खुशियों का क्रूज, मौत का ताबूत बन गया, कुदरत का कहर या तंत्र की चूक
-सिस्टम की सड़ांध और यमराज से लड़ती ममता की एक तस्वीर ने देश को रुला डाला
-चेतावनी अनसुनी, आदेश अनपढ़े, क्या मुवावजे के चंद नोटों से लौट पायेंगी सांसें
-राकेश सिंह
जबलपुर के बरगी डैम की वह शाम अब केवल एक तारीख नहीं, बल्कि उन परिवारों के लिए एक कभी न खत्म होने वाला दु:स्वप्न बन गयी है। उस दिन जो घटा, वह कुदरत का कहर कम और मानवीय तंत्र की लापरवाही का क्रूरतम उदाहरण अधिक था। नौ शवों का मिलना तो एक त्रासदी थी ही, लेकिन उन चार परिवारों की पीड़ा की कल्पना कीजिये, जिनके अपने अब भी ‘लापता’ की सूची में हैं। यह केवल एक घटना नहीं, बल्कि तंत्र की संवेदनशून्यता और मानवीय त्रासदी की वह पराकाष्ठा है, जिसे शब्दों में पिरोना हृदय को छलनी करने जैसा है।

जब लहरें हंसते-हंसते डरावनी हो गयीं
बरगी डैम का वह किनारा उस सुबह बेहद खूबसूरत था। हवाओं में एक खनक थी और सैलानियों के चेहरों पर मुस्कान। लोग अपनों के साथ खिलखिला रहे थे। शाम के ठीक 5:30 बजे आखिरी शिफ्ट का क्रूज अपनी मंजिल की ओर बढ़ा। क्रूज के भीतर बॉलीवुड के गाने गूंज रहे थे, बच्चे थिरक रहे थे और बड़े-बुजुर्ग ढलते सूरज की तस्वीरें उतार रहे थे। किसी को अंदाजा नहीं था कि जिस विशाल जलराशि को वे निहारने आये हैं, वही उनकी जल-समाधि बन जायेगी। उस क्रूज पर सवार हर इंसान अपने साथ सुनहरे सपने और कुछ पल की फुर्सत लेकर आया था। दूर-दूर तक फैला पानी और ठंडी हवाएं सैलानियों को अपनी ओर खींच रही थीं। कोई अपने परिवार के साथ साल भर की थकान मिटाने आया था, तो कोई अपने छोटे बच्चे को पहली बार विशाल लहरों का अहसास कराने। क्रूज पर चढ़ते वक्त हर चेहरे पर एक उत्साह था। सेल्फी ली जा रही थी, हंसी-ठिठोली हो रही थी। क्रूज के इंजन की गड़गड़ाहट के बीच किसी को भी उस खामोश मौत की आहट सुनाई नहीं दी, जो बादलों के पीछे छिपकर आ रही थी।

चेतावनी और अनदेखी का खेल
जब सैलानी क्रूज की ऊपरी डेक पर हवाओं का आनंद ले रहे थे, तब मौसम विभाग के दफ्तरों में लाल बत्तियां जल चुकी थीं। चार घंटे पहले ही चेतावनी जारी की जा चुकी थी कि हवा की रफ्तार 74 किमी प्रति घंटे को पार कर सकती है। लेकिन बरगी के तट पर तैनात तंत्र ‘अंधा और बहरा’ बना रहा। न क्रूज को रोका गया, न ही सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम देखे गये। यहां तक कि वह क्रूज, जिसे नियमों के मुताबिक पानी में होना ही नहीं चाहिए था, पूरी क्षमता के साथ लहरों को चीरता हुआ बीच मझधार की ओर बढ़ गया। क्रूज ने जब घाट छोड़ा, तब मौसम विभाग की चेतावनी सरकारी फाइलों में दम तोड़ रही थी। ‘सिस्टम’ अंधा-बहरा बना रहा। डीजल इंजन के शोर में वह चेतावनी अनसुनी कर दी गयी। नियमों की धज्जियां तो तभी उड़ गयी थीं, जब सुप्रीम कोर्ट और एनजीटी के आदेशों को ठेंगे पर रखकर यह धुआं छोड़ता क्रूज पानी में उतारा गया। प्रशासन के लिए वह महज एक ‘फेरा’ था, लेकिन उन परिवारों के लिए वह मौत की ओर बढ़ता कदम।

