इलाज के नाम पर धन उगाही : निजी अस्पतालों की लूट से जनता को बचा सकती है सरकार
झारखंड हाइकोर्ट ने टिप्पणी की है कि प्राइवेट अस्पताल धन उगाही का केंद्र बन गये हैं। इस बात से शायद ही कोई सहमत नहीं होगा। निजी अस्पताल जाने का मतलब है हजारों रुपये का खर्च। किसी भी बीमारी के इलाज पर होनेवाले खर्च को लेकर निजी अस्पतालों के रवैये पर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। लेकिन अब तक कोई ऐसा तंत्र नहीं बनाया जा सका है, जिसके तहत बीमारी, इलाज और उस पर होनेवाले खर्च को लेकर कोई नियम-कायदा तय हो। नियम बनाना और उसका पालन कराना भी आसान नहीं है। यह कोरोना काल में लोग देख चुके हैं। कोरोना काल ने देश की स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोल दी है। कोरोना काल में जहां एक ओर अनेक डॉक्टरों ने कई तरह के खतरे उठा कर अपने कर्तव्यों का निर्वहन किया, वहीं दूसरी ओर ज्यादातर निजी अस्पतालों का जोर आर्थिक लाभ प्राप्त करने पर ही रहा था। सरकार को इसका जवाब तलाश करने की जरूरत है। इस दिशा में कदम बढ़ाने की जरूरत है। जानकारों की मानें तो इसका एक ही जवाब हो सकता है, वह है सरकारी अस्पतालों में बेहतर व्यवस्था। सरकारी अस्पतालों में भी पेइंग वार्ड की व्यवस्था के साथ बेहतर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध करायी जाये। गरीबों के इलाज के साथ इस दिशा में भी सोचने की जरूरत है। इससे कम से कम लोग निजी अस्पतालों में लुटने से बच सकें। निजी अस्पतालों की लूट, निजी अस्पताल पर पाबंदियां, सरकारी अस्पतालों की स्थिति और सुधार पर आजाद सिपाही के राजनीतिक संपादक प्रशांत झा की विस्तृत रिपोर्ट।
हाइकोर्ट ने दो दिन पहले निजी अस्पताल पर टिप्पणी की है। इसके बारे में खबरें भी लगातार आती रहती हैं। एक गरीब व्यक्ति अपनी या अपने किसी परिजन की बीमारी से जूझते हुए दाने-दाने को मोहताज हो जाता है। निजी अस्पताल में किस तरह से पैसे बनाये जाते हैं। किस तरह से पैसे के लिए शव तक नहीं दिये जाते हैं। बगैर जरूरत की तरह-तरह की जांच और आॅपरेशन तक कर दिये जाते हैं। इस पर कुछ माह पहले अहमदाबाद स्थित भारतीय प्रबंधन संस्थान की ओर से एक सर्वे किया गया था। इसमें निजी अस्पताल के क्रियाकलापों के एक छोटे से हिस्से को शामिल किया गया था। सर्वे में कहा गया है कि निजी अस्पतालों में गर्भवती स्त्रियों का प्रसव आमतौर पर आॅपरेशन के जरिये ही कराया जाता है। इसके लिए अस्पताल प्रबंधन और डॉक्टर कई तरह से मरीज के रिश्तेदार को समझाते हैं। आॅपरेशन को जरूरी बताते हैं, जबकि कई बार ऐसा देखा गया है कि बगैर आॅपरेशन के भी बच्चा हो सकता था। यहां तक कि आॅपरेशन के लिए जो कारण बताये गये, वह समस्या मरीज के साथ थी ही नहीं। दरअसल, जितना आॅपरेशन होगा, उतनी कमाई होगी। सर्वे में यह भी कहा गया कि निजी अस्पतालों में लाखों की तादाद में प्रसव के लिए आॅपरेशन का सहारा लिया गया, जिससे बचा जा सकता था। यह सर्वे छोटा और एक नमूना भर है, जो निजी अस्पतालों की असलियत को उजागर करता है। निजी अस्पताल किस तरह से कमाई के लिए दोहन का अड्डा हंै, इस बात की तसदीक करता है।
सरकारी अस्पतालों की स्थिति भयावह
भारत में डॉक्टरों की उपलब्धता की स्थिति वियतनाम और अल्जीरिया जैसे देशों से भी बदतर है। देश में इस समय लगभग साढ़े सात लाख सक्रिय डॉक्टर हैं। डॉक्टरों की कमी के कारण गरीब लोगों को स्वास्थ्य सुविधाएं मिलने में देरी होती है। यह स्थिति झारखंड की भी है। यहां भी डॉक्टरों, नर्सों और पारा मेडिकल स्टाफ की घोर कमी है। पिछले दिनों अमेरिका के सेंटर फॉर डिजीज डाइनामिक्स, इकोनॉमिक्स एंड पॉलिसी द्वारा जारी एक रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत में लगभग छह लाख डॉक्टरों और बीस लाख नर्सों की कमी है। भारत में 10 हजार 189 लोगों पर एक सरकारी डॉक्टर है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने एक हजार लोगों पर एक डॉक्टर और 483 लोगों पर एक नर्स की सिफारिश की है। इसी तरह इंफ्रास्ट्रक्चर की घोर कमी है। अस्पताल भवन, जांच की सुविधा, अस्पताल के लिए जरूरी उपकरण आदि जरुरत से आधे भी उपलब्ध नहीं हैं।
