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    Home»Breaking News»कोरोना के बाद का असर है बड़ा खतरनाक
    Breaking News

    कोरोना के बाद का असर है बड़ा खतरनाक

    azad sipahiBy azad sipahiMay 23, 2021No Comments7 Mins Read
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    परेशानी : ब्लैक फंगस से लेकर कई अन्य बीमारियों से निपटना है कठिन चुनौती

    झारखंड समेत पूरे देश में कोरोना की दूसरी लहर के कमजोर पड़ते जाने के बावजूद इस महामारी ने एक बड़ी चुनौती सामने लाकर रख दी है और वह है कोरोना से उबर चुके लोगों की अन्य बीमारियां। कोरोना के बाद अब ब्लैक फंगस और ह्वाइट फंगस ने देश भर में कोहराम मचा रखा है। इसके अलावा कई ऐसे लोग मौत के मुंह में समा जा रहे हैं, जो कोरोना से उबर चुके थे, लेकिन उनके शरीर की प्रतिरोधक क्षमता इतनी कमजोर हो चुकी थी कि शुगर, रक्तचाप या हृदय रोग जैसी बीमारियों ने उन्हें जकड़ लिया और वे इनसे लड़ नहीं सके। यह चिकित्सा विज्ञान और स्वास्थ्य विशेषज्ञों के लिए बड़ी चुनौती के रूप में सामने है और अब लोगों को इससे बचाना जरूरी है। झारखंड जैसे राज्यों के लिए, जहां स्वास्थ्य सुविधाएं बेहद कमजोर हैं, कोरोना के बाद का दौर अधिक चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि यहां न जांच के समुचित उपकरण हैं और न विशेषज्ञता। ऐसे में सरकार के लिए यह जरूरी हो गया है कि वह कोरोना के बाद पैदा होनेवाली समस्याओं का गहन अध्ययन-विश्लेषण करने की व्यवस्था करे और चिकित्सा का एक सक्षम-असरदार प्रोटोकॉल तैयार करे। डॉक्टरों की एक समानांतर टीम भी तैयार करने की जरूरत है, जो कोरोना के बाद की बीमारियों पर नजर रख सके, उनका इलाज कर सके। कोरोना के बाद की इस चुनौती की गंभीरता और इसके संभावित असर का विश्लेषण करती आजाद सिपाही के टीकाकार राकेश सिंह की खास रिपोर्ट।

    झारखंड समेत पूरे देश में कोरोना की दूसरी लहर के कमजोर पड़ने के संकेत के साथ नयी समस्या ने सिर उठा लिया है, जिसे म्यूकर मायकोसिस या ब्लैक फंगस के नाम से पुकारा जा रहा है। डॉक्टरों को यह समझ में नहीं आ रहा है कि प्राकृतिक रूप से वातावरण में रहनेवाला यह विषाणु, जो अब तक मामूली समझा जाता था, अचानक इतना खतरनाक कैसे हो गया। आखिर इसे कौन सी ताकत मिल गयी। डॉक्टर तो यह भी नहीं समझ पा रहे हैं कि कोरोना से ठीक हो चुके लोगों के मरने का सिलसिला भी अचानक क्यों बढ़ गया है। प्रत्यक्ष रूप से ये मौतें प्राकृतिक दिखती हैं, लेकिन इनके कारणों का विश्लेषण करने पर पता चला है कि कोरोना संक्रमित लोगों के शरीर की प्रतिरोधक क्षमता इतनी कमजोर हो जाती है कि वे ब्लैक फंगस, रक्तचाप, हृदयाघात या मधुमेह से भी नहीं लड़ पाते और मौत के मुंह में समा जाते हैं।
    यह वाकई बेहद गंभीर स्थिति है। कोरोना न केवल लोगों को संक्रमित कर रहा है, बल्कि यह उनके जीवन चक्र को भी बुरी तरह प्रभावित कर रहा है। उनकी उम्र को कम कर रहा है। कई राज्यों में ब्लैक फंगस को महामारी घोषित कर दिया गया है। झारखंड में भी इसकी तैयारी चल रही है, लेकिन असल चुनौती इस बात की है कि कोरोना से ठीक होने के बाद मरीजों की देखभाल की कोई व्यवस्था अब तक नहीं की गयी है। अभी डॉक्टरों का ध्यान केवल इस बात पर है कि कोरोना पॉजिटिव मरीज कैसे निगेटिव हो जायें।

