जनता ने कह दिया अब हिंसा और तुष्टीकरण बर्दाश्त नहीं
ममता बनर्जी के शासन के खिलाफ हिंदुत्व की आवाज बुलंद
भाजपा का अंग-बंग-कलिंग का लक्ष्य पूरा
राकेश सिंह
4 मई 2026 की शाम, जब सूरज ढल रहा था, कोलकाता की गलियों में शंखों की गूंज और ‘जय मां काली’ के उद्घोष ने एक नयी इबारत लिख दी। माहौल चुनावी परिणाम का था, जिसका इंतजार कई लोग दशकों से कर रहे थे। रुझान साफ थे। भारतीय जनता पार्टी 205 सीटों के साथ उस बंगाल को फतह कर चुकी थी, जिसे ममता बनर्जी का अभेद्य किला माना जाता था। जब नतीजे आये, तो यह केवल एक पार्टी की हार नहीं थी। यह 1941 के बाद बंगाल में हिंदू राजनीति की 83 साल बाद वापसी थी। श्यामा प्रसाद मुखर्जी की धरती पर बीजेपी ने वो कर दिखाया, जो कभी असंभव लगता था। बंगाल अब एक नये पथ पर है, जहां बेरोजगारी और सुरक्षा जैसे मुद्दों ने दशकों पुराने राजनीतिक किलों को ढहा दिया। ‘सोनार बांग्ला’ का सपना अब भगवा रंग के साथ एक नयी पहचान तलाश रहा है। पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक नये युग का सूत्रपात हो गया है। शाम 6 बजे तक के रुझानों ने राज्य के राजनीतिक भूगोल को पूरी तरह बदल दिया है। जहां बीजेपी 205 सीटों के साथ प्रचंड बहुमत की ओर बढ़ चली, वहीं 15 साल से सत्ता पर काबिज टीएमसी महज 82 सीटों पर सिमटती नजर आयी। सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा यह है कि ममता बनर्जी के उन 119 ‘अभेद्य’ गढ़ों में से 58% सीटों (69 सीटें) पर बीजेपी ने सेंध लगा डाली । 1941 में कृषक प्रजा पार्टी और हिंदू महासभा के नेतृत्व में बने प्रोग्रेसिव कोएलिशन की बंगाल में सरकार बनी, जो 1943 तक चली। इसके बाद से राज्य में कांग्रेस, लेफ्ट और टीएमसी की सत्ता रही। अब बीजेपी सरकार बनने से बंगाल में 83 साल बाद हिंदुत्व की राजनीति की वापसी होगी।

‘माछ-भात’ और ‘शक्ति’ परंपरा: हिंदुत्व का बंगाली स्वरूप
बीजेपी ने इस बार उत्तर भारतीय हिंदुत्व के बजाय बंगाल की ‘शक्ति परंपरा’ को अपनाया। जब ममता बनर्जी ने ‘मछली-भात’ के बहाने बीजेपी को शाकाहार थोपने वाली पार्टी बताया, तो बीजेपी ने इसे ‘महाप्रसाद’ के रूप में स्वीकार कर काउंटर किया। बंगाल की राजनीति में ‘मछली’ सिर्फ एक भोजन नहीं, बल्कि एक गहरी सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान है। बीजेपी ने इस चुनाव में ‘माछ-भात’ को जिस तरह से अपने हिंदुत्व के नैरेटिव में फिट किया, वह उत्तर भारतीय हिंदुत्व से बिल्कुल अलग और अधिक ‘बंगाली’ था।

बंगाल में मां काली और मां दुर्गा को शक्ति का स्वरूप माना जाता है। धार्मिक अनुष्ठानों में मछली को ‘मछली’ नहीं, बल्कि ‘जलपुष्प’ कहा जाता है। कई मंदिरों में देवी को मछली का भोग लगाया जाता है, जिसे ‘महाप्रसाद’ माना जाता है। बीजेपी ने इसी बारीक अंतर को समझा और बंगालियों को यह विश्वास दिलाया कि उनका हिंदुत्व खान-पान पर पाबंदी लगाने वाला नहीं, बल्कि स्थानीय परंपराओं का सम्मान करने वाला है। अनुराग ठाकुर द्वारा सार्वजनिक रूप से मछली खाना और अमित शाह का यह बयान कि ‘माछ-भात खाने वाला ही सीएम होगा’, ने यह संदेश दिया कि बीजेपी का हिंदुत्व बंगाल की मिट्टी और थाली के साथ घुल-मिल गया है।

