देश के सबसे बड़े राज्य उत्तरप्रदेश में कराये गये त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव के नतीजे घोषित किये जा चुके हैं। अगले साल होनेवाले विधानसभा चुनाव का इसे सेमीफाइनल माना जा रहा था और इस लिहाज से यह चुनाव राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील हो गया था। राज्य की बागडोर संभाल रहे योगी आदित्यनाथ और भाजपा ने इस चुनाव में जम कर पसीना बहाया, लेकिन परिणामों से खुद योगी और उनकी पार्टी को भारी निराशा हाथ लगी है। यूपी समेत पूरे देश में भाजपा के उत्थान का कारण बने अयोध्या, काशी और मथुरा इस पंचायत चुनाव में भाजपा के हाथ से फिसल गये हैं और समाजवादी पार्टी तथा बहुजन समाज पार्टी ने जोरदार वापसी की है। अयोध्या और काशी की अधिकांश जिला पंचायतों पर समाजवादी पार्टी ने परचम लहराया है, तो मथुरा में बसपा ने अपना झंडा गाड़ दिया है। भाजपा को काशी से लगातार निराशा हाथ लगी है। पिछले पांच महीने में यहां अखिलेश यादव की पार्टी सपा ने पांच झटके दिये हैं। पंचायत चुनाव परिणाम का यह संकेत पिछले चार साल से निष्कंटक रूप से शासन चला रहे योगी आदित्यनाथ के लिए खतरे की घंटी है। इस चुनाव परिणाम ने सपा और बसपा को जहां मजबूत आधार प्रदान किया है, वहीं भाजपा के माथे पर चिंता की लकीरें गहरी कर दी हैं। दरअसल भारतीय राजनीति के केंद्र कहे जानेवाले इस प्रदेश में पिछले एक साल के दौरान जो कुछ हुआ है, उससे खुद योगी, उनके मंत्री और विधायकों की कार्यप्रणाली अक्सर गंभीर सवालों के घेर में रही है। पंचायत चुनाव का परिणाम इन सवालों का आइना भी है। यूपी के पंचायत चुनाव के परिणाम की पृष्ठभूमि में वहां के राजनीतिक माहौल और संभावनाओं का विश्लेषण करती आजाद सिपाही के टीकाकार राहुल सिंह की खास रिपोर्ट।
आजादी के बाद से ही यह कहावत प्रचलित है कि उत्तरप्रदेश जिसका साथ देता है, उसके लिए दिल्ली का रास्ता आसान हो जाता है। पहले कांग्रेस के साथ यह कहावत चरितार्थ होती थी और अब भाजपा और खास कर मोदी के साथ भी यही कहावत चरितार्थ हो रही है। मोदी की राह निष्कंटक बनाने में उत्तरप्रदेश की बहुत बड़ी भूमिका रही है। पिछले चार साल से दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के सबसे बड़े राज्य में शासन की बागडोर संभाल रहे योगी आदित्यनाथ सोमवार को पहली बार चिंतित मुद्रा में दिखे। इससे पहले वह जब भी सार्वजनिक रूप से सामने आये, उनके चेहरे पर एक निश्छल मुस्कान रही थी। योगी की चिंता स्वाभाविक थी, क्योंकि हाल में संपन्न त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव का परिणाम उनके अनुकूल नहीं गया है। इस परिणाम ने राज्य में अगले साल होनेवाले विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा की रणनीति को पूरी तरह बिखेर कर रख दिया है। भाजपा जिस अयोध्या, काशी और मथुरा को लेकर दो से चार सौ तक और देश के तीन चौथाई प्रदेशों में बहुमत हासिल करने के रास्ते पर बढ़ी थी, वे तीनों जिले इस चुनाव में उसके हाथ से निकल चुके हैं। इनमें योगी को सबसे ज्यादा चिंता काशी को लेकर है। यहां से देश के प्रधानमंत्री सांसद हैं। लेकिन काशी की आज की सच्चाई यह है कि पिछले पांच माह में यहां अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी ने एक पर एक पांच झटके दिये हैं। पहला झटका बीएचयू में शिक्षक चुनाव, फिर यहां एमएलसी चुनाव और उसके बाद काशी विद्यापीठ में छात्र संघ का चुनाव। इस चुनाव में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का खाता तक नहीं खुला। इसका सबसे बड़ा कारण यह माना जा रहा है कि यहां मंत्री, विधायक और कार्यकर्ताओं के बीच सीधा संवाद नहीं है। इसका सीधा संकेत यह है कि यूपी में भी अब धार्मिक और उग्र हिंदूवाद कम से कम वोट पाने का जरिया नहीं रह गया है।
भारत की राजनीति में उत्तरप्रदेश हमेशा से केंद्रीय भूमिका में रहा है। वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी गुजरात से चल कर वाराणसी से चुनाव लड़ने केवल इसलिए आये, क्योंकि उन्हें पता था कि उत्तरप्रदेश के बिना राजनीति की गाड़ी नहीं चल सकती। हुआ भी ऐसा ही और 2017 के विधानसभा चुनाव में यूपी ने भाजपा को न केवल बहुमत दिया, बल्कि 2019 में उसने पार्टी को सबसे अधिक सीटें दी।
