केंद्र सरकार ने खरीफ फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) तय कर दिया है और इसके अनुसार धान की कीमत 78 रुपये प्रति क्विंटल बढ़ा दी गयी है। खरीफ की दूसरी फसलों की कीमत भी बढ़ायी गयी है। अब राज्य सरकारें अपने हिसाब से किसानों के लिए बोनस की दर तय करेंगी। ऊपरी तौर पर यह साहसिक और किसान हित में उठाया गया कदम है, इसमें किसी को संदेह नहीं है, लेकिन इसकी तह में जाने से इसका खोखलापन साफ नजर आता है। चूंकि न्यूनतम समर्थन मूल्य को कोई कानूनी संरक्षण नहीं मिला हुआ है, इसलिए यह किसानों का अधिकार नहीं, बल्कि उन्हें दी गयी एक सुविधा मात्र है। चाहे खरीफ हो या रबी, आज भी देश के 70 प्रतिशत किसान अपनी फसल बिचौलियों के हाथों बेचने के लिए मजबूर हैं और इस दुष्चक्र से निकालने के लिए अब तक कभी कोई प्रयास नहीं किया गया है। फसलों की खरीद की सरकारी व्यवस्था भ्रष्टाचार और सियासी दांव-पेंच के बीच इतनी बुरी तरह फंसी हुई है कि छोटे किसान इसमें फंस कर केवल तड़फड़ा सकते हैं, इससे निकलने का कोई रास्ता उनके पास नहीं बच जाता है। कभी फसल गीला होने की बात कह कर, तो कभी फंड की कमी का हवाला देकर उनकी उपज खरीदने में सरकारी बाबू आनाकानी करते हैं, तो कभी नेताजी के बयानों का उलटा मतलब निकाल कर बिचौलिये औने-पौने दाम पर उपज खरीद लेते हैं। इस दुष्चक्र से बाहर निकलने के लिए किसान हमेशा हाथ-पैर मारता रह जाता है और उसके अरमान धरे के धरे रह जाते हैं। एमएसपी और हकीकत के बीच के इस फासले को रेखांकित करती आजाद सिपाही के टीकाकार राहुल सिंह की खास रिपोर्ट।
बुधवार नौ जून को जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में संपन्न केंद्रीय कैबिनेट की बैठक से कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर बाहर आये और खरीफ फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) बढ़ाये जाने के फैसले की घोषणा की, तब शायद उनके दिमाग में यह बात भी जरूर घूम रही होगी कि सरकार के इस तोहफे का किसानों के लिए क्या मतलब है। एक किसान के लिए एमएसपी का यह तिलिस्म कितना जटिल है, यह बात इस देश के किसानों का मुखिया जरूर जानता होगा। केंद्र सरकार के इस ऐतिहासिक फैसले से किसी को इनकार नहीं हो सकता और किसानों की भलाई के लिए उसकी नेकनीयती पर भी कोई संदेह नहीं किया जा सकता, लेकिन हकीकत यही है कि सरकार द्वारा घोषित एमएसपी का लाभ केवल कुछ बड़े किसानों तक ही पहुंच पाता है। छोटे किसान धान क्रय केंद्रों तक वाहन के अभाव में पहुंच ही नहीं पाते और मजबूरी में बिचौलियों के चंगुल में फंस जाते हैं।
फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करने की प्रणाली की शुरूआत 1965 में होने के बाद इसमें कुल 22 फसलों को शामिल किया गया। इनमें 14 खरीफ की फसलें हैं, जबकि छह रबी की और दो अन्य फसलें हैं। हर साल दो बार सरकार यह कीमत तय करती है। लेकिन यह जानना बेहद दिलचस्प है कि सरकार के इस फैसले को कोई कानूनी संरक्षण हासिल नहीं है, यानी इस फैसले का उल्लंघन करने पर किसी को सजा या जुर्माने का कोई प्रावधान नहीं है। यही पेंच किसानों को एक ऐसे दुष्चक्र में फंसा चुका है, जिससे निकल पाना उनके लिए असंभव हो गया है।