‘काली बनाम काबा’: नैरेटिव की लड़ाई
पश्चिम बंगाल के इस चुनाव में ‘काली बनाम काबा’ का नैरेटिव महज एक चुनावी नारा नहीं था, बल्कि इसने बंगाल की ‘सांस्कृतिक श्रेष्ठता’ और ‘धार्मिक पहचान’ के बीच एक गहरी लकीर खींच दी। बीजेपी ने बहुत ही चतुराई से टीएमसी के मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोपों को बंगाली अस्मिता से जोड़ दिया। चुनाव के दौरान टीएमसी नेता और सांसद सायानी घोष का एक वीडियो सोशल मीडिया पर आग की तरह फैला। इसमें वह मुस्लिम बहुल इलाके में रैलियों के दौरान एक गीत गा रही थीं। ‘मेरे दिल में है काबा, और मेरी आंखों में मदीना’। टीएमसी सांसद सायानी घोष के ‘काबा-मदीना’ वाले वीडियो को बीजेपी ने चुनावी ध्रुवीकरण का मुख्य केंद्र बना दिया। बीजेपी ने ‘जय श्री राम’ के साथ-साथ ‘जय मां काली’ के नारे को अपना मुख्य अस्त्र बनाया। योगी आदित्यनाथ और अमित शाह ने टीएमसी पर बंगाल की संस्कृति पर बाहरी मजहबी नैरेटिव थोपने का आरोप लगाया, जिससे हिंदू वोटर लामबंद हुए।

महिला वोटबैंक में बड़ी सेंध
पश्चिम बंगाल के चुनावी इतिहास में 2026 का साल ‘महिला वोटबैंक’ की राजनीति के लिए एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हुआ। रुझानों के अनुसार, बंगाल की महिला वोटरों ने इस बार साइलेंट होकर बीजेपी के पक्ष में मतदान किया है। ममता बनर्जी, जिन्हें ‘दीदी’ के रूप में महिलाओं का अटूट समर्थन प्राप्त था, उनके इस सबसे मजबूत किले को बीजेपी ने ‘आर्थिक सुरक्षा’ और ‘शारीरिक सुरक्षा’ के दोतरफा प्रहार से ढहा दिया। ममता बनर्जी का सबसे मजबूत आधार ‘महिला वोटर’ रहा है, लेकिन इस बार बीजेपी ने इसे दोतरफा रणनीति से तोड़ा। टीएमसी के 1500-1700 रुपये के मुकाबले बीजेपी ने 3000 रुपये प्रति माह और सरकारी नौकरियों में 33% आरक्षण का वादा कर बाजी पलट दी। वहीं संदेशखाली की पीड़ित रेखा पात्रा और आरजी कर पीड़िता की मां रत्ना देबनाथ को टिकट देकर बीजेपी ने महिला सुरक्षा को सीधा चुनावी मुद्दा बना दिया। छात्राओं के लिए 50,000 रुपये की शिक्षा सहायता और गर्भवती महिलाओं के लिए 21,000 रुपये की सहायता जैसे वादों ने ‘महिला सशक्तिकरण’ के नैरेटिव को टीएमसी से छीनकर बीजेपी की झोली में डाल दिया। वहीं संसद के विशेष सत्र में लाये गये महिला आरक्षण संबंधी बिलों के विरोध को बीजेपी ने बंगाल की रैलियों में खूब भुनाया। उन्होंने नैरेटिव बनाया कि ममता बनर्जी, जो खुद एक महिला मुख्यमंत्री हैं, वे महिलाओं को संसद और विधानसभा में हिस्सेदारी देने के खिलाफ खड़ी विपक्षी पार्टियों के साथ हैं। इसने ममता की ‘महिला-हितैषी’ छवि को काफी नुकसान पहुंचाया।

संदेशखाली और आरजी कर: आक्रोश को बनाया आधार
बीजेपी ने इस बार केवल मंचों से भाषण नहीं दिये, बल्कि उन महिलाओं को चुनावी चेहरा बनाया, जिन्होंने सिस्टम की प्रताड़ना झेली थी। संदेशखाली में महिलाओं के शोषण के खिलाफ आवाज उठाने वाली रेखा पात्रा को हिंगलगंज से टिकट देकर बीजेपी ने यह संदेश दिया कि वह ‘पीड़ित की रक्षक’ है। वहीं पणहाटी सीट से आरजी कर मेडिकल कॉलेज की मृत डॉक्टर की मां, रत्ना देबनाथ को मैदान में उतारना सबसे बड़ा मास्टरस्ट्रोक रहा। इससे पूरा चुनाव ‘इंसाफ बनाम अन्याय’ के भावनात्मक मुद्दे पर टिक गया। आज के रुझानों में वे पणहाटी से 17,000 से अधिक वोटों से बढ़त बनाये हुए हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने ममता के उस बयान पर सीधा हमला किया, जिसमें उन्होंने महिलाओं को रात में बाहर न निकलने की सलाह दी थी। बीजेपी ने नारा दिया कि ‘बीजेपी सरकार आने पर बंगाल की बेटियां रात 2 बजे भी निडर होकर निकलेंगी’, उन शहरी और ग्रामीण महिलाओं के बीच बहुत लोकप्रिय हुआ, जो कानून-व्यवस्था से परेशान थीं।

