नरेंद्र मोदी के दूसरे कार्यकाल का पहला सबसे बड़ा चुनाव था पश्चिम बंगाल का विधानसभा चुनाव, जिसे जीतने के लिए खुद प्रधानमंत्री और भाजपा के दूसरे नेताओं ने अपनी पूरी ताकत लगा दी थी। इस कारण कभी-कभी ऐसा लगने लगा था कि यह विधानसभा का नहीं, बल्कि लोकसभा का चुनाव है। केंद्र में अपनी सरकार की सात साल की पूरी लोकप्रियता को बंगाल की चुनावी आग में झोंकने के बावजूद भाजपा राज्य में सत्ता हासिल नहीं कर सकी और 77 सीटों पर अटक गयी। चुनाव से पहले तक पार्टी नेता जहां दो सौ का आंकड़ा पार करने का दावा कर रहे थे, वह हकीकत में नहीं बदला। लेकिन बंगाल के चुनाव ने भाजपा को सियासत का वह पाठ सिखाया है, जो पिछले सात साल से पार्टी नेतृत्व भूल सा गया था। बंगाल में जितनी बड़ी संख्या में तृणमूल कांग्रेस, वाम दलों और कांग्रेस के नेताओं ने भाजपा ने अपने पाले में लाकर उन्हें चुनाव मैदान में उतारा, उनमें से अधिकांश चुनाव हार गये। शुभेंदु अधिकारी या मुकुल रॉय इसके अपवाद हैं, क्योंकि नंदीग्राम और कृष्णानगर में इस दोनों नेताओं की अपनी पहचान है। उनकी जीत में पार्टी का कोई विशेष योगदान नहीं है। भाजपा को इन उधार के नेताओं से दोहरा नुकसान हुआ, क्योंकि वह सीट भी नहीं निकाल सकी और उसके पुराने कार्यकर्ताओं में असंतोष भड़का। इससे सत्ता पाने का उसका सपना बुरी तरह टूट गया। भाजपा नेतृत्व को इस सीख को गंभीरता से आत्मसात करना होगा, क्योंकि यह बात एक हद तक उसे टुकड़े-टुकड़े में दूसरे राज्यों में भी मिलती रही है। झारखंड के मधुपुर में हुए उपचुनाव में भी भाजपा की हार का यही एक प्रमुख कारण रहा। पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणाम में भाजपा के प्रदर्शन का विश्लेषण करती आजाद सिपाही के कोलकाता ब्यूरो चीफ हृदय नारायण सिंह की खास रिपोर्ट।
घटना बहुत पुरानी नहीं है। पिछली सदी के आठवें दशक के अंतिम वर्ष (1979) में भारत के पड़ोसी देश अफगानिस्तान में मुजाहिदीन लड़ाकों के विद्रोह को दबाने के लिए वहां की तत्कालीन साम्यवादी सरकार ने सोवियत संघ से मदद मांगी। सोवियत संघ के तत्कालीन प्रमुख ब्रेझनेव मदद के लिए तैयार हो गये और उन्होंने अपनी सेना वहां भेज दी। सोवियत संघ की सेना अफगानिस्तान की तरफ से स्थानीय लोगों से लड़ने लगी, जिससे दुनिया में दूसरे विश्व युद्ध के बाद सबसे तनावपूर्ण स्थिति पैदा हुई, जिसे दो महाशक्तियों के बीच शीत युद्ध की संज्ञा दी गयी। करीब 10 साल तक अफगानिस्तान के स्थानीय लोगों से लड़ने के बावजूद सोवियत संघ की सेना कोई कमाल नहीं कर सकी और 1989 में उसे वापस जाना पड़ा।
आधुनिक विश्व इतिहास की यह घटना युद्ध शास्त्र के उस पुराने सिद्धांत को स्थापित करती है कि उधार के सैनिकों से युद्ध लड़ा तो जा सकता है, लेकिन उसे जीता नहीं जा सकता। भारत की राजनीति में यह सिद्धांत इन दिनों पूरी तरह फिट बैठता है, क्योंकि आज जिस आक्रामकता से साथ चुनाव लड़े जा रहे हैं, वे किसी युद्ध से कम नहीं हैं।
खास कर महज 24 घंटे पहले संपन्न हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के परिणाम के विश्लेषण से तो यह सिद्धांत एक बार फिर सही साबित हुआ है। बंगाल की सत्ता हासिल करने का सपना देख रही भाजपा ने इस चुनाव को एक युद्ध की तरह लड़ा। उसने सारे दांव चले, अपना सब कुछ झोंक दिया, लेकिन उसका सपना अंतत: अधूरा रह गया। पार्टी लड़ी तो जरूर और उसने 77 सीटें जीत कर पहली बार राज्य में मुख्य विपक्ष का दर्जा हासिल किया, लेकिन सत्ता की कुर्सी पर बैठने का उसका सपना पूरा नहीं हुआ। भाजपा की अपेक्षा से वहां उसे मात्र एक तिहाई सीटें ही मिलीं। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि भाजपा ने उधार की सेना के भरोसे यह लड़ाई लड़ी। पार्टी ने बंगाल की सत्ता के लिए अपनी पुरानी नीतियों को छोड़ दिया, अपने सिद्धांतों की बलि चढ़ा दी और केंद्र में अर्जित सात साल की उपलब्धियों को दांव पर लगा दिया, क्योंकि उसे हर कीमत पर बंगाल की सत्ता की लालसा थी। लेकिन वह पिछड़ गयी और इस असफलता ने उसे राजनीति का पुराना पाठ याद दिला दिया है।