वह खौफनाक मंजर
अचानक, सूरज बादलों के पीछे ओझल हो गया। हवाओं की वह ‘खनक’ डरावनी ‘सरसराहट’ में बदल गयी। देखते ही देखते लहरें ऊंची और डरावनी होने लगीं। 74 किमी की रफ्तार वाली आंधी ने पानी में वह बवंडर पैदा किया कि भारी-भरकम क्रूज कागज की कश्ती की तरह डगमगाने लगा। क्रूज के भीतर पानी भरने लगा। बच्चों की किलकारियां अब चीखों में बदल चुकी थीं। लोग चिल्ला रहे थे— ‘हमें बचा लो, किनारे ले चलो!’ लेकिन लहरों का शोर इतना तेज था कि उन बेबस इंसानों की आवाज किनारे तक पहुंचने से पहले ही दम तोड़ रही थी।
74 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से चली आंधी ने लहरों को दैत्य बना दिया। क्रूज डगमगाने लगा, पानी अंदर आने लगा। चीख-पुकार और लोगों का हौसला टूटने लगा। चीत्कार मच गयी। लापरवाही की कमान थामे बैठे हुक्मरानों को लगा कि वे लहरों को मात दे देंगे। लाइफ जैकेट कई हाथों में तो थे, पर शरीर पर नहीं, क्योंकि वहां ‘सख्ती’ का पहरा गायब था।

ममता और मासून की जल समाधि
इस पूरे हादसे की सबसे विचलित कर देने वाली तस्वीर उस मां और मासूम बच्चे की रही, जिनके शव गोताखोरों ने बाहर निकाले। मां ने आखिरी वक्त तक अपने बच्चे को सीने से जुदा नहीं होने दिया था। वह पकड़ इतनी मजबूत थी कि जैसे वह यमराज से लड़ रही हो। रेस्क्यू टीम के सदस्य भी उस दृश्य को देखकर अपने आंसू नहीं रोक पाये। वह बच्चा, जो शायद इस सफर को एक रोमांच समझ रहा था, अपनी मां की बाहों में ही ‘जल समाधि’ ले चुका था। जब रेस्क्यू टीम ने पानी की गहराई से वह मंजर निकाला, तो पत्थर दिल इंसान की भी रूह कांप गयी। एक मां ने अपने कलेजे के टुकड़े को आखिरी वक्त में भी सीने से सटाये रखा था। वह मासूम, जो दुनिया को अभी ठीक से देख भी नहीं पाया था, अपनी मां की ममता की गर्माहट लिए हुए ठंडे पानी की गहराई में सो गया। उस मां की पकड़ बता रही थी कि उसने आखिरी सांस तक मौत से जंग लड़ी होगी। सिस्टम की लापरवाही के खिलाफ नहीं, बल्कि अपने बच्चे की सांसें बचाने के लिए। मां और बेटे के शव एक-दूसरे से इस कदर लिपटे थे, जैसे मां ने मौत को चुनौती दी हो कि मेरे बच्चे को ले जाने से पहले, तुम्हें मेरी ममता से गुजरना होगा। लेकिन कुदरत के आगे किसकी चलती है भला। अंतत: ममता और मासूम ने जल समाधि ले ली।

