मुश्किल : डॉ रामेश्वर उरांव और आलमगीर आलम के समक्ष चुनौतियों का अंबार
काफी दिनों से कांग्रेस में संकट का जो दौर शुरू हुआ है, वह अभी थमने का नाम नहीं ले रहा है। इस समय राजस्थान, पंजाब, छत्तीसगढ़ में कांग्रेस में विवाद ने सुर्खियां बटोरी हैं। इस बीच झारखंड कांग्रेस में भी कांव-कांव शुरू हो गया है। यहां कांग्रेस के माननीय क्रोध में हैं। इसके पीछे का कारण बोर्ड-निगम और 20 सूत्री का गठन नहीं होना बताया जा रहा है। वहीं ये नेता प्रदेश नेतृत्व से भी खुश नहीं हैं। यही कारण है कि ये कभी टुकड़े-टुकड़े में बैठक कर रहे हैं, तो कभी दिल्ली तक की दौड़ लगा रहे हैं। अब तो ये नेता झारखंड में कांग्रेस नेतृत्व के समक्ष भी सार्वजनिक मंच पर अपनी नाराजगी व्यक्त करने लगे हैं। वैसे, झारखंड का प्रदेश नेतृत्व क्राइसिस मैनेजमेंट में जुटा है, लेकिन इसका कोई खासा असर दिख नहीं रहा है। प्रदेश अध्यक्ष डॉ रामेश्वर उरांव और विधायक दल के नेता आलमगीर आलम के लिए राह आसान नहीं दिख रही है। वे दोनों चुनौतियों के अंबार तले दबे हुए हैं। झारखंड कांग्रेस के मौजूदा हालात और प्रदेश नेतृत्व के समक्ष चुनौतियों पर प्रकाश डालती आजाद सिपाही के सिटी एडिटर राजीव की रिपोर्ट।
पिछले महीने कांग्रेस के चार विधायक इरफान अंसारी, उमाशंकर अकेला, राजेश कच्छप और ममता देवी दिल्ली गये थे। तभी से यह बात सार्वजनिक हो गयी है कि कांग्रेस विधायकों का एक वर्ग मौजूदा प्रदेश नेतृत्व और विधायक दल के नेता के समक्ष चुनौती पेश कर रहा है। इनके साथ-साथ महगामा विधायक और कांग्रेस की राष्टÑीय सचिव दीपिका पांडेय सिंह भी मोर्चा खोलनेवालों की सूची में शामिल हो गयीं। वैसे दिल्ली से लौटने के बाद ये विधायक कांग्रेस विधायक दल के नेता आलमगीर आलम और प्रदेश अध्यक्ष डॉ रामेश्वर उरांव की ओर से आहूत बैठक में शामिल हुए और खुल कर अपनी बातें रखीं। यह पहला अवसर था, जब झारखंड में सरकार गठन के बाद कांगे्रस के विधायक इतने तेवर में दिखे और बिंदुवार यह बात का इजहार किया कि किस तरह वे अपमानित महसूस कर रहे हैं। किस तरह एक दारोगा और बीडीओ-सीओ तक उनकी बातें नहीं सुनते और उन्हें कार्यकर्ताओं के साथ अपमानित होना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि जनता से किये गये वादे पूरे नहीं हो रहे हैं। ऐसे में काम नहीं होने पर जनता की उम्मीदें टूटेंगी और इसका खामियाजा अंतत: कांग्रेस को ही भुगतना पड़ेगा। उनका दुखड़ा था कि यह हाल जब विधायकों का है, तो कांग्रेस के आम कार्यकर्ताओं का क्या हश्र होगा, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। आलमगीर आलम ने यह कह कर उनके जख्म पर मलहम लगाया कि जल्द वे इन समस्याओं और परेशानियों से मुख्यमंत्री को अवगत करायेंगे। इस बैठक के बाद प्रदेश अध्यक्ष डॉ रामेश्वर उरांव ने भी जिलाध्यक्षों के साथ बात की। उनकी नब्ज को टटोला। यह आम शिकायत रही कि कार्यकर्ताओं को तरजीह नहीं मिल रही है। अफसर उनकी नहीं सुन रहे हैं। इस पर प्रदेश अध्यक्ष को यहां तक कहना पड़ा कि इस संबंध में अधिकारियों के साथ बैठक कर आवश्यक दिशा-निर्देश देंगे। प्रदेश अध्यक्ष के इस बयान ने भी कार्यकर्ताओं के जख्म पर मरहम तो जरूर लगा दिया है, लेकिन अभी यह घाव कब तक भरेगाा, इसे लेकर अनिश्चितता है।