सरकार एमएसपी तय कर वाहवाही तो लूट लेती है, लेकिन जमीन पर उसका यह फैसला कितने असरदार तरीके से लागू हो रहा है, इसे देखनेवाला कोई नहीं है। सरकार अपनी मंडियों में और गांवों के लैंपस-पैक्स के माध्यम से फसल खरीदती है। यह व्यवस्था शुरू से ही बनी हुई है। लेकिन इन संस्थाओं में पसरा भ्रष्टाचार और स्थानीय सियासत की मार हमेशा किसानों पर ही पड़ती है। पिछले साल नवंबर में मध्यप्रदेश के दो किसानों ने केवल इसलिए आत्महत्या कर ली, क्योंकि उनका धान 15 दिन से अधिक समय तक मंडियों में पड़ा रह गया और जब उनकी बारी आयी, तब तक पूरी फसल खराब हो चुकी थी। यह स्थिति हर राज्य के सरकारी क्रय केंद्रों की है। कभी फंड की कमी, तो कभी बोरे या जगह की कमी के कारण किसानों की फसल खरीदने से इनकार कर दिया जाता है। बड़े किसानों को तो इससे कोई खास अंतर नहीं पड़ता, लेकिन छोटे किसान बेमौत मारे जाते हैं। वे मजबूर होकर मंडियों के बाहर बैठे बिचौलियों के हाथों औने-पौने दाम में फसल बेच कर अगली खेती की तैयारी में जुट जाते हैं। स्थानीय राजनीति भी इन सरकारी केंद्रों पर खूब हावी रहती है, जिसका तोड़ एक गरीब किसान के पास उपलब्ध ही नहीं होता।
एमएसपी और हकीकत के बीच की इस खाई को पाटना इतना आसान नहीं है। आंकड़ों में फसलों की खरीद की मात्रा हर साल बढ़ती जरूर दिखाई देती है, लेकिन इस अनुपात में किसानों की आय नहीं बढ़ती है। एक किसान, जिसने दो या तीन क्विंटल धान उगाया है, आखिर सरकारी केंद्र तक उसे ले कैसे जायेगा, इस पर कोई नहीं सोचता। फिर यदि वह किसी तरह वहां पहुंच गया और तीन दिन तक उसकी बारी नहीं आयी या कहा गया कि उसकी फसल में नमी है, तो वह उस फसल को वापस ले जाने की बजाय सस्ते दाम पर बेचने के लिए विवश हो जायेगा। इतना ही नहीं, किसान को इस बात की भी कोई गारंटी नहीं मिलती कि उसकी फसल की कीमत का भुगतान कब किया जायेगा।
झारखंड को ही लें। यहां भी हर साल एमएसपी के बाद किसानों को लाभ पहुंचाने के लिए बोनस की भी घोषणा की जाती है। लेकिन हकीकत क्या है। धान क्रय कें्रदों पर बिचौलिये हावी हैं। यहां कुछ छुटभैये नेताओं, अधिकारियों और दलालों की मिलीभगत है। पिछले साल सरकार ने एमएसपी के बाद किसानों को राहत पहुंचाने के लिए बोनस की भी घोषणा की। धान क्रय केंद्र भी खोल दिये गये। किसान अपना धान लेकर क्रय केंद्र तक पहुंंच भी गये, इसी बीच झारखंड के वित्त मंत्री रामेश्वर उरांव का एक बयान आ गया कि धान अभी गीला है, पंद्रह दिन बाद खरीदारी होगी। उनका बयान को चुनौती हम नहीं दे रहे हैं, लेकिन इस बयान की आड़ में धान क्रय केंद्र और एफसीआइ वालों ने बड़ा खेल कर दिया। जिनसे सौदा पट गया, उनका धान तो उन लोगों ने खरीद लिया, लेकिन छोटे किसान अपनी किस्मत पर आंसू बहाते रहे। अभी तक यह खबरें आती हैं कि एफसीआइ गोदाम के बाहर धान सड़ रहे हैं। किसानों की बात अधिकारी नहीं सुन रहे हैं। कई मंत्रियों तक ने यह बात उठायी है। ऐसे में जरूरी यह है कि एमएसपी के साथ किसानों को बाजार भी मुहैया कराया जाये। गांव में जाकर खरीदारी की जाये। खरीदारी करनेवालों की मॉनिटरिंग की जाये, ताकि बिचौलिये हावी न हों। अगर ऐसा नहीं हुआ, तो किसान आत्महत्या करता रहेगा। वह कभी बिचौलियों के हाथ, कभी मौसम की मार और कभी बाबुओं की मिलीभगत से त्राहि-त्राहि करता रहेगा।
अब सरकार और प्रशासन को चाहिए कि एमएसपी और हकीकत के बीच की इस खाई को जितनी जल्दी हो, पाटा जाये। इसके लिए सबसे जरूरी है कि एमएसपी के आदेश को कानूनी संरक्षण प्रदान किया जाये। यदि पूरे देश में यह नियम बना दिया जाये कि सरकार द्वारा घोषित कीमत से कम पर कोई भी फसल खरीदना अपराध है, तो यह दुष्चक्र काफी हद तक कमजोर पड़ सकता है। इसके बाद सरकारी केंद्रों के भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी पर लगाम लगाना होगा। तभी इस देश का अन्नदाता खून-पसीने की अपनी मेहनत का समुचित दाम वसूल सकेगा।