर विमान सेवा शुरू करने या श्रमिकों को दोबारा उनके काम पर लौटने के लिए प्रोत्साहित करने का मुद्दा हो, केंद्र और राज्यों ने एक-दूसरे को आंखें दिखानी शुरू कर दी हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है। हर किसी को समझना होगा कि इन विवादों से कोरोना के खिलाफ जंग में देश की स्थिति कमजोर हो रही है। बाहर से आनेवाले श्रमिकों के माध्यम से कोरोना संक्रमितों की संख्या लगातार बढ़ रही है, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है। इसलिए राज्य सरकारों की चिंता और आपत्ति भी वाजिब है। झारखंड जैसे राज्य में, जहां बड़ी संख्या में संक्रमितों की देखभाल करने लायक सुविधा उपलब्ध नहीं है, यदि मरीजों की संख्या बढ़ती है, तो इससे राज्य को खतरा होगा। इसलिए केंद्र और राज्य सरकारों को चाहिए कि वे मिल-बैठ कर विवादों का निबटारा करें और यह जितनी जल्दी होगा, देश के लिए उतना ही अच्छा होगा।