भाजपा ने आंखें बंद कर तृणमूल कांग्रेस, वामपंथी दलों और कांग्रेस के कई नेताओं को चुनाव से ठीक पहले अपने पाले में किया। ऐसा कर पार्टी नेतृत्व को यह भरोसा हो गया था कि ये नेता अपने इलाके को इस बार भगवा रंग में रंगने में कामयाब हो जायेंगे। पार्टी ने उन्हें न केवल अपने पाले में किया, बल्कि उनमें से कई को चुनाव मैदान में उतार भी दिया। इसका परिणाम हुआ कि पार्टी के पुराने और समर्पित नेताओं में निराशा घर कर गयी। अपनी निष्ठा और समर्पण का यह हश्र देख वे उदासीन होते गये। उधर पार्टी के वोटर, जिन्होंने लोकसभा चुनाव में दूसरे दलों के नेताओं के विरोध में वोट दिया था, वे इस बार भी उन नेताओं के विरोध में ही रहे। इस नाराजगी का खामियाजा भाजपा को उठाना पड़ा। हालांकि शुभेंदु अधिकारी और मुकुल रॉय सरीखे कुछ नेता इसके अपवाद हैं, लेकिन इनकी जीत में भाजपा की कोई भूमिका नहीं रही। चाहे नंदीग्राम हो या कृष्णानगर, वहां इन दोनों नेताओं का अपना दबदबा है। वहां के लोग किसी पार्टी को नहीं, बल्कि इन नेताओं को वोट देते हैं।
ऐसा नहीं है कि भाजपा को उधार के सैनिकों के कारण पहली बार बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है। झारखंड के मधुपुर में हुए उप चुनाव में पार्टी की हार का एक प्रमुख कारण भी वहां पार्टी में नये आये नेता को मैदान में उतारना रहा। इससे पहले दिसंबर 2019 में झारखंड विधानसभा के चुनाव में भी भाजपा ने दूसरे दलों के नेताओं को अपने पाले में करने के बाद उन्हें टिकट दिया था और उनमें से अधिकांश चुनाव जीतने में असफल रहे थे।
भाजपा का नेतृत्व इस बात से संतोष कर सकता है कि उसने बंगाल में अपना जनाधार बहुत बढ़ा लिया है और तीन से 77 पर पहुंच गया है, लेकिन हकीकत यह है कि इनमें से कम से कम आधा दर्जन सीट दूसरे दलों से आये नेताओं ने अपने बल-बूते जीती है। बाकी की 70 सीटों में 65 सीटें कांग्रेस और वाम मोर्चा की हैं, जिनके मतदाता तृणमूल कांग्रेस से त्रस्त थे और वे किसी भी कीमत पर तृणमूल का समर्थन नहीं कर सकते थे। वह चाहते थे कि कोई मजबूत विपक्ष खड़ा हो, जो तृणमूल कांग्रेस को सबक सिखा सके। भाजपा में उन्हें वह चेहरा दिखा और वे मतदाता कांग्रेस और वाम मोर्चा उम्मीदवार की जगह भाजपा उम्मीदवारों में विश्वास जताया। इस तरह अगर देखा जाये, तो विधानसभा में हकीकत में भाजपा का अपना जनाधार नहीं बढ़ा है, बल्कि वोट शिफ्ट होने के कारण भाजपा को यह समर्थन मिला है, जिसे स्थायी नहीं कहा जा सकता। सच तो यही है कि गत लोकसभा की जिन 18 सीटों पर भाजपा को जीत मिली थी, उसके अंतर्गत आनेवाली कई विधानसभा सीटों पर भाजपा उम्मीदवार हार गये। यही नहीं, उसके तीन कद्दावर लोकसभा सांसद भी, जो विधानसभा में अपनी किस्मत आजमा रहे थे, चुनावी रण में खेत रहे।
अब भाजपा नेतृत्व को इस बात पर गंभीरता से विचार करना होगा कि पार्टी के कॉरपोरेटीकरण का नतीजा हमेशा अनुकूल नहीं होता है। राजनीति और चुनाव एक अलग विधा है। इसे अभिनय और कॉरपोरेट जैसी दूसरी विधाओं के साथ मिला देने से एक खतरनाक मिश्रण तैयार हो जाता है, जिसका सेहत पर बुरा असर पड़ता है। भाजपा जितनी जल्दी यह सीख लेगी, उसके लिए उतना ही लाभकारी होगा। भाजपा को अपने अतीत से भी सीख लेनी चाहिए। अगर 2 से वह सौ और फिर केंद्र की सत्ता तक पहुंची, तो उसमें उधार के सैनिक नहीं थे, बल्कि पार्टी के तपे-तपाये कार्यकर्ता थे, जिन्होंने भाजपा का झंडा ढोने में अपना जीवन खपा दिया।
पार्टी के कॉरपोरेटीकरण ने कराया बड़ा नुकसान