रांची। हाल के दिनों में झारखंड में कई घटनाएं घटी हैं, जो यह सोचने पर विवश कर रही हैं कि आखिर हमारे झारखंड को क्या हो गया है। आखिर कौन झारखंड की अमन-चैन वाली फिजा में जहर घोलने की साजिश रच रहा है। कौन है, जो झारखंड को देश के फलक पर बदनाम करना चाहता है। बीते दिनों की कुछ घटनाओं पर अगर आप गौर करेंगे, तो पायेंगे कि झारखंड को अशांत या बदनाम करने की गहरी साजिश रची जा रही है।
कार्रवाई होते ही उठने लगती है लोकतंत्र की हत्या की बात : एक तरफ प्रतिबंध के बावजूद खुलेआम गाय काटी जा रही है। जब पुलिस पहुंचती है, तो उसे विरोध का दंश झेलना पड़ता है। पाकिस्तान का झंडा खुलेआम फहराया जा रहा है। वह भी लाउडस्पीकर पर एनाउंसमेंट के साथ। कहीं धार्मिक स्थल से हिंदुस्तान मुर्र्दाबाद के नारे लग रहे हैं, तो कहीं खुलेआम पाकिस्तान जिंदाबाद के। और तो और राजधानी रांची से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या की साजिश रचने के तार जुड़ने की राष्टÑीय खबर भी आने लगी है। ऊपरवाले का शुक्र है कि अब तक ये साजिश रचनेवाले अपने मंसूबे में कामयाब नहीं हो पाये हैं। विडंबना तो यह है कि जब इनके खिलाफ पुलिस सक्रिय होती है, तो देश के नामी गिरामी सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश, मेधा पाटकर, प्रशांत भूषण और न जाने कौन-कौन रांची में धमक जाते हैं। राजभवन के सामने टेंट तंबू गाड़ दिया जाता है। प्रेस कांफ्रेंस होने लगती है। देश स्तर पर यह बताने की कोशिश होती है कि झारखंड में लोकतंत्र का गला घोंटा जा रहा है। लोकतंत्र का चीरहरण हो रहा है। कोई खुलेआम गाय काटे और पुलिस कार्रवाई करे, तो लोकतंत्र की हत्या। कोई धार्मिक स्थल से लाउडस्पीकर पर चिल्ला-चिल्ला कर हिंदुस्तान मुर्दाबाद के नारे लगाये और पुलिस कार्रवाई करे, तो लोकतंत्र की हत्या। कोई खुलेआम पाकिस्तान का झंडा फहराये और पुलिस रोकने जाये, तो लोकतंत्र की हत्या। कोई पत्थलगड़ी के नाम पर क्षेत्र विशेष में आम लोगों के प्रवेश पर रोक लगा दे और उनके खिलाफ पुलिस कार्रवाई करे, तो लोकतंत्र की हत्या। कोई खुलेआम अफीम की खेती करे और पुलिस उसे नष्ट करे, तो गरीबों को उजाड़ने का आरोप। कोई मिशनरी संस्था गरीबों की कोख का खुलेआम सौदा करे और उस पर कार्रवाई हो, तो लोकतंत्र की हत्या। कोई स्कूल अपने यहां बच्चियों को जागरूकता फैलाने के लिए बुलाये और बलात्कारियों को बुला कर उन्हें सौंप दे और पुलिस कार्रवाई कर दे तो लोकतंत्र की हत्या। कोई खुलेआम कानून अपने हाथ में ले ले और पुलिस कार्रवाई करे तो असहिष्णुता।
