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    Home»विशेष»‘युवराज कल्चर’ ही खा गया ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस को
    विशेष

    ‘युवराज कल्चर’ ही खा गया ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस को

    shivam kumarBy shivam kumarJune 5, 2026No Comments10 Mins Read
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    विशेष
    कैसे एकक्षत्र बरसी अपार ममता ने पार्टी के विश्वसनियों को दूर कर दिया
    सत्ता के नशे में सिसक और अपमान का घूंट पीते रहे विधायक और सांसद
    नशा उतरा तो रसातल में पड़े मिले और टीएमसी के टूट की पटकथा लिख डाली
    पार्टी के सांसदों-विधायकों और नेताओं के साथ नौकरों जैसा व्यवहार किया जाता था: टीएमसी के मुख्य प्रवक्ता रहे रिजू दत्ता
    नमस्कार। आजाद सिपाही विशेष में आपका स्वागत है। मैं हूं राकेश सिंह।
    पश्चिम बंगाल की सत्ता से बाहर होते ही तृणमूल कांग्रेस का शिराजा बिखरने लगा है। कभी देश की सबसे फायरब्रांड महिला नेता के रूप में चर्चित ममता बनर्जी अपनी पार्टी को एकजुट रखने की पूरी कोशिश कर रही हैं, लेकिन इसमें वह सफल होती नहीं दिख रही हैं। पार्टी के 58 विधायकों ने अलग गुट बना लिया है और उन्होंने जो कुछ कहा है, वह टीएमसी में हुई टूट के पीछे की कहानी को सामने ले आता है। दरअसल, डेढ़ दशक तक बंगाल की सत्ता पर काबिज रहने के बाद जब टीएमसी सत्ता से बाहर हुई, तो उसकी अंदरूनी कहानी अब सामने आने लगी है। जानकारों की मानें तो ममता बनर्जी की पार्टी एक राजनीतिक दल से अधिक एक निजी कंपनी की तरह संचालित होने वाला संगठन था। इसकी सीइओ ममता बनर्जी थीं और मैनेजिंग डायरेक्टर अभिषेक बनर्जी, जबकि निर्णय प्रक्रिया पर एक सीमित समूह का प्रभाव था। तृणमूल कांग्रेस 15 वर्षों तक सत्ता में रही। यही सत्ता उसके संगठनात्मक अंतर्विरोधों को ढकने का सबसे बड़ा कारण थी। सत्ता का आकर्षण और सत्ता का भय, दोनों ने नेताओं को पार्टी में बनाये रखा। जो नेता पार्टी छोड़कर गये, उनके साथ प्रशासन और पुलिस का व्यवहार कैसा रहा, यह किसी से छिपा नहीं है। सुवेंदु अधिकारी से लेकर अर्जुन सिंह तक अनेक नेताओं ने आरोप लगाया कि उन्हें राजनीतिक रूप से निशाना बनाया गया और विभिन्न मामलों में उलझाया गया। लेकिन इन आरोपों के बाद कभी पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता रहे रिजू दत्ता ने जो कुछ कहा है, वह बेहद चौंकानेवाला है। बकौल दत्ता, पार्टी में सांसदों, विधायकों और नेताओं के साथ नौकरों जैसा व्यवहार किया जाता था। उन्होंने यहां तक कह दिया कि यदि इस बार टीएमसी जीत जाती, तो फिर सांसद-विधायक से लेकर आम कार्यकर्ता तक युवराज, यानी अभिषेक बनर्जी के गुलाम हो जाते। ममता बनर्जी के पुराने और भरोसेमंद सहयोगियों को लेकर यह शिकायत लंबे समय से रही कि अभिषेक बनर्जी के दौर में उनकी भूमिका सीमित होती चली गयी। स्वयं ममता बनर्जी भी सार्वजनिक रूप से यह कह चुकी हैं कि कई लोग उनसे अभिषेक को राजनीति से दूर रखने की सलाह देते थे। दूसरी ओर, अभिषेक बनर्जी की अपनी एक टीम थी, जो संगठन और सत्ता दोनों में प्रभावशाली मानी जाती थी, लेकिन आज वही टीम लगभग अदृश्य दिखाई दे रही है। यदि इस टूट और बिखराव के लिए किसी एक व्यक्ति को जिम्मेदार ठहराने की कोशिश की जाये, तो आरोपों का केंद्र अभिषेक बनर्जी बनते हैं। उनकी कार्यशैली को लेकर पार्टी के अनेक वरिष्ठ नेता सहज नहीं थे। ममता बनर्जी का प्रभाव और प्रशासनिक कार्रवाई का भय असंतोष को दबाए हुए था। सत्ता से बेदखली के साथ ही यह भय समाप्त हो गया और वर्षों से जमा असंतोष बाहर आने लगा। क्या है ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस में टूट का कारण और क्या हो सकता है इसका असर, बता रहे हैं आजाद सिपाही के संपादक राकेश सिंह।

    पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस का उदय एक जन-आंदोलन के गर्भ से हुआ था। सिंगूर और नंदीग्राम के भूमि आंदोलनों के दम पर ममता बनर्जी ने 2011 में 34 साल के वामपंथी शासन को उखाड़ फेंका था। उस समय टीएमसी की पहचान एक स्ट्रीट-फाइटर पार्टी की थी, जिसके नेता जमीन पर लोगों के साथ संघर्ष करते थे। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में पार्टी के भीतर एक नये राजनीतिक वर्ग और कार्य संस्कृति का जन्म हुआ है, जिसे राजनीतिक विश्लेषक युवराज कल्चर का नाम देते हैं। ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी के पार्टी में तेजी से बढ़ते दबदबे और उनके इर्द-गिर्द केंद्रित होती सत्ता संरचना ने टीएमसी की मूल वैचारिक और सांगठनिक आत्मा को गहरी चोट पहुंचायी है। यह केवल टिप्पणी नहीं, तल्ख सच्चाई है। कभी पार्टी के मुख्य प्रवक्ता रहे रिजू दत्ता ने एक इंटरव्यू में बाकायदा कहा है कि पार्टी के सांसदों-विधायकों और नेताओं के साथ नौकरों जैसा व्यवहार किया जाता था। वह कहते हैं: मैं राष्ट्रीय प्रवक्ता था, तो मेरी हैसियत किसी ड्राइवर की थी। विधायक की हैसियत घर में चाय-पानी देनेवाले नौकर की थी और सांसद की हैसियत किसी साफ-सफाई करनेवाले जैसी। बकौल दत्ता, टीएमसी के शासनकाल में यदि कोई आवाज उठाता, तो उसके साथ ऐसा व्यवहार होता था, जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती है। उन्होंने यहां तक कहा कि यदि इस बार टीएमसी जीत जाती, तो फिर सांसदों-विधायकों और कार्यकर्ताओं को गुलाम बना लिया जाता। बकौल दत्ता, ‘युवराज कल्चर’ ने पार्टी को डुबो दिया है। यहां सवाल है कि कैसे इस युवराज संस्कृति ने पार्टी के पुराने नेताओं को हाशिये पर धकेला, भ्रष्टाचार को संस्थागत रूप दिया और अंतत: पार्टी को एक गहरे आंतरिक संकट में झोंक दिया।

    2011 में हुई अभिषेक बनर्जी की एंट्री
    टीएमसी में ‘युवराज कल्चर’ का उदय और सांगठनिक बदलाव 2011 में अभिषेक बनर्जी के प्रवेश के रूप में हुआ। 2011 में उन्हें अखिल भारतीय तृणमूल युवा कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में हुआ। शुरूआत में इसे एक सामान्य राजनीतिक कदम माना गया, लेकिन धीरे-धीरे पार्टी के भीतर निर्णय लेने की पूरी प्रक्रिया उनके इर्द-गिर्द केंद्रित हो गयी। इसके बाद सत्ता का केंद्रीकरण शुरू हुआ। पुराने समय में टीएमसी में क्षेत्रीय क्षत्रपों (जैसे सुवेंदु अधिकारी, मुकुल रॉय, शोभनदेव चट्टोपाध्याय) का अपना वजूद और प्रभाव था। युवराज कल्चर के आने के बाद पार्टी की कमान हरीश मुखर्जी स्ट्रीट (ममता बनर्जी का आवास) और कैमेक स्ट्रीट (अभिषेक बनर्जी का कार्यालय) के बीच सिमट कर रह गयी।

    कॉरपोरेट शैली को अपनाया टीएमसी ने
    अभिषेक बनर्जी ने चुनावी रणनीतिकार के रूप में ख्याति अर्जित कर चुके प्रशांत किशोर की आइ-पैक जैसी पेशेवर एजेंसियों को लाकर पार्टी के सांगठनिक ढांचे को पूरी तरह बदल दिया। राजनीति, जो कभी जन-संपर्क और भावनाओं का खेल थी, वह डेटा, सर्वे और नफा-नुकसान के कॉरपोरेट मॉडल में बदल गयी।