लेकिन पंचायत चुनाव में भाजपा क्यों पिछड़ गयी, यह बड़ा सवाल आज पार्टी के हर तबके में चर्चा का विषय बना हुआ है। जिन गांवों में 2019 के बाद से दूसरी पार्टियों का नामो-निशान मिट गया था, वहां से भी भाजपा का पिछड़ना राजनीतिक रूप से किसी अनिष्ट की ओर ही संकेत करता है। इस परिस्थिति के लिए यदि किसी को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है, तो वह है योगी सरकार की कार्यशैली। गोरखपुर के गोरखनाथ मठ के प्रमुख योगी आदित्यनाथ को जब 2017 में मुख्यमंत्री बनाया गया था, लोगों को लगा था कि मुलायम-मायावती-अखिलेश की जातिवादी शासन व्यवस्था से अब उन्हें मुक्ति मिलेगी और योगी आदित्यनाथ प्रदेश को सचमुच एक अनुकरणीय सरकार देंगे। शुरूआत में ऐसा हुआ भी, लेकिन समय बीतने के साथ भाजपा में और बहुत हद तक खुद योगी आदित्यनाथ में आत्ममुग्धता घर करने लगी। इसका सीधा परिणाम यह हुआ कि सरकार के कई फैसले विवादों में घिरते गये। योगी सरकार फ्रांस के उस बदनाम ‘थर्मामीटर सिद्धांत’ को अपनाने के रास्ते पर आगे बढ़ गयी, जिसके अनुसार बुखार कम करने के लिए थर्मामीटर को तोड़ने की बात कही गयी है। 18वीं सदी में फ्रांस की क्रांति के बाद जो आतंक का साम्राज्य स्थापित हुआ था, उसमें यह सिद्धांत प्रतिपादित किया गया था। योगी सरकार ने समस्याओं को उठानेवालों को अपना दुश्मन मान लिया और उनका मुंह बंद करने लगी। यह चीन के द ग्रेट लीप फॉरवर्ड के अनुरूप था, जो वहां भयानक अकाल से हुई पांच करोड़ मौतों का कारण बना था।
योगी सरकार की इस कार्यप्रणाली की रही-सही कसर कोरोना की दूसरी लहर ने पूरी कर दी। जैसे ही इस महामारी ने राज्य में दस्तक दी, बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था और आतंकित कार्यपालिका सकते में आ गयी। किसी को कुछ समझ में ही नहीं आया कि आगे क्या किया जाये। लोकतंत्र में अनिर्णय की स्थिति बेहद खतरनाक होती है और यूपी का शासन इसका ही शिकार बन गया। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि कोरोना महामारी में आॅक्सीजन, बेड और दवा के लिए अनुनय-विनय करनेवाले पीड़ितों को यह चेतावनी दे दी गयी कि जो सोशल मीडिया के माध्यम से ऐसा करके राज्य की बदनामी करेगा, उसके खिलाफ केस किया जायेगा। यही नहीं, कोरोना की बढ़ती रफ्तार को थामने के लिए जब इलाहाबाद हाइकोर्ट ने राज्य के पांच बड़े शहरों में लॉकडाउन लगाने का निर्देश दिया, तो योगी सरकार इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट चली गयी। स्थिति यह है कि देश में बढ़ रही कोरोना की रफ्तार में जो पांच राज्य शामिल हैं, उनमें उत्तरप्रदेश भी है। इसी बीच पंचायत चुनाव कराने का फैसला भी हुआ और तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद लोगों को संक्रमण की भट्ठी में झोंक दिया गया। पंचायत और स्थानीय निकाय के चुनाव किसी भी प्रदेश की राजनीतिक स्थिति के आकलन का सबसे बढ़िया और प्रभावी तरीका माना जाता है। इसलिए भाजपा को अभी से इस ओर सचेत हो जाना चाहिए। विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जुटे पार्टी नेतृत्व को अब अपनी रणनीति को लोकोन्मुख बनाने पर ध्यान देना होगा, क्योंकि पंचायत चुनाव परिणाम ने उसकी दरकती जमीन को सामने ला दिया है। पार्टी को समझना होगा कि धार्मिक मुद्दों को हमेशा के लिए वोट में बदलने का जमाना अब बीत चुका है। सत्ता तक पहुंचने का रास्ता धर्मस्थलों और भावनाओं से होकर नहीं, बल्कि हकीकत की ठोस धरातल से होकर गुजरता और बनता है। इसलिए भाजपा को अब बाकी बचे एक साल में यूपी को वह शासन देना होगा, जिसमें समस्याएं उठती हों और सरकार उनका समाधान करने की दिशा में गंभीर नजर आती हो। एक और बात, जो सबसे जरूरी है, यह है कि 2024 से पहले का यह आखिरी बड़ा चुनाव होगा। इसलिए भाजपा को अभी से इसकी गंभीर तैयारी शुरू करनी होगी। जाहिर है, अगर योगी आदित्यनाथ नहीं चेते, आत्ममुग्धता से नहीं उबरे, तो उत्तरप्रदेश को सहेज कर रखना नामुमकिन होगा।