सवा दो महीने के लॉकडाउन के दौरान झारखंड के लिए राहत की बात यह है कि राजधानी रांची अब संक्रमण से मुक्त हो चुका है, लेकिन इसके साथ ही छोटे जिलों में कोरोना संक्रमितों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। राज्य में कोरोना के संक्रमण का पहला मामला रांची के जिस हिंदपीढ़ी से सामने आया था, वह अब कंटेनमेंट जोन से भी बाहर निकल चुका है, लेकिन दूसरे जिलों में बढ़ते मामले डेंजर जोन में बदलते जा रहे हैं। निश्चित तौर पर यह सामुदायिक संक्रमण नहीं है और संक्रमितों में अधिकांश बाहर से लौटे प्रवासी श्रमिक ही हैं, लेकिन यदि इन पर तत्काल नियंत्रण के उपाय नहीं किये गये, तो इसकी बड़ी कीमत झारखंड को चुकानी पड़ेगी। कोरोना के खिलाफ जंग में झारखंड का अब तक का ट्रैक रिकॉर्ड बहुत अच्छा रहा है, लेकिन अब यहां जरा सी भी चूक राज्य को खतरे में डाल सकती है। इसलिए सबसे पहले इन जिलों में लौट रहे प्रवासी श्रमिकों की स्वास्थ्य जांच और सैंपल टेस्टिंग की गति को बढ़ाने की जरूरत है। स्वास्थ्य मशीनरी को इस दिशा में फौरन सक्रिय बनाने की जरूरत है, ताकि तेजी से सैंपल टेस्टिंग हो और संक्रमितों का पता जल्द से जल्द चल सके, जिससे सामुदायिक संक्रमण को रोका जा सके। लॉकडाउन खत्म होने के बाद यह स्थिति गंभीर ही होगी। राजधानी को छोड़ दूसरे जिलों में बढ़ते संक्रमण और उस पर नियंत्रण की जरूरतों को रेखांकित करती आजाद सिपाही ब्यूरो की विशेष रिपोर्ट।

झारखंड में कोरोना संक्रमण का पहला मामला राजधानी के हिंदपीढ़ी से 31 मार्च को सामने आया था और फिर वह इलाका हॉटस्पॉट बन गया था, ठीक दो महीने बाद कंटेनमेंट जोन से भी बाहर निकल गया है, इस राहत भरी खबर के बीच यह खबर बेहद चिंताजनक है कि धनबाद बड़ी तेजी से रेड जोन के रास्ते पर बढ़ रहा है। केवल धनबाद ही नहीं, झारखंड के दूसरे जिलों में भी कोरोना संक्रमितों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। राज्य के लिए यह गंभीर स्थिति है और इस पर तत्काल ध्यान दिया जाना जरूरी हो गया है। जो राज्य 31 मार्च तक कोरोना संक्रमण से अछूता था, वहां दो महीने बाद 31 मई तक छह सौ से ज्यादा संक्रमित सामने आ जायें, तो चिंता स्वाभाविक है।
सभी जानते हैं कि झारखंड में कोरोना संक्रमितों की संख्या इसलिए तेजी से बढ़ रही है, क्योंकि बाहर से बड़ी संख्या में लोग यहां आ रहे हैं। धनबाद, गिरिडीह, कोडरमा और गढ़वा जैसे जिलों में संक्रमितों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि साबित करती है कि प्रवासी श्रमिक अपने साथ संक्रमण भी लेकर आ रहे हैं। इन जिलों में जो लोग आ चुके हैं या आ रहे हैं, वे सभी देश के उन इलाकों से लौटे हैं, जहां कोरोना का संक्रमण सबसे अधिक है। महाराष्ट्र, गुजरात और दिल्ली-नोएडा में इन चार जिलों के लोग बड़ी संख्या में काम करते थे। इनके लौटने के बाद इन्हें अलग रखने और इनके स्वास्थ्य जांच की पुख्ता व्यवस्था बेहद जरूरी हो गयी है।
