देशभर की निगाहें इस वक्त महाराष्ट्र में पैदा हुए सियासी तूफान पर टिकी हुई हैं। शिवसेना विधायक और महाराष्ट्र सरकार में मंत्री एकनाथ शिंदे की बगावत उद्धव ठाकरे सरकार पर भारी पड़ती नजर आ रही है। शिंदे कुछ दिनों से नाराज चल रहे हैं। कहा जा रहा है कि उन्होंने अपने साथ शिवसेना के 40 विधायकों को तोड़ लिया है, जबकि सरकार को समर्थन दे रहे चार और विधायक उनके साथ आ गये हैं। इस तरह तीन साल पुरानी उद्धव ठाकरे सरकार को पूरे 44 विधायकों का घाटा हो गया है। महाराष्ट्र के इस सियासी संकट के तात्कालिक कारण भले ही कुछ और हैं, हकीकत यही है कि इस संकट की पटकथा 2019 में उसी दिन तैयार हो गयी थी, जब उद्धव ठाकरे की राजनीतिक महत्वाकांक्षा ने उन्हें कांग्रेस और राकांपा के साथ गठबंधन कर सरकार का मुखिया बना दिया था। यह एक ऐसी तिपहिया गाड़ी थी, जिसका एक पहिया फरारी का था, तो दूसरा ट्रैक्टर का और तीसरा रोड रोलर का। इसलिए इस गाड़ी का सफर हिचकोले लेता हुआ ही चलता रहा है। अब यह लगभग तय हो गया है कि इस बेमेल गठबंधन की गाड़ी आगे नहीं चल पायेगी, यह जानना दिलचस्प है कि आखिर एकनाथ शिंदे ने इतनी ताकत कहां से हासिल कर ली कि उन्होंने शिवसेना के 56 में से 40 विधायकों को अपने साथ आने के लिए तैयार कर लिया। इतना ही नहीं, यही शिंदे अब पार्टी पर ही दावा ठोंक रहे हैं। दूसरे शब्दों में कहा जाये तो यह बगावत नहीं, बल्कि शिवसेना के भीतर का तख्तापलट है और इसके लिए यदि कोई एक व्यक्ति जिम्मेदार है, तो वह खुद उद्धव ठाकरे हैं, जिन्होंने बाल ठाकरे के सिद्धांतों की अपनी महत्वाकांक्षा के लिए बलि चढ़ा दी। जो बाल ठाकरे जीवन भर हिंदुत्व का सिरमौर बने रहे, उन्हीं के पुत्र उद्धव ठाकरे ने कुर्सी की लालच में महाराष्टÑ की निर्दलीय सांसद नवनीत राणा और उनके विधायक पति रवि राणा को इसलिए जेल भिजवा दिया कि वह उनके घर के सामने हनुमान चालीसा का पाठ करने गये थे। यह मसजिदों में बज रह लाउडस्पीकर की प्रतिक्रिया स्वरूप थी। यह उद्धव ठाकरे का एक ऐसा कदम था, जिसने शिवसेना के विधायकों को अंदर से हिला कर रख दिया। उसी दिन से विधायकों के बीच यह कानाफूसी होने लगी कि क्या कोई नेता कुर्सी के लिए इस हद तक नीचे गिर सकता है। निर्दलीय विधायक हनुमान चालीसा का पाठ ही तो करने गयीं थीं, कोई हंगामा तो खड़ा नहीं कर रही थीं। महाराष्ट्र के सियासी संकट में अभी कई अध्याय लिखे जाने हैं, लेकिन अब तक की कहानी की परत-दर-परत जानकारी दे रहे हैं आजाद सिपाही के विशेष संवाददाता राकेश सिंह।

22 जून, बुधवार को यह रिपोर्ट लिखते समय गुवाहाटी में मौजूद महाराष्ट्र के शिवसेना विधायक एकनाथ शिंदे का यह बयान सामने आया कि उनके साथ शिवसेना के 44 विधायक हैं और वही असली शिवसेना हैं, जो बाल ठाकरे के सपनों के लिए हर कुर्बानी देने को तैयार हैं। यह वही एकनाथ शिंदे हैं, जो इस समय पूरे देश के सियासी हलचल के नायक बने हुए हैं और मुंबई से सूरत के रास्ते गुवाहाटी में अपने समर्थक विधायकों के साथ डेरा डाले हुए हैं। उनके खेमे में चार और विधायक शामिल हो गये हैं और इस तरह उनके पास अब कुछ 48 विधायक हैं, जिनमें 44 शिवसेना के हैं।