कांग्रेस की मौजूदा स्थिति यह हो गयी है कि माननीयों का एक वर्ग आलाकमान की नजर में खुद को सही और सामने वाले को गलत साबित करने में लगा हुआ है। प्रदेश कांग्रेस अगर दो गुट में बंटा होता, तो बात समझ में आती, लेकिन संगठन और उसके नेता कई गुटों में बंटे हैं। झारखंड कांग्रेस में एक पद, एक व्यक्ति को लेकर अध्यक्ष रामेश्वर उरांव को घेरने की पुरजोर कोशिश हो रही है। वैसे रामेश्वर उरांव भी दिल्ली का चक्कर लगा कर अपना किला मजबूत कर आये हैं।
दिल्ली दौरा कर राजनीतिक पारा बढ़ाने वाले कांग्रेस विधायक दीपिका पांडेय सिंह, इरफान अंसारी, उमाशंकर अकेला, राजेश कच्छप और ममता देवी भी लगातार नाराजगी जता रहे हैं। इसमें विधायक पूर्णिमा नीरज सिंह और अंबा प्रसाद का भी साथ मिल रहा है। यहां तक कि विधायक इरफान अंसारी ने प्रदेश अध्यक्ष रामेश्वर उरांव के खिलाफ हमला बोला था। उनका आरोप था कि रामेश्वर उरांव के इर्द-गिर्द गलत लोगों का जमावड़ा है। वैसे, कहा तो यह जा रहा है कि कांग्रेस के इन नाराज विधायकों के दिल्ली जाने का मकसद एक व्यक्ति, एक पद के फॉर्मूले को लागू करने के लिए पार्टी आलाकमान पर दबाव बनाना था। उनके मुताबिक सभी को मौका मिलना चाहिए। एक व्यक्ति क्यों दो पदों पर रहेगा, इससे संगठन में काम करने वाले लोगों के बीच नाराजगी बढ़ रही है। बाहर से भले ही कांग्रेस विधायकों की नाराजगी संगठन तक सीमित दिख रही हो, पर असल में यह किसी खास रणनीति का बड़ा हिस्सा माना जा रहा है। कांग्रेस की ओर से जो मांग की जा रही है कि राज्य में बोर्ड-निगम के पद का बंटवारा हो, सूचना आयोग और महिला आयोग के अध्यक्ष जैसे पद रिक्त हैं। 20 सूत्री और निगरानी समिति का गठन नहीं किया गया है। प्रदीप यादव और बंधु तिर्की को विधानसभा में कांग्रेस विधायक की मान्यता नहीं मिली है। कांग्रेस विधायकों पर लगातार हो रहे मुकदमों से भी नाराजगी है। जिला स्तर पर अधिकारियों के द्वारा कांग्रेस नेताओं की अनदेखी और 12 वें मंत्री पद पर कांग्रेस की दावेदारी प्रमुख है।
प्रदेश नेतृत्व की चिट्ठी पर भी मचा बवाल
कांग्रेस में किचकिच जारी है। हर दिन बंद कमरे में संगठन के खिलाफ कांग्रेस के नेता जम कर भड़ास निकाल रहे हैं। इसी बीच संगठन द्वारा जारी चिट्ठी पर भी घमासान मचा। इस बार भी प्रदेश अध्यक्ष रामेश्वर उरांव ही निशाने पर रहे। पिछले दिनों मोरहाबादी स्थित संगम गार्डन में पूर्व युवा कांग्रेस के नेताओं का कारवां समागम हुआ। इस समागम के बाद प्रदेश कार्यकारी अध्यक्ष मानस सिन्हा ने प्रदेश अध्यक्ष का नाम लिये बगैर कहा कि यहां पुलिसिंग नहीं चलेगी। कार्यकर्ताओं या नेताओं को लाइन हाजिर नहीं कर सकते हैं। कार्यकर्ताओं और नेताओं को तनख्वाह नहीं दी जाती है। कांग्रेस के लिए संगठन के अंदर बेहतर तालमेल का अभाव साफ-साफ दिख रहा है। पार्टी संगठन ना सिर्फ कई खेमों में बंटा है, बल्कि हर खेमा कांग्रेस के हाथ को मजबूत करने के बजाय कमजोर ही कर रहा है। राजनीतिक दल होने के नाते शायद ये बेहतर संकेत नहीं है, खासकर तब जबकि प्रदेश में कांग्रेस समर्थित सरकार हो। इस गुटबाजी का सीधा असर प्रदेश कांग्रेस के चलाये जा रहे देशव्यापी आउटरीच अभियान पर पड़ा है। हालांकि जमीनी स्तर पर थोड़ा बहुत काम हो रहा है, लेकिन नेताओं का ज्यादा समय इस गुटबाजी में ही बीत रहा है।