झारखंड में जहां से संक्रमण की शुरुआत हुई थी, वह राजधानी का इलाका था, इसलिए वहां अतिरिक्त सतर्कता बरती गयी और राज्य के दूसरे हिस्सों के मुकाबले यहां स्वास्थ्य सुविधाएं भी अच्छी हैं। इसलिए दो महीने के भीतर ही राजधानी संक्रमण मुक्त हो गयी, लेकिन अब समय आ गया है, जब दूसरे जिलों पर ध्यान दिया जाना चाहिए। इस हकीकत से सभी वाकिफ हैं कि झारखंड की स्वास्थ्य मशीनरी बहुत अधिक दबाव में है और यह पूरी ताकत से कोरोना के खिलाफ जंग लड़ रही है। लेकिन राजधानी को छोड़ दूसरे जिलों में इस मशीनरी को और चुस्त-दुरुस्त करने की जरूरत है। राज्य के 20 जिलों में अभी कोरोना की जांच की सुविधा नहीं है और यहां के सैंपल दूसरे जिलों में भेजे जाते हैं। वहां पहले से ही दबाव है। ऐसे में जांच में देरी से संक्रमण के फैलने का खतरा भी बढ़ रहा है।
इस स्थिति से निबटने के लिए अब दूसरे जिलों में सैंपल टेस्टिंग की सुविधा शुरू करने की जरूरत है, ताकि लौटनेवाले प्रवासियों की जांच तेजी से हो सके और संक्रमितों की पहचान कर उनका इलाज तत्काल शुरू किया जा सके। इसके अलावा दूरस्थ इलाकों में बनाये गये क्वारेंटाइन सेंटरों की व्यवस्था में भी सुधार जरूरी है, ताकि वहां रखे गये लोग संयम और धैर्य के साथ रह सकें, जिससे सामुदायिक संक्रमण का खतरा कम हो। अब, जबकि लॉकडाउन खत्म हो रहा है और वाहनों की आवाजाही सामान्य होने के रास्ते पर है, झारखंड के लिए खतरा बढ़ गया है। बाहर से आनेवाले प्रत्येक व्यक्ति के स्वास्थ्य की जांच अब अनिवार्य रूप से किया जाये, तभी इस खतरे को टाला जा सकता है।
झारखंड सरकार ने अब तक जो उपाय किये हैं, वे कमोबेश पर्याप्त नजर आते हैं, लेकिन राज्य की भौगोलिक स्थिति ही इसकी मेहनत पर पानी फेरने के लिए काफी है। झारखंड के 24 में से 22 जिले दूसरे राज्यों की सीमा से सटे हैं। इस कारण बाहर से यहां कोरोना संक्रमित अधिक संख्या में आना स्वाभाविक है। इस आगमन पर रोक लगाना संभव नहीं है। उस स्थिति में एक ही विकल्प बचता है और वह है जांच की सुविधा और गति को बढ़ाना।
बाहर से आनेवालों से संक्रमण बढ़ने का एक सामाजिक खतरा भी है, जिसकी इक्का-दुक्का घटनाएं सामने आ रही हैं। जागरूकता की कमी के कारण बाहर से आनेवालों का सामाजिक बहिष्कार किया जा रहा है, जिससे तनाव फैल रहा है। इसलिए जरूरी है कि संक्रमितों की पहचान के साथ सामाजिक जागरूकता का अभियान भी चलाया जाये, जिससे तनाव को दूर किया जा सके।
झारखंड के लिए यह कठिन परीक्षा का समय है। इसमें यहां के लोगों का संयम, संकल्प और धैर्य ही कोरोना संकट को दूर कर सकता है। इसलिए स्वास्थ्य मशीनरी के साथ आम लोगों को भी आगे आकर इस काम में जुट जाना चाहिए। बाहर से आनेवाले अपने परिजनों की जांच सुनिश्चि कर उन्हें निर्धारित प्रोटोकॉल के पालन के लिए प्रोत्साहित कर झारखंड को कोराना संक्रमण से बचाने में उनका यह योगदान हमेशा याद रखा जायेगा। यदि ऐसा नहीं हुआ, तो फिर झारखंड को भी खून के आंसू रोना पड़ेगा।

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