रास्ता कंटीला, पर आपके भरोसे का भरोसा है

आपका आजाद सिपाही सात साल का हो गया है। इस गलाकाट प्रतिस्पर्द्धा और बड़ी पूंजी के खेल में किसी कम संसाधन वाले हिंदी अखबार के लिए सात साल का सफर पूरा कर लेना आसान नहीं कहा जा सकता है।

मीडिया और खास कर प्रिंट मीडिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती के इस दौर में यदि आजाद सिपाही सुबह-सुबह आपके दरवाजे पर पहुंच रहा है, तो इसके पीछे दूसरी कोई ताकत नहीं, केवल आपका भरोसा है। वैसे देखा जाये, तो सात साल का समय बहुत लंबा तो नहीं होता, लेकिन इतिहास का एक अध्याय बनाने और लिखने लायक तो होता ही है। आजाद सिपाही ने सात साल पहले जब अपना सफर शुरू किया था, तो उसे पता नहींं था कि वह इस कांटों भरे रास्ते पर आगे कैसे बढ़ेगा, क्योंकि उसके पास सिवाय आपके भरोसे के कुछ भी नहीं था। हमारी सबसे बड़ी पूंजी आपका भरोसा और हमारे छोटे से परिवार का आत्मविश्वास था। यह आत्मविश्वास शुरू में डगमगाया भी, लेकिन हमने हार नहीं मानी। आपका भरोसा और प्यार हमारा संबल बना। अज जब हम पीछे मुड़ कर देखते हैं, तो हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि हम केवल आपके भरोसे ही इतनी दूर तक आ सके हैं।

किसी भी संस्थान की शुरूआत बेहद रोमांचकारी तरीके से होती है। हम अक्सर पढ़ते-सुनते आये हैं कि संस्थानों ने कैसे सफलता की सीढ़ियां तय की या फिर धूमकेतु की तरह प्रकट होकर गायब हो गये। आजाद सिपाही की कहानी थोड़ी अलग है, क्योंकि हमारे पास न भारी-भरकम पूंजी थी और न ही संसाधन। न किसी पूंजीपति का साथ था और न ही किसी राजनीतिक दल का समर्थन। आजाद सिपाही वह सपना था, जिसे पूरे परिवार ने मिल कर देखा, गुना और फिर उसे पूरा करने में जुट गया। आजाद सिपाही के नन्हे से कदम से बाजार को भले ही फर्क नहीं पड़ा, लेकिन हमारे और आपके रिश्ते की उस भरोसेमंद शुरूआत से हमें जरूर संबल मिला। हमारा सपना थोड़ा और रंगीन हुआ, हमारा संकल्प थोड़ा और मजबूत हुआ। कहा जाता है कि अगर किसी को तैरना सिखाना हो, तो उसे गहरे समंदर में फेंक दो। हमारे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। बिना किसी समारोह और कार्यक्रम के हम खबरों के महासागर में कूद पड़े। हमारा लाइफ जैकेट आपका भरोसा था। शुरूआत धमाकेदार तो नहीं हुई, लेकिन हमारे कदम सधे हुए जरूर थे। हमारे सामने केवल आप थे और हमें आपका ही ध्यान था।

सफर की शुरूआत हुई, तो रास्ते खुद ब खुद निकलने लगे। अंधेरी सुरंग में प्रवेश करने का सबसे बड़ा लाभ यह होता है कि शुरूआत में ही अंधेरे से लड़ने की ताकत मिल जाती है। हमें भी यह ताकत मिली। यह ताकत कहीं और से नहीं, आपसे मिली, आपके भरोसे से मिली। हम एक-एक कदम धरते गये। आपने डांटा-फटकारा, दुलारा और पुचकारा भी। यह हमारे लिए पूंजी थी। हमें चिंता थी आपकी खबरों की भूख शांत करने की, आपको सूचनाओं से समृद्ध करने की। हम कभी इस भ्रम में नहीं रहे कि हम बहुत ताकतवर हैं और न कभी आपको इस भ्रम में रखा कि आजाद सिपाही के पास जादू की छड़ी है, जिसे घुमाते ही आपकी सारी समस्याएं दूर हो जायेंगी। हम तो आपका आइना बनने चले थे और हमारा काम आपको सूचनाओं-खबरों से समृद्ध करना था। संसाधनों की कमी रास्ते में बाधा बनी, तो आप हमारे रिपोर्टर बन गये। किसी न किसी माध्यम से आप हर जरूरी सूचना हम तक पहुंचाते रहे। इसका सबसे बड़ा लाभ यह हुआ कि हमारे और आपके बीच का रिश्ता केवल अखबार और पाठक का रिश्ता नहीं रहा, बल्कि यह लगातार मजबूत होता गया और आज सात साल बाद हम कह सकते हैं कि यह रिश्ता भरोसे में बदल चुका है। आजाद सिपाही को भरोसा है कि कोई भी सूचना उस तक जरूर पहुंचेगी और आपको यह भरोसा है कि सूचना दी गयी है, तो वह आजाद सिपाही में जरूर छपेगी।

