ज्वलंत मुद्दा
प्रशांत झा
इन दिनों पेट्रोल-डीजल के दाम आसमान छू रहे हैं। जनता त्राहिमाम कर रही है। पेट्रोल-डीजल के मूल्य बढ़ने का असर राशन, सब्जी, दूध समेत सभी तरह की खाद्य सामग्री से लेकर हर सामान पर पड़ता है। यह दिख भी रहा है। महंगाई अपने चरम पर है। राजनेता एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप कर रहे हैं। पेट्रोल-डीजल पर केंद्र और प्रदेश के राजनेता वालीबॉल खेल रहे। भाजपा नीत केंद्र सरकार पर विपक्ष प्रहार कर रहा और दर कम करने की मांग कर रहा। वहीं जिन राज्यों में भाजपा की सरकार नहीं है, वहां विपक्षी राज्य सरकार को दर कम करने के लिए वैट घटाने की बात कर रहे हैं।
जनता वालीबॉल की गेंद बन कर थपेड़े सह रही है। वहीं, केंद्र और राज्य सरकार दोनों पेट्रोल-डीजल पर लाभ कमा रही है। पेट्रोल और डीजल का वास्तविक मूल्य 25 से 29 रुपये के बीच है। लगभग 37 पैसे आयात और पेट्रोल पंप पर पहुंचाने का खर्च आता है। सरकार द्वारा लगायी गयी एक्साइज ड्यूटी लगभग 33 रुपये है। राज्यों का वैट और अन्य टैक्स 29 रुपये के लगभग है। डीलर का कमीशन लगभग चार रुपये है। अगर देखा जाये तो पेट्रोल-डीजल पर केंद्र और राज्य सरकार के टैक्स, एक्साइज ड्यूटी, डीलर का कमीशन सब मिला कर लगभग 70 रुपये हो जाता है। यही कारण है कि 30 रुपये का पेट्रोल जनता तक लगभग 100 रुपये में पहुंच रहा। इससे केंद्र और राज्य सरकार दोनों को लाखों रुपये प्राप्त हो रहे।
सवाल यह है कि आखिर जनता किसकी है? केंद्र या राज्य सरकार की? अगर देखा जाय तो केंद्र में सरकार बनाने के लिए जनता वोट देती है। जनप्रतिनिधि संसद में पहुंचते हैं। वही जनता राज्य में भी सरकार बनाने के लिये वोट देती है। जनप्रतिनिधि विधानसभा पहुंचते हैं। केंद्र और राज्य में सरकार किसी की हो, जनता कम से कम वालीबॉल की गेंद तो बनना नहीं ही चाहती। वह यह तो नहीं ही चाहती की केंद्र और राज्य सरकार जनता को आपस में बांट ले और ये तेरी जिम्मेदारी, ये मेरी जिम्मेदारी सुनती और सहती रहे। जनता तो दोनों जगहों पर नेता तो इसी उम्मीद में चुनती है कि वह जनहित में कदम उठायेगा और जनता को सहूलियत मिलेगी।