झारखंड में एक नये नेता का उदय!
स्थापित राजनीतिक दलों को सोचने पर कर दिया है मजबूर
गिरिडीह, हजारीबाग, जमशेदपुर और रांची के लोगों में होने लगी है चर्चा
प्रशांत झा
दुमका। झारखंड में लोकसभा चुनाव अंतिम चरण में है। 1 जून को बची हुई तीन लोकसभा सीटों पर मतदान होगा। इसके बाद 4 जून को परिणाम आ जायेगा। राज्य में नवंबर-दिसंबर तक विधानसभा चुनाव होना है। यानी अगले एक-दो महीने के अंदर राजनीतिक गतिविधियां एक बार फिर तेज हो जायेंगी। लोकसभा चुनावा का परिणाम जो भी हो, लेकिन राज्य में एक नये नेता का नाम हर किसी की जुबान पर चढ़ रहा। उसने लोकसभा चुनाव में राज्य में अपनी पहचान कायम कर ली है। इस बात को नकारा नहीं जा सकता है कि झारखंड के राजनीतिक फलक पर एक नये नेता का उदय हो रहा है। उस नेता का नाम है जयराम महतो। लोकसभा चुनाव में वोटों के हिसाब से उनकी कितनी दखलंदाजी रही, यह तो 4 जून को परिणाम आने के बाद पता चलेगा, लेकिन हर दल के नेता के बीच उनके नाम को लेकर चर्चा हो रही है। लोकतंत्र में एक नये नेता का उदय जनता के लिए अच्छी बात है, लेकिन राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दल के लिए राजनीतिक रूप से खतरे की घंटी हैं, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। विधानसभा चुनाव में राजनीतिक दलों को इस पर सोचना होगा। खासकर आजसू और झामुमो को। ऐसा इसलिए, फिलहाल जयराम महतो के साथ आजसू और झामुमो के समर्थक वर्ग के लोगों का ही जमावड़ा हो रहा है, इसे इस तरह कह सकते हैं कि आजसू और झामुमो जिनको अपना आधार वोट मानता है, उनके बीच ही जयराम महतो की लोकप्रियता बढ़ी है। वहीं, भाजपा और कांग्रेस को भी अपने गठबंधन को लेकर नये सिरे से विचार करना होगा।
कौन हैं जयराम महतो:
झारखंड दशकों से क्षेत्रीय राजनीति की प्रयोगशाला रहा है। यहां के क्षेत्रीय और स्थानीय मुद्दों को लेकर कई पार्टियां और मोर्चे बनते रहे हैं। जयराम महतो युवा नेता हैं। पिछले तीन साल से जयराम ने 1932 खतियान आधारित स्थानीयता, क्षेत्रीय भाषा, रोजगार आदि लागू करने को लेकर संघर्ष शुरू किया है। राजनीति में प्रवेश करने से पहले इन मुद्दों को लेकर 50 से अधिक सभाएं की। आंदोलन किया। प्रदर्शन किया। धीरे-धीरे उनके साथ युवाओं की टोली जुट गयी। इसके बाद उन्होंने संघर्ष के लिए राजनीति में प्रवेश करने का विचार किया। बीते साल जून में उन्होंने एक नयी पार्टी ‘झारखंडी भाषा-खतियान संघर्ष समिति (जेबीकेएसएस)’ का गठन किया। वह इस दल के अध्यक्ष हैं। उन्होंने पार्टी गठन के बाद लोकसभा और विधानसभा चुनाव में युवाओं की राजनीति करने का एलान कर दिया। उन्होंने कहा कि झारखंड से दिल्ली तक आवाज उठाने की जरूरत है। युवाओं को सदन में भेजना होगा। हमें नीति और नियत दोनों बदलनी होगी। यह नया नेता सीधी-सरल और स्थानीय भाषा में भाषण देता है, जिससे स्थानीय लोगों से सीधा जुड़ाव होता है। उन्हें सुनने के लिए भारी संख्या में युवा और अन्य लोग पहुंचते हैं। इस चुनाव में यह भी देखने को मिला कि संसाधन में भी जयराम महतो किसी से बहुत पीछे नहीं रहे। अभी भी जयराम महतो का कारवां निकल रहा है और उस काफिले में कम से कम दस गाड़ियां चल रही हैं। 18 साल से लेकर 25 साल तक के युवा जयराम महतो की टोली में शामिल हो रहे हैं।
लोकसभा चुनाव में मौजूदगी दिखा रहे:
धनबाद के तोपचांची इलाके के निवासी जयराम महतो ने राज्य में ‘युवा टाइगर’ के नाम से पहचान बना ली है। राजनीति में प्रवेश से पहले के आंदोलन में राज्य भर के युवा भारी संख्या में इनके साथ देखे गये। संघर्ष को अंजाम तक पहुंचाने के लिए राजनीतिक दल का गठन कर लिया। इसके बाद लोकसभा चुनाव 2024 से राजनीतक चौसर में उतर गये। जयराम खुद गिरिडीह से चुनाव लड़ रहे। वहीं, रांची, दुमका, हजारीबाग, जमशेदपुर और धनबाद से अपनी पार्टी जेबीकेएसएस से युवा प्रत्याशियों को मैदान में उतारा है। यह युवा नेता सोशल मीडिया पर बेहद लोकप्रिय हो रहा है। उनके वीडियो को यू-ट्यूब और फेसबुक पर काफी व्यूज मिल रहे। झारखंड में राजनीति के जो जातीय समीकरण हैं, वह जयराम महतो के कद और प्रभाव को विस्तार देने वाला है। वह कुर्मी जाति से आते हैं। राज्य की राजनीति में आदिवासियों के बाद कुर्मी जाति का सबसे ज्यादा प्रभाव माना जाता है। हालत यह है कि कहने वाले तो यहां तक कह रहे कि गिरिडीह में झामुमो के प्रत्याशी मथुरा महतो से अगर जयराम महतो आगे निकल जायें, तो आश्चर्य करनेवाली बात नहीं होगी। इस बात की सच्चाई पर से परदा तो चुनाव परिणाम आने के बाद ही उठेगा, लेकिन एक नया युवा नेता के बगैर किसी बड़े राजनीतिक बैनर के इतनी भी धमक कम नहीं है।
राजनीतिक दल सोचने को मजबूर:
जयराम महतो निर्दलीय चुनाव मैदान में हैं। भाजपा, कांग्रेस से लेकर झामुमो और आजसू तक के नेताओं के बीच यह चर्चा का विषय है। लोकसभा चुनाव ज्यों-ज्यों आगे बढ़ रहा, इस युवा नेता को लेकर राजनीतिक दल के नेताओं की चिंता की लकीरें बढ़ रहीं। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि सबसे अधिक खतरा आजसू को है। क्योंकि आजसू के जातीय समीकरण में सबसे ज्यादा सेंधमारी होगी। झामुमो को भी सोचना होगा। क्योंकि कई इलाकों में उसके कुर्मी समीकरण पर असर पड़ेगा। वहीं, भाजपा को भी सोचना होगा, क्योंकि आजसू उसका सहयोगी दल है। विधानसभा चुनाव में निश्चय ही आजसू के साथ भाजपा का कई सीटों पर समझौता होगा। इन सीटों पर भी भाजपा को जीत सुनिश्चित करनी होगी। लिहाजा जयराम के बारे में भाजपा को भी सोचना होगा।