बहुमत का गणित
महाराष्ट्र में निर्दलीय और छोटे दलों के कुल 29 विधायक हैं। इसलिए सियासी संकट के बीच इन विधायकों की भूमिका काफी अहम हो गयी है। राज्य में विधानसभा की कुल 288 सीटें हैं, लेकिन शिवसेना के विधायक रमेश लटके की मृत्यु के बाद विधानसभा में अभी 287 सदस्य हैं। ऐसे में सरकार बनाने के लिए 144 विधायकों का समर्थन जरूरी है। सत्तारूढ़ महाविकास अघाड़ी में राकांपा, कांग्रेस और शिवसेना साथ हैं और 30 नवंबर 2019 को जब सरकार बनी, तो इनके पास कुल 169 विधायक थे। संकट शुरू होने से पहले सत्ता पक्ष के पास 160 विधायक थे। शिवसेना के पास अभी 55 विधायक हैं, जबकि राकांपा के पास 52 विधायक और कांग्रेस के पास 44 विधायक हैं। वहीं भाजपा के पास 106 विधायक हैं। राज्य में निर्दलीय और छोटे दलों के 30 विधायक भी हैं। उद्धव सरकार को गठबंधन के 151 विधायकों के अलावा समाजवादी पार्टी के दो, पीजपी के दो, बीवीए के तीन, माकपा के एक, और नौ निर्दलीय विधायकों का समर्थन है। दूसरी तरफ भाजपा के पास 106 विधायकों के अलावा सात अन्य विधायकों का समर्थन है। ऐसे में यदि एकनाथ शिंदे के पास दावे के अनुरूप 44 विधायक हैं और वे सभी उद्धव सरकार के खिलाफ हैं, तो फिर उद्धव सरकार निश्चित तौर पर अल्पमत में आ गयी है।
पर्दे के पीछे की कहानी

वर्तमान सियासी संकट की शुरूआत महाराष्ट्र विधान परिषद की कुल 30 में से 10 सीटों पर हुए चुनाव में क्रॉस वोटिंग से हुई। इस चुनाव में भाजपा ने पांच उम्मीदवार उतारे थे, जबकि उसके पास संख्या केवल चार को जिताने लायक ही थी। लेकिन सत्तारूढ़ गठबंधन की ओर से हुई क्रॉस वोटिंग और निर्दलीयों के समर्थन ने उसका रास्ता साफ कर दिया। राज्यसभा की तरह तरजीही आधार पर हुए चुनाव के पहले राउंड में भाजपा को चार, राकांपा-शिवसेना को दो-दो और कांग्रेस को एक सीट मिली। दूसरे राउंड में भाजपा के पांचवें उम्मीदवार प्रसाद लाड और कांग्रेस के भाई जगताप और चंद्रकांत हंडोरे के बीच कड़ी टक्कर हुई। जीत के लिए न्यूनतम जरूरत 26 वोटों की थी। लिहाजा, 44 विधायकों वाली कांग्रेस के लिए दोनों उम्मीदवारों को जिताना मुश्किल था। ऐसे में जगताप को 26 वोट मिले, पर हंडोरे को 22 ही मत पड़े और वह हार गये। लेकिन इस टक्कर में 28 वोट लेकर लाड ने सबको चौंका दिया। लाड की जीत से साफ हो गया कि शिवसेना और कांग्रेस के कई विधायकों ने अपने दल की बजाय भाजपा के समर्थन में क्रॉस वोटिंग की। यहीं से तूफान की शुरूआत हुई। कांग्रेस ने जहां शिवसेना पर धोखाधड़ी का आरोप लगाया, वहीं शिंदे अपने समर्थक विधायकों के साथ सूरत पहुंच गये। बाद में उद्धव ने उन्हें मनाने के लिए अपने दो दूत भेजे, लेकिन शिंदे ने साफ कर दिया कि सत्ताधारी गठबंधन से कांग्रेस और राकांपा को बाहर किये बिना वह वापस नहीं आयेंगे।

शिंदे की चुप्पी ने बढ़ा दिया है सस्पेंस
एक तरफ जहां भाजपा इस पूरे सियासी खेल को चुपचाप देख रही थी, उसके रणनीतिकार संभावित समीकरण साधने में जुटे हुए थे। हालांकि गुवाहाटी में शिंदे ने अपने पत्ते नहीं खोले थे। इससे सस्पेंस बढ़ गया है। शिंदे ने अब तक यह साफ नहीं किया कि वह भाजपा के साथ जाना चाहते हैं या फिर शिवसेना में अपना एक अलग गुट बना कर अपना दबदबा कायम रखना चाहते हैं। लेकिन इतना जरूर है कि उनका झुकाव भाजपा की तरफ है। कांग्रेस और राष्टÑीय कांग्रेस पार्टी से अलग होने का मतलब ही भाजपा से नजदीकी है।