सफर जारी रहा, तो स्वाभाविक था कि कुनबा भी बड़ा होगा। हम भी बड़े हो रहे थे। लेकिन अपने संकल्प, सपने और यथार्थ की पथरीली जमीन से हमने कभी अपना नाता नहीं तोड़ा। हमने तो बड़े होने का सपना देखा था और उस सपने को आपने आकार दिया था, सो आपके भरोसे हम लगातार डटे रहे। प्रिंट के साथ डिजिटल दुनिया में भी आजाद सिपाही ने अपनी मौजूदगी कायम की, यू-ट्यूब, फेसबुक और ट्विटर के जरिये हम झारखंड के साथ-साथ देश-विदेश में अपनी धाक जमाने में लग गये। आपका भरोसा और मजबूत होता गया और हमारा परिवार भी बढ़ता गया। झारखंड के शहरों से निकल कर हम प्रखंड मुख्यालयों तक पहुंचने लगे। आपके विश्वास और भरोसे की ताकत के साथ हमारा कारवां लगातार आगे बढ़ रहा था। साथ ही हमारी जिम्मेदारी, जो हमने पहले दिन ही अपने ऊपर ली थी, भी बड़ी हो रही थी। हमारी खबरों का असर होने लगा और हमारा उत्साह बढ़ने लगे। कहते हैं कि अति-उत्साह में कभी-कभी गड़बड़ियां हो जाती हैं। हमारे साथ भी हुई। आपने हमें ताकीद की और हम अपनी गलतियों से सीख लेकर आगे बढ़ते गये।

इस बीच वह भयानक दौर भी आया, जिसने न केवल मीडिया के सामने, बल्कि पूरे समाज के सामने अंधेरा कायम कर दिया। महामारी के दौर में मीडिया समेत दूसरे संस्थान सिमटने लगे, उनका दायरा छोटा होने लगा। लेकिन आजाद सिपाही के पास आपके भरोसे की पूंजी थी, जिसने हमें हिम्मत दी, आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। हमने संकट के इस दौर में भी अपनी हिम्मत बनाये रखी, तो इसके पीछे भी आप ही थे। दूसरे मीडिया संस्थानों में जहां पैर समेटने का दौर चला, हम अपने विस्तार में लगे रहे। हम आज झारखंड के हर प्रखंड मुख्यालय में मौजूद तो हैं ही, अखबार की चर्चा दिल्ली, उत्तरप्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़ और ओड़िशा में भी हो रही है।

आज जब हम इस सात साल के सफरनामे पर नजर दौड़ा रहे हैं, तो हम गर्व के साथ कह सकते हैं कि हमने झारखंड की अखबारी दुनिया में एक इतिहास रचा है। आजाद सिपाही के लाखों पाठकों के साथ-साथ हम अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के जरिये तीन करोड़ से अधिक लोगों तक पहुंच रहे हैं। दो लाख से अधिक सब्सक्राइबरों के जरिये आज हम झारखंड से सबसे बड़े न्यूज पोर्टल बन चुके हैं। हमारी व्यूअरशिप 15 करोड़ से अधिक मिनट की हो चुकी है। इतना सब कुछ होते हुए आज भी हमारा दामन पूरी तरह बेदाग है, क्योंकि आजाद सिपाही ने कभी सफलता का शॉर्टकट नहीं अपनाया। हमने कभी किसी का भयादोहन नहीं किया और आज तक कभी आजाद सिपाही पर यह आरोप नहीं लगा कि यह अखबार ब्लैकमेल करता है। मीडिया की दुनिया के स्याह पक्ष को हमने पहले दिन से ही वर्जनाओं की सूची में रखा था और आज भी इस पर कायम हैं।

हमें यह कहने में भी कोई संकोच नहीं है कि आजाद सिपाही का अब तक का सफर बहुत आसान नहीं रहा। रास्ते कठिन थे, चुनौतियां बड़ी थीं। लेकिन हमें भरोसा केवल अपने संकल्प पर था और आप तो हमारे संबल थे। बड़ी पूंजी, महंगे संसाधन और महंगे प्रचार की तो हम कल्पना भी नहीं कर सकते थे। हम अपनी मामूली स्थिति से ही संतुष्ट थे, इस संकल्प के साथ कि हम पारदर्शी तरीके से नैतिक रास्ते पर चलते हुए अपनी स्थिति सुधारेंगे। हम आज एक बार फिर आपको विश्वास दिलाते हैं कि हमारा वह संकल्प आज भी जीवित है।

आजाद सिपाही के अब तक के सफर में आपने जो भरोसा दिया, संकट के दौर में हमारे साथ खड़े रहे, उसके एवज में आभार बहुत छोटा शब्द है। हमारे पास शब्द नहीं हंै। आज पूरे देश में जिस तरह का माहौल बनाया जा रहा है, जिस तरह से राजनीतिक सीढ़ी चढ़ने के लिए अखबार को हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है, इससे आप वाकिफ हैं। इसलिए आपका साथ पहले से ज्यादा हमें जरूरी है, ताकि हम समाज के प्रति अपने कर्तव्य, पत्रकारिता के प्रति समर्पण और खबरों की विश्वसनीयता पर खरा उतर सकें। इसलिए हम केवल इतना ही कह सकते हैं कि आपका सहयोग बना रहे, भरोसा कायम रहे। हम आपके और आप हमारे हैं।

Share.

Comments are closed.

Exit mobile version