नगदी लेकर रायपुर का होटल खरीदने पहुंच गया था संगठन का सुप्रीमो
टेरर फंडिंग के मामले में झारखंड देश भर में अव्वल है। तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह यह स्वीकार कर चुके थे कि पूरे देश में विकास योजनाओं और कोयला के अवैध कारोबार से नक्सली हर साल पांच हजार करोड़ की लेवी वसूलते हैं। झारखंड, महाराष्टÑ और छत्तीसगढ़ में सबसे ज्यादा वसूली की जाती है। लोकसभा में जिस दिन राजनाथ सिंह का यह बयान आया, उससे ठीक एक दिन पहले झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास के कार्यालय (सीएमओ) से अधिकारियों को यह निर्देश दिया गया था कि टेरर फंडिंग रोकने के लिए हर कदम उठाया जाये। साथ ही पुलिस को यह भी निर्देश था कि नक्सलियों के खिलाफ बड़ी कार्रवाई की जाये।
सीएमओ से जो आदेश जारी हुआ, अगर उस पर कार्रवाई होती, तो अरबों रुपये नक्सलियों और अफसरों के हाथों में जाने से बचाये जा सकते थे। सच यह है कि झारखंड के कुछ अधिकारी यह नहीं चाहते कि कोयला उत्पादन करनेवाले इलाकों से वसूली जानेवाली अवैध रकम पर रोक लगायी जाये। अगर यह रोक लगती, तो नक्सलियों की टेरर फंडिंग तो बंद होती, लेकिन अधिकारियों की झोली नहीं भरती
12 जनवरी 2016 को सीएमओ से जारी हुआ था आदेश
मुख्यमंत्री रघुवर दास के कार्यालय से 12 जनवरी 2016 को एक पत्र जारी हुआ था। गृह, कारा एवं आपदा प्रबंधन विभाग के अपर मुख्य सचिव के नाम जारी इस पत्र में मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव ने चतरा की आम्रपाली और मगध कोलियरी में उग्रवादी संगठन टीपीसी द्वारा की जा रही अवैध वसूली पर रोक लगाने और नक्सलियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने का आदेश दिया था।
मुख्य सचिव ने भी लिखा था पत्र
इसके पहले 21 दिसंबर 2015 को तत्कालीन मुख्य सचिव राजीव गौबा ने गृह विभाग को एक पत्र भेजा था। इसमें चतरा जिला के टंडवा की आम्रपाली और पिपरवार कोयला परियोजना में लोकल सेल संचालन कमिटी को भंग करने का निर्देश दिया गया था। पत्र में लिखा गया था कि चतरा जिले में अपराध की पृष्ठभूमि के पीछे यह कमिटी भी है। उक्त कोयला परियोजनाओं की लोकल सेल संचालन कमिटी द्वारा प्रत्येक माह करोड़ों रुपये की उगाही की जाती है। संचालन कमिटी के कुछ सदस्य अकूत संपत्ति भी बना चुके हैं, जिसमें बिंदेश्वर गंझू उर्फ बिंदु गंझू, प्रेम सागर मुंडा, भीखन गंझू, जानकी गंझू आदि शामिल हैं। मुख्य सचिव ने पत्र में आर्थिक अपराध पर रोक लगाने और एसआइटी गठित कर मामले की जांच कराने के आदेश दिये थे।
विशेष शाखा ने भी किया था आगाह