दूसरी तरफ भाजपा के मुख्य रणनीतिकार देवेंद्र फडणवीस भी चुप हैं। वह नवंबर 2019 का वह अध्याय दोहराना नहीं चाहते, जब अजीत पवार ने उन्हें धोखा दिया था। भाजपा ने इसलिए भी चुप्पी साध रखी है, क्योंकि सरकार बनाने के लिए कुल 144 विधायकों की जरूरत है, जबकि उसके पास अपने सिर्फ 106 विधायक हैं। ऐसे में उसे सरकार बनाने के लिए कम से सम 39 विधायकों के समर्थन की जरूरत है। अगर ये जुट भी जाये, तो दलबदल विरोधी कानून के कारण दूसरी पार्टियों से टूट कर आये विधायकों के भविष्य पर खतरा बनेगा रहेगा। यह कानून तभी बाधक नहीं होगा, जब शिवसेना या अन्य किसी भी दल से टूटने वाले विधायकों की कुल संख्या संबंधित दल के कुल विधायकों की दो-तिहाई हो। यानी एकनाथ शिंदे को भाजपा के साथ सरकार बनाने के लिए कम से कम 36 विधायकों को तोड़ना होगा, क्योंकि शिवसेना के पास अभी 54 विधायक हैं, जिसकी दो-तिहाई संख्या 36 ही होती है। कांग्रेस के पास 44 विधायक हैं। बताया जा रहा है कि उसके भी 10 विधायकों का कोई अता-पता नहीं चल पा रहा है, यानी, कांग्रेस में फूट को कानूनी जामा पहनाने के लिए कम से कम 29 बागी विधायकों की जरूरत होगी। यही वजह है कि भाजपा काफी फूंक-फूंक कर कदम रख रही है। उसे पता है कि सिर्फ विधायकों का आंकड़ा जुटाने से सरकार बन तो जायेगी, लेकिन दलबदल विरोधी कानून के कारण बच नहीं पायेगी। चूंकि पूर्व में भाजपा अजीत पवार के मामले में अपनी किरकिरी झेल चुकी है, इसीलिए इस बार वह उतावलापन नहीं दिखा रही है। भाजपा जानती है कि एकनाथ शिंदे उसके पाले में ही आयेंगे।
संकट के पीछे 2024 की आशंका

दरअसल, इस सियासी संकट के पीछे 2024 की वह आशंका भी है, जिसके अनुसार महाराष्ट्र में शिवसेना को बड़ा नुकसान हो सकता है। कांग्रेस और राकांपा के साथ गठबंधन करने से महाराष्ट्र के वे वोटर उद्धव से नाराज हैं, जो हमेशा से बाल ठाकरे के कट्टर हिंदुत्व के साथ रहे। इस ताकत को नजरअंदाज कर पाना न उद्धव के लिए संभव है और न एकनाथ शिंदे के लिए। वैसे भी उद्धव ठाकरे की जगह एकनाथ शिंदे ही मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार थे, लेकिन उद्धव ने खुद कुर्सी अपने नाम कर ली और शिंदे को पीछे धकेल दिया। उसके बाद से ही शिंदे इस फिराक में थे कि कब बाजी पलटें। उचित समय आते ही शिंदे ने समय रहते अपनी चाल चल दी और वह उद्धव से बाजी मार ले गये।

एकनाथ शिंदे को शिवसेना के विधायकों का समर्थन इसलिए मिला, क्योंकि विधायकों को यह अच्छी तरह पता है कि अगले चुनाव में जब वे कांग्रेस और राकंपा के साथ मिल कर मैदान में उतरेंगे, उन्हें मिलेगा क्या। हिंदुत्व से अलग होकर वे अपने अस्तित्व को नहीं बचा सकते थे। यही कारण है कि सभी एकनाथ शिंदे के साथ हो लिये। अब यह देखना दिलचस्प है कि उद्धव ठाकरे अपने पिता की महान राजनीतिक विरासत को कितने दिन तक संभाल पाते हैं, क्योंकि एकनाथ शिंदे ने तो शिवसेना पर ही दावा ठोंक दिया है।

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