1000 में 29 लोग संक्रमण के कारण भर्ती होते हैं
एक अन्य सर्वे में यह बात सामने आयी है कि देश में सबसे ज्यादा लोग अभी इंफेक्शन यानी संक्रमण से बीमार हो रहे हैं। यह बात सिर्फ ठंड में होनेवाले सर्दी-जुकाम को लेकर नहीं कही जा रही। रिपोर्ट के अनुुसार देश में 1000 में से 29 लोग हर साल सिर्फ संक्रमण से होनेवाली बीमारियों के इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती होते हैं। इनमें पुरुषों से ज्यादा महिलाएं होती हैं। विभिन्न संक्रमणों की चपेट में आनेवालों का हिस्सा ग्रामीण और शहरी इलाकों में लगभग एक सा है। हालांकि शहरी क्षेत्र के लोगों को ग्रामीणों के मुकाबले ज्यादा बीमार होने की आशंका रहती है। सर्वे के समय शहरों के 9.1 फीसदी और गांवों के 6.8 फीसदी लोग बीमार पाये गये।
स्वास्थ्य सेवा पर खर्च:
गांव हो या शहर स्वास्थ्य सेवा का हाल बेहाल है। एक सर्वे रिपोर्ट में यह भी बात सामने आयी है कि सरकारी व्यवस्था से सात गुना अधिक खर्च होने के बाद भी लोग निजी अस्पतालों को प्राथमिकता देते हैं। सर्वे बताता है कि हेल्थ आज भी हमारे यहां एक बड़ी सामाजिक-आर्थिक समस्या है। एक गरीब व्यक्ति अपनी या अपने किसी परिजन की बीमारी से जूझते हुए दाने-दाने को मोहताज हो जाता है। एक अध्ययन के मुताबिक एक साल में देश के करीब साढ़े पांच करोड़ लोग स्वास्थ्य पर भारी खर्च की वजह से आर्थिक तंगी के शिकार हो गये। 3 करोड़ 80 लाख लोग दवाइयों का खर्च उठाते-उठाते गरीबी रेखा के नीचे पहुंच गये।
निजी अस्पतालों पर अंकुश आसान नहीं
सरकारी और निजी अस्पताल में अंतर है, इस बात को नकारा नहीं जा सकता है। निजी अस्पताल साफ-सफाई, सुविधा, डॉक्टर आदि मुहैया कराने में सक्षम हैं। वहीं सरकारी अस्पताल में कमियां हैं। गंदगी, डाक्टरों, नर्सों, पारा मेडिकल स्टाफ की कमी। इंफ्रास्ट्रक्चर और उपकरणों की कमी। सरकारी अस्पताल कई बीमारियों का इलाज करने में सक्षम नहीं हैं। इस वजह से लोगों को प्राइवेट अस्पतालों की शरण लेनी पड़ती है, जहां उन्हें कड़ी चपत लगती है। जानकारों का कहना है कि निजी अस्पतालों पर पाबंदियां नहीं लगायी सकती हैं। यह कोरोना संकट के समय निजी अस्पतालों पर तरह-तरह से पाबंदियां लगाने की कोशिश में देखा जा चुका है। बेड, आॅक्सीजन, आइसीयू, वेंटीलेटर समेत कई चीजों की दर तय की गयी। यहां तक कि निजी अस्पतालों में होनेवाली समस्या और वहां की धांधली को रोकने के लिए अधिकारी नियुक्त किये गये। इसके बाद भी शायद ही कोई ऐसा दिन हो, जिस दिन निजी अस्पतालों की धांधली और पैसे वसूली की बात सामने नहीं आयी। यह इस बात को उजागर करता है कि तमाम कवायदों के बाद भी निजी अस्पतालों पर अंकुश लगाना या कायदे-कानून के तहत उनको बांधना आसान नहीं है। इसलिए सरकार को अपने इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करना होगा।
इच्छाशक्ति और पहल की है जरूरत
पूरा देश, लोगों की आर्थिक स्थिति में एक-दो नहीं, तीन-चार श्रेणियों में बंटा है। सरकार को इसी के अनुसार सोचना होगा। सरकार को अपने अस्पताल को भी दो श्रेणियों में बांटना चाहिए। एक गरीबों के लिए और दूसरा वैसे लोगों के लिए जो थोड़ा-बहुत खर्च करने की स्थिति में हैं। सरकार गरीबों के लिए जिस तरह से मुफ्त इलाज व्यवस्था चला रही है, उसमें सुधार करते हुए चलाये। साथ ही पेइंग वार्ड को बड़ी संख्या में बढ़ाये। निजी अस्पतालों की तरह हर सुविधा मुहैया करायी जाये। जरूरत हो तो जिस तरह नर्सिंग होम में बाहर से डाक्टरों को बुलाया जाता है, वैसे ही वहां भी बुलाने की सुविधा हो। इन सब के लिए पैसे चार्ज किये जायें। इससे कम से कम एक फायदा तो होगा ही कि लोगों को सरकारी अस्पताल में ही बेहतर इलाज मिल सकेगा और दूसरा निजी अस्पतालों की तरह लोग लूटने से बच जायेंगे। जिस तरह सर्वे में आया कि पांच करोड़ लोग स्वास्थ्य पर भारी खर्च की वजह से आर्थिक तंगी के शिकार हो गये, यह तो नहीं होगा। यह सब संभव है, बस जरूरत है सोच बदलने और इच्छाशक्ति के साथ पहल करने की।