छह जनवरी, 2016 को विशेष शाखा के एडीजीपी अनुराग गुप्ता ने भी चतरा एसपी को पत्र लिख कर पूरे मामले की जानकारी दी थी। इसमें कहा गया था कि चतरा पुलिस के कई अधिकारी टीपीसी के संपर्क में हैं। मगध और आम्रपाली कोयला परियोजनाओं में ठेकेदारों और टीपीसी की वसूली में हिस्सेदार हैं। इस पत्र के जारी होने से दो दिन पहले चार जनवरी को टीपीसी के खिलाफ कार्रवाई की रणनीति बनाने के लिए पुलिस मुख्यालय में बैठक हुई थी। लेकिन कार्रवाई तो नहीं हुई, उल्टा नक्सलियों को संरक्षण ही मिलने लगा और उनका रक्षा कवच थोड़ा और मजबूत हो गया।
वारंट के बाद जीत गया था ब्रजेश गंझू
टीपीसी का सुप्रीमो ब्रजेश गंझू है। वह पुलिस की नजर में फरार है। चतरा के लावालौंग प्रखंड अंतर्गत लावालौंग पंचायत से वह निर्विरोध पंचायत चुनाव जीत गया, जबकि उसके खिलाफ वारंट जारी था। स्थानीय थाना प्रभारी ने उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की थी। यह पुलिस और टीपीसी की सांठगांठ को दर्शाता है। बिंदू गंझू भी उस समय फरार था। उसके ठिकानों से मोटी रकम भी बरामद की गयी थी, लेकिन इस बिंदु पर भी कोई छानबीन नहीं की गयी कि इतनी बड़ी रकम उग्रवादी को कहां से मिली। विशेष शाखा ने पुलिस के कुछ अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका पर भी सवाल खड़े किये थे।
कार्रवाई होती तो टेरर फंडिंग रूक जाती
झारखंड पुलिस के अधिकारी अगर ऊपर से आये निर्देशों का पालन करते तो यह मामला इतना गंभीर नहीं होता और नक्सलियों का आर्थिक साम्राज्य इतना मजबूत नहीं होता। फिर यह मामला एनआइए को भी जांच के लिए नहीं देना पड़ता। न ही देश के बड़े उद्योगपतियों में शुमार नवीन जिंदल को चतरा आना पड़ता और इस अवैध कारोबार की जानकारी भारत सरकार को देनी पड़ती। सच तो यह है कि चतरा की दबंग कमिटी के खिलाफ जब-जब जांच के आदेश दिये गये, तब-तब जांच करनेवाली एजेंसी कमिटी से मिल कर मोटी रकम ऐंठ लेती थी। गांव के लोग अगर इस अवैध वसूली और कोयला तस्करी का विरोध करते थे, तो पुलिस प्रशासन उनके खिलाफ सरकारी काम में बाधा डालने का केस कर जेल भेज देता था। कोई भी पुलिस अधिकारी अगर इस अवैध वसूली को रोकने की कोशिश करता, तो उसका तबादला कर दिया जाता था। एनआइए के हाथ जो डायरियां लगी हैं, उनमें झारखंड पुलिस के कई अधिकारियों के नाम हैं। सीसीएल के अफसर, कुछ मीडियाकर्मी, प्रदूषण विभाग के अधिकारी और सुरक्षा गार्ड भी इसमें शामिल हैं।
एनआइए अब इस टेरर फंडिंग के गठजोड़ को तोड़ने की कोशिश में लगी है। टंडवा थाना में तीन मामले दर्ज किये गये हैं, जिनकी जांच एनआइए कर रही है। इन मामलों में कई अधिकारियों की गर्दन फंस सकती है।
आक्रमण और ब्रजेश को भगा दिया था पुलिस ने
टीपीसी का गठन एक बड़े पुलिस अधिकारी के सहयोग से हुआ था। ब्रजेश गंझू उस समय एमसीसीआइ का कमांडर हुआ करता था। उससे कुछ अधिकारियों ने संपर्क किया और उसे टीपीसी नामक नया संगठन बनाने के लिए राजी करने में सफल रहे। इस संगठन को एमसीसीआइ के खिलाफ खड़ा किया गया था। चतरा, लातेहार, पलामू और हजारीबाग के कुछ इलाकों में देखते ही देखते टीपीसी ने करीब पांच सौ लोगों को अपने संगठन से जोड़ लिया। उस