यानी झारखंड में लोकतंत्र की हत्या और अहिष्णुता जैसे शब्दों को मानो स्वामी अग्निवेश, मेधा पाटकर, प्रशांत भूषण जैसे कुछ लोगों ने अपना तकिया कलाम बना लिया है। ऐसे लोगों की हां में हां मिलाने के लिए झारखंड में विपक्ष के कुछ वैसे नेता भी शामिल हो गये हैं, जिनसे झारखंड की सवा तीन करोड़ जनता को यह उम्मीद है कि वे झारखंड को सही राह दिखाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायेंगे। इन्हीं नेताओं की टोली में शामिल हो गये हैं झामुमो, झाविमो, कांग्रेस और कुछ राजद और वाम दलों के नेता। लोग इनकी देशभक्ति या झारखंड हित पर सवाल नहीं खड़ा कर रहे, बल्कि इनसे जानना चाहते हैं कि आखिर ये नेता उस वक्त कुछ क्यों नहीं बोलते, जब झारखंड के किसी कोने में पाकिस्तान जिंदाबाद का नारा लगाया जाने लगता है। ये लोग साहेबगंज और पाकुड़ में जाकर लोगों को क्यों नहीं समझाते, जहां पाकिस्तान का झंडा फहरा दिया जाता है। ये लोग उन इलाकों में जाकर क्यों नहीं समझाते कि भैया गाय पर प्रतिबंध है, उन्हें मत काटो। अब तो बात और खतरनाक मोड़ पर पहुंच गयी है। इधर झारखंड की स्थिति क्या हो गयी है, यह मंगलवार को महाराष्टÑ पुलिस की कार्रवाई से स्पष्ट हो जाती है। महाराष्टÑ पुलिस ने रांची के नामकुम में स्टेन स्वामी के घर छापेमारी का जो कारण बताया, वह हमें स्तब्ध कर देता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या की साजिश का तार रांची से जुड़ना बहुत बड़ा खतरनाक संकेत है। हमें चिंता तब होने लगती है, जब जागरूकता फैलानी गयी बच्चियों के साथ गैंगरेप होता है और समाज की ये नामचीन हस्तियां एक बार भी उसकी भर्त्सना नहीं करतीं। पत्थलगड़ी और अफीम की खेती की आड़ में देशतोड़क शक्तियां समाज में जहर घोलती हैं और ये हमारे कर्णधार एक शब्द भी नहीं बोलते। पत्थलगड़ी की आड़ में देशतोड़कों ने सीधे-सीधे हमारे संविधान की हत्या की। उसकी गलत व्याख्या कर समाज में भ्रम फैलाया, लेकिन समाज के इन जागरूक लोगों ने एक बार भी यह नहीं कहा कि पत्थलगड़ी की आड़ में संविधान की हत्या क्यों की जा रही है। संविधान की प्रतियां क्यों फाड़ी जा रही हैं। एक बार भी इन लोगों ने खूंटी जाकर यह संदेश देने की कोशिश नहीं की कि अफीम की खेती मत करो, इससे पूरा परिवार बर्बाद हो जायेगा। आखिर ये लोग निर्मल हृदय और उस जैसी तमाम मिशनरी संस्थाओं में जाकर, यह क्यों नहीं कहा कि गरीबों की कोख का सौदा मत करो। आखिर ये इन संस्थाओं के संरक्षक इसाई मिशनरियों से अर्ज क्यों नहीं करते कि सेवा के नाम पर बच्चों का सौदा नहीं होना चाहिए। इन्हें तो हर वक्त वोट की राजनीति ही नजर आती है। यह बात समझ कर भी ये क्यों अंजान बन जाते हैं कि पहले देश है, फिर राजनीति। देशतोड़क शक्तियां जब सक्रिय होती हैं, उस वक्त भी इन नेताओं को आगे आकर पहल करनी चाहिए। लेकिन ऐसा न करके उस वक्त राजनीतिक दल अपने-अपने सियासी नफे-नुकसान के हिसाब से अपनी राजनीति चमकाने और गर्माने में लग जाते हैं। सवाल है कि हर चीज को राजनीति के चश्मे से देखा जाना कहां तक उचित है। वैसे भी देश सबसे बड़ा है। देशतोड़कों से बड़ा दुश्मन कोई नहीं होता।