विपक्ष का सवाल: उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और गुजरात में टीका कैसे पहुंचा

कोरोना के खतरनाक संक्रमण से इंसान को बचाने के एकमात्र उपाय के रूप में सामने आये टीके को लेकर विवादों का जो बवंडर खड़ा हुआ है, वह आपदा के इस दौर में बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। एक तरफ देश भर में संक्रमितों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है, वहीं दूसरी ओर इस मजबूत रक्षा कवच को लेकर तरह-तरह के विवाद सामने आ रहे हैं। पहले टीकाकरण के मामले में केंद्र और राज्यों को अलग-अलग इकाइयों के रूप में देखने की नीति घोषित की गयी, तो उस पर विवाद हुआ और फिर टीका निर्माता कंपनियों ने केंद्र और राज्यों के लिए अलग-अलग कीमत तय कर इस विवाद को और गहरा कर दिया। इन विवादों के बीच केंद्र ने 18 वर्ष से 45 वर्ष के आयुवर्ग के लोगों को एक मई से टीका लगाने की महत्वाकांक्षी घोषणा कर दी, जिस पर कई राज्यों ने अपनी खराब आर्थिक स्थिति को वजह बताते हुए आपत्ति की। इन सबके बावजूद जब राज्यों ने लोगों की हिफाजत के लिए कंपनियों से टीका खरीदने के लिए आॅर्डर दे दिया और टीकाकरण शुरू करने की सभी तैयारियां पूरी कर लीं, तब निर्माता कंपनियों की ओर से कहा गया कि वे एक मई तक राज्यों को टीका उपलब्ध नहीं करा सकतीं, क्योंकि यह उनकी क्षमता से बाहर है। अब जब एक मई से दुनिया के सबसे बड़े टीकाकरण अभियान की शुरूआत का समय आया, तो कई राज्य अपना माथ पीटते रहे, क्योंकि उनके पास टीके का स्टॉक ही नहीं पहुंचा।