अगर आधे घंटे पहले मदद आती…
हादसे से बचकर निकले एक पिता की आंखों में आज भी आक्रोश है। वह कहते हैं, मैं, मेरी पत्नी और 11 साल का बच्चा मौत के मुंह से बाहर निकले। हम साढ़े तीन घंटे तक अपने छोटे बेटे को ढूंढ़ते रहे। वह बिना लाइफ जैकेट के था। जैसे ही क्रूज पलटा, मैं किसी तरह पत्नी के साथ बाहर निकल पाया। साढ़े तीन घंटे तक हम बच्चे को ढूंढ़ते रहे। हमने उम्मीद छोड़ दी थी, लेकिन वो मिल गया। आज उसका जन्मदिन है। ये दिन कभी नहीं भूलेंगे। उनका कहना था कि अगर लाइफ बोट आधे घंटे पहले आती, तो आज कई और घर आबाद होते। इस घटना ने किसी की मा छीन ली, किसी की कोख उजाड़ दी और किसी का पूरा परिवार एक ही चिता पर सुला दिया।

रेस्क्यू टीम का वाहन खराब, दो घंटे की देरी
शाम 6 बजे आंधी में क्रूज पलटा। 6:15 बजे सूचना के बाद 6:40 पर दल रवाना हुआ, लेकिन वाहन चालू नहीं हुआ। संसाधन दूसरे वाहन में शिफ्ट किये गये। दूसरा दल 7 बजे निकला, बचाव में दो घंटे से ज्यादा देरी हुई। इस बीच स्थानीय किसान, मछुआरों और कर्मचारियों ने अपने स्तर पर प्रयास करने 15 से अधिक लोगों को निकाला। सीएम के निर्देश के बाद आगरा से एनडीआरएफ की टीम देर रात रवाना हुई। शुक्रवार सुबह 5 बजे एनडीआरएफ टीम ने मोर्चा संभाला। 5 शवों को बाहर निकाला।

क्या जान की कीमत महज चंद लाख का मुआवजा है
किसी का पूरा परिवार खत्म हो गया था, तो किसी की खुशियां हमेशा के लिए गहरे पानी में दफन हो गयी थीं। धार से लेकर जबलपुर तक, यह चीखें एक ही सवाल पूछ रही थीं कि क्या हमारी जान की कीमत महज चंद लाख का मुआवजा है? हादसे के बाद अब वही मंजर शुरू होगा, जो बरसों से होता आया है। नेताओं के काफिले आयेंगे, धूल उड़ेगी, कैमरे चमकेंगे और लाशों के ढेर पर संवेदनाओं की चादर चढ़ेगी। चंद लाख रुपयों के चेक थमाकर व्यवस्था यह मान लेगी कि उसने अपना कर्ज उतार दिया।

अगली बारी किसकी
क्या वे दो-चार लाख रुपये उस बच्चे की किलकारी लौटा सकते हैं? क्या वे कागजी नोट उस एक ही चिता पर जलती पांच महिलाओं के रिश्तों की भरपाई कर सकते हैं? धार की सड़क हो या बरगी की लहरें, हर बार कीमती जानें जाती हैं और पीछे रह जाता है सिर्फ सिस्टम का वह बेशर्म चेहरा, जो कहता है— हमें तो आदेश का पता ही नहीं था। बरगी की वे लहरें आज भी शांत नहीं हैं। वे उन 9 लोगों की चीखें समेटे हुए हैं, जो इस लापरवाह तंत्र की बलि चढ़ गये। वह मां और उसका मासूम बेटा आज एक सवाल छोड़ गये हैं कि अगली बारी किसकी?

पूरे प्रदेश में क्रूज संचालन पर रोक
मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने हादसे के बाद पूरे प्रदेश में बड़ा प्रशासनिक फैसला लिया है। मध्यप्रदेश में सभी क्रूज, मोटर बोट और वॉटर स्पोर्ट्स गतिविधियां तत्काल प्रभाव से बंद कर दी गयी हैं। सभी जल परिवहन साधनों का सेफ्टी आॅडिट अनिवार्य किया गया है। सुरक्षा मानकों की समीक्षा के बाद ही संचालन की अनुमति दी जायेगी। सरकार ने साफ किया है कि अब किसी भी स्तर पर सुरक्षा में समझौता स्वीकार नहीं किया जायेगा।

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