नागपुर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने शुक्रवार को कहा कि यदि 1947 में संघ आज जैसा सक्षम होता तो देश का विभाजन टल सकता था। नागपुर के सिविल लाइंस इलाके में स्थित चिटणवीस केंद्र में आयोजित एक संगोष्ठी मे आंबेकर ने कहा कि स्वतंत्रता के समय हुआ देश का विभाजन पिछले शताब्दी की सबसे पीड़ादायक घटनाओं में से एक था। उस समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आज जितना सक्षम और मजबूत नहीं था। यदि उस समय संघ अधिक सक्षम होता, तो देश का विभाजन टल सकता था। आंबेकर ने बताया कि 1947 में स्वतंत्रता के समय संघ उतना मजबूत नहीं था। फिर भी, हिंदुओं की सुरक्षा और उनके पुनर्वास के लिए संघ ने पूरी ताकत से कार्य किया था। विभाजन के कारण तत्कालीन प्रशासन के खिलाफ जनता में भारी रोष था। उसी समय जो लोग स्वतंत्रता संग्राम के नायक थे, उनकी विभाजन के बाद नकारात्मक छवि बनने लगी। आंबेकर ने कहा कि उस समय कुछ राजनीतिक दलों ने संघ को अपना राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी मानना शुरू कर दिया था। इसके बाद विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों को संघ के रिकॉर्ड इकट्ठा करने के आदेश दिए गए। बाद में राजनीतिक कारणों से ही संघ पर पहला प्रतिबंध लगाया गया।
उन्होंने कहा कि राजनीतिक स्वार्थ के कारण अक्सर संघ के खिलाफ दुष्प्रचार किया जाता है, जबकि वास्तविकता यह है कि संघ किसी से घृणा नहीं करता और न ही किसी से शत्रुता रखता है। संघ सभी को अपना मानता है और समाज के सभी वर्गों से संवाद स्थापित करने की भावना रखता है। इसलिए संघ हमेशा संवाद और चर्चा के लिए तैयार रहता है। आंबेकर ने आगे कहा कि आज समाज में कुछ लोग “जय भीम–लाल सलाम” जैसे नारे लगाते दिखाई देते हैं, जबकि डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने स्वयं कहा था कि जब तक गौतम बुद्ध द्वारा दिखाया गया शांति का मार्ग उपलब्ध है, तब तक कार्ल मार्क्स या अन्य विचारधाराओं के मार्ग पर जाने की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि कम्युनिस्ट और समाजवादी संविधान के सबसे बड़े विरोधी हैं, ऐसा बाबासाहेब ने संविधान सभा में कहा था। आंबेकर ने यह भी स्पष्ट किया कि डॉ. आंबेडकर ने संविधान और संघ को कभी एक-दूसरे के विरोध में नहीं बताया।
उन्होंने आगे कहा कि वैश्विक संघर्ष की स्थिति के कारण देश के कुछ क्षेत्रों में संकट महसूस किया जा रहा है। ऐसे समय में सभी का सहयोग आवश्यक है। अन्य देशों से आयातित वस्तुओं पर निर्भरता कम करने के प्रयास होने चाहिए। संकट की संवेदनशील परिस्थितियों में राजनीति नहीं लानी चाहिए।