    वास्तव में सिर्फ कोरोना निगेटिव होना ही उपलब्धि नहीं है, इसके बाद के असर से लोगों को बचाना असल कामयाबी है और सबसे ज्यादा जरूरी भी। कोरोना संक्रमित ज्यादा से ज्यादा 10 से 14 दिन में निगेटिव हो जाता है। इसी दौरान मरीज या तो कोरोना से जंग जीत जाता है या फिर हार जाता है, लेकिन असली लड़ाई तो बाद में शुरू होती है और इसी पर लोग ज्यादा ध्यान नहीं दे रहे हैं। यही कारण है कि कोविड निगेटिव होने के बाद भी लोगों की मौत हो रही है। कुछ अस्पताल में दम तोड़ रहे हैं और कुछ डिस्चार्ज होने के बाद घर में। इन मौतों की कई वजह हो सकती है। इन कारणों में कोरोना से उबरने के बाद किसी घातक बीमारी का हमला, डॉक्टरों की अनदेखी या उनके पास इस चुुनौती से निबटने का कोई अनुभव या विशेषज्ञता नहीं होना या फिर संक्रमितों के इलाज के दौरान कोविड प्रोटोकॉल का सही तरीके से फॉलो नहीं करना, मरीजों और उनके अभिभावकों में जानकारी की कमी जैसे कारण शामिल हैं। ये कारण कोविड संक्रमण से भी ज्यादा घातक हैं और जानकारी के अभाव में मरीज पर ध्यान देने में ढिलाई बरती जा रही है। कोरोना इलाज के कुछ प्रोटोकॉल बने हुए हैं और उसी आधार पर अस्पताल या घर पर संक्रमितों का इलाज हो रहा है। अधिकतर मामलों में लक्षण के हिसाब से ही उपचार हो रहा है। अगर कोई मरीज कोरोना निगेटिव हो गया है, लेकिन उसकी ब्लड रिपोर्ट सामान्य नहीं है, जैसे सीआरपी या डी डिमर बढ़ा हुआ है तो फिर उसे गहन इलाज की जरूरत होती है। केएफटी, एलएफटी, सीबीसी कई प्रकार की जांच हैं, जिससे डॉक्टर पता करते हैं कि मरीज के शरीर में इन्फ्लेशन कितना है, खून मोटा हो रहा या नॉर्मल है। उसी हिसाब से डॉक्टर उपचार करते हैं। मरीज को कब और कितनी मात्रा में स्टेरॉयड देना है और अगर स्टेरॉयड दे रहे हैं, तो क्या ब्लड थिनर दिया जा रहा है या नहीं और कितनी मात्रा में दिया जा रहा है, यह सब डॉक्टर अपने प्रोटोकॉल के हिसाब से उपचार करते हैं। लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि संक्रमित और उससे उबरने के बाद उपचार के दौरान सही और सटीक टेस्ट करवाना बहुत बड़ा रोल अदा करता है। अभी तो डॉक्टरों का पहला लक्ष्य यह होता है कि कोरोना संक्रमण से मरीज को कैसे मुक्त किया जाये और इसके लिए जो दवाएं चलती हैं, उसका साइड इफेक्ट भी बहुत होता है। उसी साइड इफेक्ट से बचने के लिए कोविड के बाद का उपचार सही तरीके से होना बहुत महत्वपूर्ण है। इसमें भी कुछ प्रोटोकॉल होता है, जिसमें समय पर ब्लड टेस्ट करवाना और मरीज को हमेशा सावधानी बरतना, अपने खान-पान से लेकर निर्धारित व्यायाम, जैसे योग, हल्का टहलना इत्यादि, जिससे फेफड़ा मजबूत बने। खान-पान का भी पोस्ट कोविड प्रोटोकॉल बना हुआ है, जिसका सही से पालन करना बहुत जरूरी है। जैसे डाइट में प्रोटीन अधिक मात्रा में लेना, कार्बोहाइड्रेट्स और फैट युक्त भोजन कम मात्रा में लेना। तला-भुना तो बिलकुल अपने खान-पान से दूर रखना बहुत जरूरी है कम से कम तीन से चार महीने तक। कोरोना का स्वास्थ्य पर असर कम से कम तीन से चार महीने रहता है, जहां कमजोरी का रहना, हल्का बुखार भी रहना, बदन में दर्द और चक्कर आना आम बात है, लेकिन इसे भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए और डॉक्टर से हमेशा सलाह लेते रहना चाहिए।

    अब तीसरी लहर से निबटने की तैयारी के साथ ब्लैक फंगस की चुनौती से निबटने की भी मजबूत तैयारी करनी होगी, क्योंकि यहां भी उसने दस्तक दे दी है। बेहतर होगा कि झारखंड का स्वास्थ्य विभाग एक विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम बनाये, जो कोरोना के बाद उत्पन्न स्थितियों पर नजर रखे और उसके समुचित इलाज के बारे में जानकारी दे। कारण, यहां अस्पताल तो बहुत हैं। ऐसे-ऐसे अस्पताल भी हैं, जिनके बाद बेड की संख्या तो बहुत है, लेकिन उस हिसाब से डॉक्टर और ट्रेंड स्टाफ नहीं हैं। उन अस्पतालों ने काफी संख्या में कोरोना मरीजों को एडमिट कर लिया है, लेकिन उन्हें समुचित उपचार नहीं दे पा रहे हैं। अगर उनके पास विशेषज्ञ डॉक्टर हैं भी तो उनके पास विजिट करने का ही इतना लोड है कि वह बीमारी विशेष के बारे में सोच ही नहीं पा रहे हैं। रूटीन इलाज ही कर रहे हैं। सरकार के स्वास्थ्य विभाग को इस पर भी नजर रखने की जरूरत है।

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