झारखंड को जिन कुछ संस्थाओं ने आगे बढ़ने से रोक रखा है, यदि उनकी सूची तैयार की जाये, तो जेपीएससी, यानी झारखंड लोक सेवा आयोग का नाम सबसे ऊपर रखा जा सकता है। देश और समाज को काबिल-कर्मठ नौकरशाहों के अलावा अन्य कार्मिक उपलब्ध कराने के लिए बनायी गयी इस शानदार व्यवस्था में जेपीएससी का नाम हमेशा काले अक्षरों में लिखा जाता है, क्योंकि इसकी कार्यप्रणाली हमेशा विवादों से घिरती रही है। इसके द्वारा आयोजित हर परीक्षा का परिणाम इंसाफ की कसौटी पर कसे जाते ही रद्द कर दिया जाता है। यही कारण है कि दूसरे राज्यों के लोक सेवा आयोग जहां हर दूसरे-तीसरे साल अपने यहां सिविल सेवा परीक्षा आयोजित करते हैं, वहां झारखंड में 21 साल में अब तक केवल छह सिविल सेवा परीक्षाओं का आयोजन किया गया है और वे सभी अदालती फैसलों की वजह से विवादों में फंसती रही हैं। किसी गरीब और पिछड़े राज्य के लिए यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है और आयोग की इस कार्यप्रणाली के कारण राज्य की प्रतिभा की असमय मौत हो रही है। दूसरे राज्यों के लोक सेवा आयोग जहां अपनी प्रतिष्ठा के लिए चर्चित होते हैं, जेपीएससी एकमात्र ऐसा आयोग है, जिसके अध्यक्ष और सदस्यों को जेल की हवा तक खानी पड़ी है। बदनामी और विवादों से भरे इस महत्वपूर्ण संस्थान में अब बड़े बदलाव की सख्त जरूरत है, वरना वह दिन दूर नहीं, जब झारखंड को न तो सिविल सेवक मिलेंगे और न ही दूसरे विशेषज्ञ कार्मिक। जेपीएससी की कार्यप्रणाली और इसके अब तक के कार्यकलाप का विश्लेषण करती आजाद सिपाही के टीकाकार राहुल सिंह की विशेष रिपोर्ट।
झारखंड लोक सेवा आयोग, यानी जेपीएससी का नाम अब पूरी दुनिया में इसकी उपलब्धियों के लिए नहीं, बल्कि इसकी विवादित कार्यप्रणाली के कारण चर्चित हो चुका है। किसी भी राज्य की सबसे प्रतिष्ठित मानी जानेवाली संस्था झारखंड में कितनी बदनाम और विवादित हो चुकी है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस आयोग ने अब तक जितनी भी परीक्षाएं ली हैं, सब की सब किसी न किसी वजह से विवादित रही हैं। जिस आयोग को हर साल या कम से कम दूसरे साल सिविल सेवा की परीक्षा आयोजित कर राज्य को काबिल और सक्षम लोक सेवक उपलब्ध कराने की जिम्मेवारी दी गयी थी, उसने 21 साल में केवल छह सिविल सेवा परीक्षा आयोजित की और वह भी विवादित। यह दुखद ही नहीं, शर्मनाक है। केवल सिविल सेवा परीक्षा ही नहीं, जेपीएससी द्वारा ली गयी हर परीक्षा किसी न किसी विवाद में फंसती रही है और अब इसकी विश्वसनीयता पूरी तरह खत्म हो चुकी है। सबसे पवित्र मानी जानेवाली यह संस्था अब भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और अनियमितताओं के दलदल में फंस चुकी है।
कभी पैरवीपुत्रों की नियुक्ति तो कभी नियम विरुद्ध नियुक्ति के कारण जेपीएससी सुर्खियों में रहा। राज्य गठन के बाद वर्ष 2003 में झारखंड लोक सेवा आयोग द्वारा 64 पदों के लिए पहली सिविल सेवा परीक्षा का आयोजन किया गया। उस वक्त डॉ दिलीप कुमार प्रसाद अध्यक्ष थे। इसके बाद 172 पदों के लिए दूसरी सिविल सेवा परीक्षा ली गयी। इन दोनों परीक्षाओं में काफी विवाद हुआ। भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद के आरोप लगे। विवाद हाइकोर्ट पहुंचा, तो वहां से इन परीक्षाओं द्वारा नियुक्त अधिकारियों को बर्खास्त करने का आदेश हुआ। तब ये अधिकारी सुप्रीम कोर्ट चले गये और वहां सरकार की ओर से कोई पक्ष ही नहीं रखा गया। तब सुप्रीम कोर्ट ने सभी अधिकारियों की बर्खास्तगी के फैसले को निरस्त कर दिया। इन दोनों परीक्षाओं में इतनी गड़बड़ी हुई थी कि तत्कालीन अध्यक्ष, सचिव और कई सदस्यों को जेल तक जाना पड़ा। तीसरी सिविल सेवा परीक्षा के परिणाम को भी हाइकोर्ट में चुनौती दी गयी, हालांकि कोर्ट ने उसके खिलाफ कोई फैसला नहीं सुनाया और 242 अधिकारियों की नियुक्ति हुई। चौथी सिविल सेवा परीक्षा में फिर विवाद हुआ और उसके परिणाम को भी हाइकोर्ट में चुनौती दी गयी। उस पर अंतिम फैसला अभी तक नहीं आया है। पांचवीं सिविल सेवा परीक्षा भी हाइकोर्ट में गयी और वहां से आदेश मिलने के बाद इसका रिजल्ट जारी किया गया। अब छठी सिविल सेवा परीक्षा का रिजल्ट हाइकोर्ट ने रद्द कर दिया है और नये सिरे से रिजल्ट जारी करने को कहा है।
यह तो हुई सिविल सेवा परीक्षा की बात। जेपीएससी द्वारा अब तक ली गयी करीब 16 परीक्षाओं की जांच सीबीआइ कर रही है। इनमें पहली और दूसरी सिविल सेवा, मार्केटिंग सुपरवाइजर, चिकित्सक, इंजीनियर नियुक्ति, फार्मासिस्ट, व्याख्याता नियुक्ति, झारखंड पात्रता परीक्षा, प्राथमिक शिक्षक नियुक्ति, सहकारिता पदाधिकारी, विवि में डिप्टी रजिस्ट्रार की परीक्षा और अन्य शामिल हैं।
यहां बड़ा सवाल यह है कि आखिर जेपीएससी की हर परीक्षा विवादों में क्यों फंसती है। सवाल तो यह भी है कि छठी सिविल सेवा परीक्षा का रिजल्ट नये सिरे से जारी कैसे किया जायेगा, क्योंकि तमाम अभ्यर्थियों के अंक तो सार्वजनिक हो चुके हैं। आयोग की गोपनीयता भंग हो चुकी है। ऐसे में अब ज्यादा आशंका इस बात की है कि पूरी परीक्षा ही रद्द कर दी जाये और नये सिरे से सातवीं, आठवीं और नौवीं सिविल सेवा परीक्षा के साथ इसे भी मिला दिया जाये। लेकिन उस स्थिति में वैसे अभ्यर्थियों का क्या होगा, जिनकी उम्र पार कर गयी है।
इन तमाम सवालों के जवाब इतने आसान नहीं हैं। जेपीएससी की कार्यप्रणाली और अब तक का ट्रैक रिकॉर्ड देख कर तो लगता है कि यह संस्था विवादों से परे जाकर कोई फैसला कर ही नहीं सकती है। इसके लिए जरूरी है कि इसके संगठनात्मक ढांचे में पूरी तरह बदलाव किया जाये। मुख्य रूप से रिटायर्ड नौकरशाहों को यहां नियुक्त करने की बजाय ऐसे अधिकारियों और विद्वानों को इसमें लाया जाये, जिनकी निष्ठा पर कभी संदेह नहीं किया गया हो। जिनका पूरा कैरियर पड़ा हो, जो विवाद से डरे। इसके साथ जेपीएससी को राजनीति और नेताओं के चंगुल से भी पूरी तरह आजाद करना होगा। ऐसा नहीं करने से झारखंड योग्य और कर्मठ अफसरों के लिए तरसता रहेगा और झारखंड की प्रतिभाएं कुंद होती रहेंगी। यह सामान्य बात नहीं है। जिस राज्य में प्रतिभाओं की कद्र नहीं होगी, योग्य लोगों को उपयुक्त जगह पर नहीं बैठाया जायेगा, वह कैसे देश की मुख्यधारा के साथ कदम से कदम मिला कर चलेगा। जेपीएससी का सवाल इतना महत्वपूर्ण है कि इस पर तत्काल ध्यान देने की जरूरत है। उम्मीद की जानी चाहिए कि हेमंत सोरेन की सरकार इसका सम्यक हल निकालेगी।