समय तो कुछ हथियार पुलिस की ओर से दिये गये, लेकिन संगठन की आर्थिक स्थिति जब गड़बड़ाने लगी, उसी समय आम्रपाली कोयला परियोजना में उत्पादन शुरू हुआ। पुलिस के कुछ अधिकारियों के निर्देश पर ही पहले विस्थापन के नाम पर, और फिर दबंग कमिटी के नाम पर 254 रुपये प्रति टन की वसूली की जाने लगी। साल-दो साल के बाद संगठन के पास अकूत पैसा आ गया और अफसर से लेकर कई लोग इस पैसे के हिस्सेदार बन गये। पुलिस खुल कर इस संगठन को सपोर्ट करने लगी। अब दबंग कमिटी तो भंग हो गयी है, लेकिन यह वसूली ट्रांसपोर्टरों के माध्यम से की जा रही है। ब्रजेश गंझू के बाद आक्रमण दूसरा बड़ा नाम है। एनआइए जांच के जब आदेश हुए, तब पुलिस और सीसीएल के कई अधिकारियों की नींद उड़ गयी। उन्हें भय था कि यदि ये दोनों एनआइए के हाथ लगे, तो पूरे सिस्टम की पोल खुल जायेगी। कई अधिकारी सीधे फंसेंगे। चर्चा है कि कुछ अधिकारियों की ओर से ब्रजेश और आक्रमण को चतरा इलाका छोड़ देने की सलाह दी गयी।
राजनीति में इंट्री
टीपीसी का जनाधार तेजी से बढ़ता चला गया। पुलिस का समर्थन होने के कारण इसके खिलाफ कोई मुंह खोलने को तैयार नहीं था। अब भी चतरा में यही स्थिति है। पंचायत और शहरी निकायों में तो सीधा प्रतिनिधित्व इस संगठन का है। लावालौंग और कुंदा की कई पंचायतों के मुखिया इसी संगठन के इशारे पर निर्विरोध चुनाव जीत गये।
शहरी निकाय के सभी पदों पर इसी संगठन का दबदबा है। उस इलाके के एक विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व भी टीपीसी उग्रवादी के एक रिश्तेदार करते हैं। एक तरफ अकूत पैसा और दूसरी तरफ राजनीति में दबदबा के कारण कभी बंदूक लेकर जंगलों में रहनेवाले इन उग्रवादियों का व्यवसाय दूसरे राज्यों में भी फैल गया।
चार स्कार्पियो में नगदी पैसा भर कर गया था ब्रजेश गंझू
रायपुर के एक बड़े होटल को खरीदने के लिए ब्रजेश गंझू नगद रकम लेकर पहुंचा था। यह घटना 2015 की है। उस समय होटल मालिक ने अपने होटल को बेचने के लिए अखबारों में विज्ञापन दिया। इसमें जो नंबर दिया गया था, उस पर ब्रजेश के लोगों ने कॉल किया और होटल खरीदने की इच्छा जाहिर की। जिस दिन उन्हें रायपुर बुलाया गया, उस दिन पांच स्कॉर्पियो में बोरों में 40 करोड़ रुपये लेकर ब्रजेश वहां पहुंचा था। उसके साथ 18 लोग गये थे। सब कुछ तय हो गया था, लेकिन होटल मालिक ने नगद लेने से इनकार कर दिया था। इस तरह वह सौदा सफल नहीं हो सका था। रायपुर के एक पुलिस अधिकारी इस होटल मालिक के दोस्त हैं। उन्हें इसकी पूरी जानकारी दी गयी। सीसीटीवी कैमरे में कैद तसवीरें भी दी गयी थीं। उस समय के पुलिस अधिकारी ने झारखंड के एडीजीपी रैंक के बैचमेट अधिकारी को पूरी जानकारी दी थी। झारखंड के अधिकारी ने यह सूचना चतरा पुलिस के अधिकारियों को दी और कार्रवाई के लिए कहा था। वे टीपीसी पर कार्रवाई के लिए दबाव बना रहे थे कि उन्हें ही पद से हटा दिया गया।