    पुराने बनाम नये का टकराव
    इस संस्कृति ने पार्टी के जमीनी और वरिष्ठ नेताओं को दरकिनार कर दिया। जिन नेताओं ने लाठियां खाकर पार्टी को खड़ा किया था, उन्हें अचानक एक युवा नेता और मैनेजमेंट पेशेवरों के आदेशों का पालन करने पर मजबूर होना पड़ा। इसी असंतोष के कारण सुवेंदु अधिकारी जैसे बड़े जनाधार वाले नेता ने भाजपा का दामन थाम लिया, जो टीएमसी के लिए एक बड़ा ऐतिहासिक मोड़ साबित हुआ।

    जमीनी जुड़ाव का टूटना और पैराशूट लीडर
    युवराज कल्चर की सबसे बड़ी विकृति यह रही कि इसने पार्टी की माटी-मानुष की मूल अवधारणा को कमजोर कर दिया। पहले कार्यकर्ता सीधे ममता बनर्जी या क्षेत्रीय बड़े नेताओं से संवाद कर सकते थे। अब उनके और नेतृत्व के बीच कई अवरोध खड़े कर दिये गये। कार्यकर्ताओं की शिकायतें सुनने वाला कोई सांगठनिक तंत्र नहीं बचा। पार्टी के भीतर योग्यता का पैमाना जनता के बीच लोकप्रियता या संघर्ष नहीं, बल्कि युवराज के प्रति वफादारी बन गया। इसके चलते राजनीति से दूर रहने वाले अभिनेताओं, व्यवसायियों और नौकरशाहों को टिकट और सांगठनिक पद दिये जाने लगे। इससे जमीनी कार्यकर्ताओं में घोर निराशा फैली, जिससे उनका मनोबल टूट गया।

    संस्थागत भ्रष्टाचार और केंद्रीय एजेंसियों का शिकंजा
    युवराज संस्कृति में सत्ता के विकेंद्रीकरण की बजाय कुछ चुनिंदा हाथों में पैसों और संसाधनों का नियंत्रण आ गया। इसने पश्चिम बंगाल की राजनीति को भ्रष्टाचार के एक ऐसे दलदल में धकेल दिया, जिसने टीएमसी की छवि को अपूरणीय क्षति पहुंचायी। स्कूल सेवा आयोग घोटाला, कोयला तस्करी, मवेशी तस्करी और राशन वितरण घोटाला जैसी घटनाएं केवल व्यक्तिगत भ्रष्टाचार के मामले नहीं थे। ये एक संगठित नेटवर्क का हिस्सा थे, जिसके तार कहीं न कहीं सत्ता के शीर्ष केंद्रों से जुड़ते दिखे। पार्थ चटर्जी, अनुब्रत मंडल और ज्योतिप्रिय मल्लिक जैसे कद्दावर नेताओं की गिरफ्तारी ने साबित किया कि पार्टी का पूरा निचला से लेकर मध्य स्तर का तंत्र इस सिंडिकेट राज में लिप्त था। सरकारी योजनाओं में कमीशनखोरी और कट मनी की बात तो खुद ममता बनर्जी ने भी स्वीकार की थी।

    ‘युवराज’ पर सीधे आरोप
    केंद्रीय जांच एजेंसियों द्वारा अभिषेक बनर्जी और उनके करीबी सहयोगियों से बार-बार की गयी पूछताछ ने जनता के बीच यह संदेश दिया कि इस भ्रष्टाचार की जड़ें सीधे युवराज संस्कृति से जुड़ी हैं। विपक्ष को यह नैरेटिव बनाने में आसानी हुई कि बंगाल का पैसा सीधे भतीजे के पास जा रहा है।

    आंतरिक गुटबाजी और अनुशासनहीनता
    जब किसी पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र खत्म हो जाता है और केवल एक उत्तराधिकारी को स्थापित करने का प्रयास किया जाता है, तो आंतरिक विद्रोह स्वाभाविक है। टीएमसी में भी यही हुआ। ममता के वफादार बनाम अभिषेक के ब्रिगेड के बीच स्पष्ट विभाजन देखा गया। सुब्रत मुखर्जी, सौगत रॉय, फिरहाद हकीम जैसे पुराने नेताओं को कई मौकों पर सार्वजनिक या परोक्ष रूप से अपनी नाराजगी जाहिर करनी पड़ी। जिलों में टिकटों के बंटवारे और पंचायतों के नियंत्रण को लेकर टीएमसी के ही दो गुट आपस में भिड़ने लगे। बंगाल में होने वाली राजनीतिक हिंसा का एक बड़ा हिस्सा अब विरोधी दलों के खिलाफ नहीं, बल्कि टीएमसी के आंतरिक गुटों के बीच वर्चस्व की लड़ाई का परिणाम बन गया था। युवराज का नियंत्रण केवल कागजी और कॉरपोरेट स्तर पर रहा, वह जमीनी स्तर पर इन गुटों को अनुशासित करने में विफल रहे।

