गढ़वा। वे उड़ना चाहते थे, उन्मुक्त विचरण करना चाहते थे, पर उनके पंख जकड़ दिये गये थे। वे आजाद होना चाहते थे, पर कैद थे। उन्होंने प्रयास नहीं छोड़ा। एक दिन मौका हाथ लगा और वे पिंजड़ा तोड़ कर भाग निकले। अब वे खुले आकाश में उड़ेंगे। अब वे भी अपनी खुली आंखों से दुनिया देखेंगें। यह कहानी है, भाई-बहन की, जो नक्सलियों की कैद से मुक्त हो गये हैं। कई सालों तक वे नक्सलियों के चंगुल में फड़फड़ा रहे थे। आज आजाद होकर गढ़वा पुलिस के प्रयास से वे सुकून की जिंदगी गुजार रहे हैं।
कई साल पहले घर से उठा ले गये थे नक्सली
कई साल पहले नक्सली दोनों भाई बहन को घर से उठाकर ले गये थे। उनके साथ साथ कई और बच्चों को ले जाया गया था। सभी को बूढ़ा पहाड़ पर रखा गया था, कुछ माह पहले और बच्चे भाग निकले, लेकिन यही भाई-बहन फंसे रह गये। उन्हें जिल्लत भरी जिंदगी गुजारनी पड़ रही थी। उनका बचपन बदरंग हो गया। पर अब उनकी बाकी जिंदगी में पुलिस प्रशासन रंग भर रहा है।
बच्ची की आंखें कह रही जुल्म की कहानी
उसकी बहन खामोश रहती है, पर उसकी आंखें कष्ट की दासतां बताती हैं। वह भी भाई के साथ नक्सलियों के कब्जे से भाग निकली है और आज गढ़वा पुलिस की संरक्षण में नयी जिंदगी शुरू करने का ख़्वाब संजो रही है। बूढ़ा पहाड़ का नाम सुनते ही वह शरीर को समेटने लगती है, जो यह बताने के लिए काफी है कि नक्सलियों के चंगुल में पहाड़ पर उसे काफी पीड़ादायक समय गुजारना पड़ा। बस इतना ही कहती है कि हर वो काम कराया जाता था जो उसकी उम्र में संभव नहीं था।
नक्सलियों के पास अब कोई विकल्प नहीं: नेहा
गढ़वा उपायुक्त डॉ नेहा अरोड़ा कहती हैं कि नक्सलियों की कैद से भाग निकल कर दोनों बच्चों ने उन सभी को एक राह दिखायी है, जो आज मुख्य रास्ते से भटके हुए हैं। अब मुख्य राह का हमराह बनना ही नक्सलियों के पास एक विकल्प है।
हंसना भूल गयी है मासूम बच्ची: शिवानी
गढ़वा एसपी शिवानी तिवारी कहती हैं कि भाई बहन को संरक्षण देते हुए उनकी जिंदगी को संवारने के लिए हमने काम शुरू कर दिया है। भाई का स्कूल में नाम लिखा दिया गया है। जबकि उसकी बहन के मन में घर कर चुके डर को निकालने का प्रयास जारी है। उसे खुश रखने का प्रयास किया जा रहा है, क्योंकि वह तो हंसना ही भूल गयी है।