दूसरी तरफ कुछ राज्यों में टीकाकरण अभियान तय समय पर शुरू हो गया। लेकिन इसका सबसे दुखद पहलू यह है कि टीकाकरण शुरू नहीं कर पानेवाले राज्यों में अधिकांश गैर-भाजपा शासित हैं। स्वाभाविक तौर पर यह आरोप लगाया जाने लगा है कि निर्माता कंपनियां टीका भेजने में भेदभाव कर रही हैं। यह आरोप निराधार और अनुचित भी नहीं है। इस बड़े विवाद की वजह और इसके संभावित परिणाम पर रोशनी डालती आजाद सिपाही के टीकाकार राहुल सिंह की विशेष रिपोर्ट।
कोरोना के खतरनाक संक्रमण से जूझ रहे भारत में इस पर विजय पाने के सबसे मजबूत हथियार, यानी टीका को विवादों के गहरे दलदल में धकेल दिया गया है। ये विवाद क्यों और कैसे पैदा हुए या किये गये, इस पर विमर्श हो सकता है, लेकिन विवादों के कारण देश का सिस्टम यह भूल गया कि अभी सबसे जरूरी लोगों की जान बचाना है। यदि वह यह नहीं भूला होता, तो शायद आज एक मई से देश भर में 18 से 45 वर्ष के आयुवर्ग के लोगों को टीका लगाने का काम शुरू हो जाता। लेकिन ऐसा नहीं हो सका और दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के इतिहास का यह संभवत: सबसे दुर्भाग्यपूर्ण दिन के रूप में अंकित किया जायेगा।
पिछले महीने जब केंद्र सरकार ने 18 से 45 वर्ष के आयुवर्ग के लोगों को टीका लगाने का अभियान शुरू करने की घोषणा की थी और इसे दुनिया के सबसे बड़े टीकाकरण अभियान कह कर प्रचारित किया, तब लगा था कि भारत कोरोना महामारी से जंग में जीत हासिल करने की राह पर आगे बढ़ चला है। लेकिन इस अभियान में एक के बाद एक विवाद जुड़ते गये। पहले केंद्र की ओर से इस अभियान को पूरा करने की जिम्मेवारी राज्यों को दे दी गयी, जिस पर खूब बहस हुई।
कहा गया कि यह संघवाद की मूल भावना के विपरीत है और कोरोना राष्ट्रीय आपदा है। इससे निबटने का पूरा जिम्मा केंद्र का है। इस विवाद को टीका निर्माता कंपनियों ने उस समय और बढ़ा दिया, जब उन्होंने केंद्र और राज्यों के लिए टीके का कोटा तय कर दिया और अलग-अलग कीमतें तय कर दीं। कई राज्यों ने अपनी बदहाल आर्थिक स्थिति का हवाला देकर उस समय कहा कि यह नाइंसाफी है और वे इस बोझ को नहीं उठा सकते हैं।
इसके बावजूद देश के लगभग सभी राज्यों ने मुफ्त टीकाकरण अभियान शुरू करने की तैयारी कर ली। टीके का आॅर्डर भी दे दिया गया और कीमत का भुगतान भी कर दिया गया। तब निर्माता कंपनियों ने कहा कि वे तय समय तक राज्यों को टीके की आपूर्ति नहीं कर सकती हैं, क्योंकि उन्हें पहले केंद्र का आॅर्डर पूरा करना है। उधर केंद्र ने टीकाकरण के लिए रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया शुरू कर दी और 30 अप्रैल तक करीब ढाई करोड़ लोग अपना रजिस्ट्रेशन करा चुके थे।
जब टीकाकरण शुरू करने का समय आया, तब कई राज्यों में टीके का स्टॉक नहीं पहुंचा और वे ठगे से रह गये। इस विवाद को नया आयाम तब मिला, जब कुल दर्जन भर राज्यों ने टीकाकरण शुरू करने में असमर्थता जतायी। इस विवाद को उस समय अधिक बल मिला, जब इन राज्यों में अधिकांश में गैर-भाजपा दलों की सरकार है। विरोधी दल के लोग यह आरोप लगाने लगे कि केंद्र ने टीके के आवंटन में भेदभाव किया है और इस मानवीय संकट में भी राजनीति कर रही है।
जिन राज्यों में एक मई से टीकाकरण शुरू नहीं हो सका, उनमें झारखंड, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक, ओड़िशा, तमिलनाडु, उत्तराखंड, पंजाब, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, अरुणाचल प्रदेश, बिहार, राजस्थान और केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर शामिल हैं। दूसरी तरफ उत्तरप्रदेश, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, मध्यप्रदेश और गुजरात में टीकाकरण शुरू हो गया है।
जिन राज्यों में अभियान शुरू नहीं हो सका, उनमें अधिकांश गैर-भाजपा शासित हैं, जबकि टीकाकरण शुरू करनेवाले राज्य भाजपा शासित हैं। यही कारण है कि विरोधी दलों को केंद्र पर हमला बोलने का मजबूत हथियार मिल गया है।
ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर ऐसा कैसे हो रहा है कि कुछ राज्यों ने टीकाकरण शुरू कर दिया है, और निर्माता कंपनियों ने उन्हें पहले कैसे टीके की आपूर्ति कर दी। केंद्र ने साफ कहा है कि उसके कोटे के टीके, जो 45 से अधिक आयुवर्ग के लोगों के लिए राज्यों को दिये गये हैं, का इस्तमाल इस चरण में नहीं हो सकता है।
तब इन राज्यों के पास टीके का स्टॉक कहां और कैसे पहुंचा। सवाल तो यह भी है कि क्या टीके के आवंटन में भेदभाव किया जा रहा है और इस पर राजनीति की जा रही है।
संकट के दौर में यह विवाद दुर्भाग्यपूर्ण ही नहीं, खतरनाक भी है। यदि सचमुच टीके के वितरण में भेदभाव हो रहा है, तो केंद्र को इसमें हस्तक्षेप कर सभी राज्यों को टीके की आपूर्ति सुनिश्चित करानी चाहिए। टीके के अलावा आॅक्सीजन की सप्लाई पर भी विरोधी दल बार-बार केंद्र को कठघरे में खड़ा कर रहा है। दिल्ली में तो आॅक्सीजन सप्लाई को लेकर हाइकोर्ट ने केंद्र को चेताया है। कहा है कि अब पानी सिर से ऊपर जा रहा है। उसने यह भी निर्देश दिया है कि आज से ही दिल्ली का आॅक्सीजन का कोटा बढ़ाया जाये। आदेश के बाद ऐसी खबरें आ रही हैं कि दिल्ली का आॅक्सीजन का कोटा बढ़ा दिया गया है। यह कम चिंताजनक नहीं है कि जो काम मानवीय स्तर पर खुद होना चाहिए था, उसके लिए कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ रहा है। अब भी समय है। पूरे देश के लोगों को बचाने के लिए केंद्र सरकार कोरोना के खिलाफ जंग की कमान अपने हाथ में लेनी चाहिए। जरूरत पड़े तो वह जरूरी आॅक्सीजन और जीवन रक्षक दवाओं की आपूर्ति एक सशक्त टीम बना कर सेना के हाथों में सौंप दे, ताकि इनकी कालाबाजारी से मुक्ति मिल सके।
अगर केंद्र ने ऐसा नहीं किया, तो यह कोरोना के बाद के लिए नये राजनीतिक बवंडर के रूप में सामने आयेगा और तब टीके से वंचित हो रहे लोगों के मन में केंद्र सरकार के प्रति गुस्सा उपजेगा।

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