    वैचारिक शून्यता और नैरेटिव की हार
    उपरोक्त तमाम कारणों का परिणाम यह हुआ कि ममता बनर्जी की टीएमसी, जो कभी एक वामपंथ-विरोधी, गरीब-परस्त और जन-आंदोलनवादी पार्टी थी, एक मैनेज्ड पार्टी बन गयी। युवराज कल्चर ने इसे जनता से काट दिया, जिसके पास कोई ठोस वैचारिक आधार नहीं बचा। राजनीतिक रूप से खुद को सुरक्षित रखने के लिए पार्टी ने जिस तरह का रुख अपनाया, उससे राज्य में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा मिला। भाजपा ने इस कमजोरी को भांप लिया और टीएमसी को हिंदू-विरोधी और तुष्टिकरण की राजनीति करने वाली पार्टी के रूप में चित्रित कर दिया। ममता बनर्जी के नेतृत्व में टीएमसी युवराज संस्कृति इस वैचारिक हमले का कोई बौद्धिक या राजनीतिक जवाब नहीं ढूंढ़ सकी। इससे भद्रलोक और युवाओं का पार्टी से मोहभंग हुआ। बंगाल का युवा वर्ग, जो रोजगार और औद्योगिक विकास की उम्मीद कर रहा था, उसने देखा कि सरकार केवल खैरात और मेलों-उत्सवों में व्यस्त है। रोजगार के अवसरों की कमी और एसएससी घोटाले ने पढ़े-लिखे बंगाली समाज को टीएमसी से पूरी तरह दूर कर दिया।

    चुनावी राजनीति और सांगठनिक खोखलापन
    हालांकि टीएमसी ने ममता बनर्जी के व्यक्तिगत करिश्मे के दम पर 2021 के विधानसभा चुनाव और बाद के कुछ चुनावों में जीत हासिल की, लेकिन सांगठनिक स्तर पर पार्टी खोखली होती चली गयी। पार्टी ममता के चेहरे पर अत्यधिक निर्भर हो गयी। युवराज कल्चर अपने दम पर कोई चुनावी वैतरणी पार करने में सक्षम नहीं दिखा है। आज भी पार्टी को वोट केवल और केवल ममता बनर्जी के नाम पर मिलते हैं। यदि ममता बनर्जी को चुनावी परिदृश्य से हटा दिया जाये, तो अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व में पार्टी ताश के पत्तों की तरह बिखर सकती है। यह इस संस्कृति की सबसे बड़ी विफलता है कि यह एक सर्वस्वीकार्य दूसरा नेतृत्व तैयार नहीं कर पायी।
    पश्चिम बंगाल की वर्तमान राजनीतिक वास्तविकता का एक कड़वा और सटीक विश्लेषण यही कहता है कि जनांदोलन की कोख से पैदा हुई तृणमूल कांग्रेस को उसके युवराज कल्चर ने अपना ग्रास बना लिया। जिस पार्टी को ममता बनर्जी ने अपने खून-पसीने और अद्वितीय संघर्ष से सींचा था, उसे वंशवाद, कॉरपोरेट प्रबंधन, सिंडिकेट राज और अहंकार की संस्कृति ने भीतर से दीमक की तरह चाट लिया। अभिषेक बनर्जी को थोपने की जल्दबाजी और पुराने कद्दावर नेताओं की अनदेखी ने पार्टी के सांगठनिक ढांचे को पंगु बना दिया। आज टीएमसी भीतर से पूरी तरह जर्जर हो चुकी है। यदि टीएमसी को अपना अस्तित्व बचाना है, तो उसे इस युवराज कल्चर से बाहर निकलकर दोबारा अपनी माटी-मानुष की जड़ों की ओर लौटना होगा, अन्यथा इतिहास गवाह है कि जनता का विश्वास खोने के बाद बड़े से बड़े राजनीतिक साम्राज्य भी ताश के महल की तरह ढह जाते हैं।

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