एसआइआर और वोटर लिस्ट का ‘शुद्धिकरण’
इस चुनाव में ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ एक गेम-चेंजर साबित हुआ, जिसके तहत 91 लाख वोटरों के नाम हटाये गये। हटाये गये नामों में 31.1 लाख मुस्लिम वोटर थे। मुर्शिदाबाद और मालदा जैसे टीएमसी के गढ़ों में भारी संख्या में नाम कटने से 41 सीटों पर सीधा असर पड़ा, जहां पिछली बार जीत का अंतर बहुत कम था। बीजेपी ने इसे ‘अवैध घुसपैठियों’ के खिलाफ एक सफाई अभियान के रूप में पेश किया, जिसे जनता का मौन समर्थन मिला।

व्यक्तिगत हमलों से किनारा
पिछली गलतियों से सीखते हुए बीजेपी ने इस बार ममता बनर्जी पर व्यक्तिगत हमलों के बजाय सिस्टम और भ्रष्टाचार पर वार किया। इसके पहले चुनाव में ‘दीदी-ओ-दीदी’ कहना फ्लॉप साबित हुआ था। इसका नुकसान भी भाजपा को हुआ था। इसके आवाज में बीजेपी ने ममता के बजाय उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी और ‘सिंडिकेट राज’ को घेरा। सर्वे के अनुसार, जनता के लिए बेरोजगारी (36.6%) और महिला सुरक्षा (19.4%) सबसे बड़े मुद्दे रहे, जिन्हें बीजेपी ने भुनाया।

पन्ना प्रमुख मॉडल, वोटरों के मन से डर निकाल दिया
बीजेपी ने गुजरात और उत्तर प्रदेश में सफल रहे ‘पन्ना प्रमुख’ मॉडल को बंगाल की भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार ढाला। इन पन्ना प्रमुखों का काम केवल पर्चे बांटना नहीं था। उनका मुख्य उद्देश्य था अपने पन्ने के हर एक वोटर से व्यक्तिगत संबंध बनाना, उनकी समस्याओं को सुनना और सबसे महत्वपूर्ण, मतदान के दिन उन्हें घर से बूथ तक सुरक्षित लेकर आना। इस सिस्टम ने वोटरों के मन से वह डर निकाल दिया कि ‘अगर हम बाहर निकले तो क्या होगा?’ पन्ना प्रमुख एक सुरक्षा कवच की तरह उनके साथ खड़े रहे। बंगाल में चुनाव के दौरान अक्सर हिंसा और ‘बूथ कैप्चरिंग’ की खबरें आती थीं। इसे रोकने के लिए बीजेपी ने एक विशाल कार्यबल तैयार किया। शीर्ष नेतृत्व और जमीनी कार्यकर्ता के बीच सूचना का प्रवाह तेज हुआ। जब एक वोटर ने देखा कि उसके दरवाजे पर रोज एक कार्यकर्ता आ रहा है, तो उसे व्यवस्था परिवर्तन की संभावना पर भरोसा हुआ। जो लोग टीएमसी से नाराज थे, लेकिन डर के मारे बाहर नहीं आते थे, उन्हें ‘पन्ना प्रमुखों’ ने बूथ तक पहुंचने का हौसला दिया।

भाजपा का अंग-बंग-कलिंग का लक्ष्य
24 अप्रैल को अमित शाह ने कहा था, ‘बंगाल जीतने के साथ बीजेपी अपना अंग, बंग और कलिंग जीतने का लक्ष्य पूरा कर लेगी।’ अंग यानी बिहार, बंग यानी बंगाल और कलिंग यानी ओडिशा, तीनों जगह बीजेपी के मुख्यमंत्री होने वाले हैं। 1970 के दशक के बाद अब ऐसा होगा कि इन तीनों जगह पर किसी एक विचारधारा का शासन हो। तब कांग्रेस की यहां सरकारें थीं।

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