40 सीटों की मांग दूसरे दलों को मंजूर नहीं, अब वामपंथियों ने भी बनायी दूरी
कांग्रेस को औकात बताने के मूड में वामदल
बीते मंगलवार को भाकपा नेता भुवनेश्वर मेहता ने घोषणा की कि वामदल झामुमो के साथ मिलकर झारखंड में विधानसभा चुनाव लड़ेगा। इतना ही नहीं प्रेस कांफ्रेंस कर उन्होंने कहा कि वे हेमंत सोरेन के नेतृत्व में चुनाव लड़ने को तैयार हैं। तमाम विपक्षी दल हेमंत सोरेन के साथ जायेंगे। कांग्रेस को आना हो तो आये या न आये, फर्क नहीं पड़ता। यह घोषणा कर उन्होंने लगभग सभी विपक्षी दलों को मैसेज दे दिया कि अब कांग्रेस को पायलट सीट तो क्या, वे साथ लेकर भी चलने को तैयार नहीं हैं। दरअसल, वामदल अब भी लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस द्वारा दी गयी उस चोट से उबर नहीं सका है। यदि लोकसभा चुनाव पर गौर करें, तो याद होगा कि झामुमो ने हमेशा ही वकालत की कि वामदलों को साथ लेना चाहिए। वामदलों को कम से कम एक सीट तो दी ही जानी चाहिए। पर कांग्रेस ने स्पष्ट नकार दिया। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डॉ अजय कुमार ने साफ कहा कि वामदल साथ रहें न रहें फर्क नहीं पड़ता। यदि उन्हें साथ रहना है, तो रहें पर सीट नहीं दी जा सकती।
पहले तो सबको यही लगा कि डॉ अजय पार्टी की नीतियों को लेकर बोल रहे हैं, क्योंकि पश्चिम बंगाल में भी कांग्रेस ने वामदलों के साथ समझौता नहीं किया था। पर बाद में बात खुली कि मामला कुछ और ही था। दरअसल डॉ अजय कुमार हजारीबाग से गोपाल साहू को टिकट दिलाने की फिराक में थे और झारखंड प्रदेश कांग्रेस प्रभारी आरपीएन सिंह के साथ मिलकर उन्हें टिकट दिलवाने में सफल भी रहे। इसीलिए वह नहीं चाहते थे कि वामदलों के साथ समझौता हो। क्योंकि वामदल सिर्फ और सिर्फ एक सीट हजारीबाग की मांग पर ही अड़े थे। इस प्रकार डॉ अजय अपनी चाल में तो कामयाब हो गये पर गोपाल साहू को जीता नहीं सके। गोपाल साहू इतनी बुरी तरह हारे कि इसके लिए चारो ओर डॉ अजय की थू..थू होने लगी। हजारीबाग से वामदलों के उम्मीदवार भुवनेश्वर मेहता भी कांग्रेस की इस चालाकी और मक्कारी से काफी निराश रहे। इसी के मद्देनजर अब उन्होंने अपनी चाल चल दी है।
झामुमो, वामदल, झाविमो और राजद का फार्मूला हो रहा सेट!
कांग्रेस और वामदलों की इस लड़ाई में अब झामुमो भी अपनी चाल साधने में जुटा है। ऐसे में झामुमो, राजद, झाविमो और कांग्रेस सभी का साथ चलना मुश्किल दिख रहा है। झामुमो इस आकलन में जुटा है कि कांग्रेस उसकी बेहतर साथी होगी या अन्य दलों का साथ उसकी नैया पार लगायेगा। झामुमो की कोशिश है कि विधानसभा चुनाव में 30 के आंकड़े को पार करना। इसके लिए उसे हर हाल में झाविमो के साथ की जरूरत होगी, क्योंकि झाविमो की मदद से ही वह संथाल और कोल्हान छोड़ राज्य के अन्य इलाकों में बढ़त बना सकता है। संथाल परगना में भी अब पहले जैसे हालात नहीं हैं। भाजपा ने अपनी स्थिति में काफी सुधार किया है। इस बदले हालात में झामुमो की अकेले की राह टेढ़ी खीर से कम नहीं है। वहीं, झाविमो, राजद और वामदल कांग्रेस से दूरी बना रहे हैं। समय-समय पर कांग्रेस की पलटी मारने की आदत से भी सभी वाकिफ हो चुके हैं। वहीं, कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष डॉ अजय कुमार ने भी 40 सीटों की मांग कर दूसरे दलों को मुखर बना दिया है। सभी जान रहे हैं कि कांग्रेस अगर 40 सीटों पर लड़ेगी, तो उनके लिए बचेगा ही क्या। झामुमो भी 41 सीटों पर दावा कर रहा है। यह प्रस्ताव तो पार्टी की कार्यकारिणी की बैठक में ही पारित करा लिया गया था। तो राज्य में झामुमो की स्थिति को देखते हुए अन्य विपक्षी दल भी झामुमो के साथ ही जाना पसंद करेंगे।
इसलिए अब सभी कांग्रेस से किनारा करने लगे हैं। अब झामुमो यदि उनकी बातें सुनता है, तो वह भी स्वत: ही कांग्रेस से दूर होता जायेगा और कांग्रेस अलग-थलग पड़ सकती है।
कांग्रेस का हाल बेहाल
झारखंड में कांग्रेस के इस हाल पर अंदर-बाहर सवाल खड़े हो रहे हैं। लोकसभा चुनावों के नतीजे ने झारखंड में कांग्रेस के अंदर-बाहर की स्थिति काफी कमजोर कर दी है। हालांकि लोकसभा चुनाव में पार्टी को एक सीट मिली है, पर उस जीत का हकदार कांग्रेस से कहीं ज्यादा झामुमो को ही लोग मान रहे हैं। झारखंड कांग्रेस के हालात सुधरने की बजाय और बिगड़ते ही जा रहे हैं। अब सवाल उठ रहे हैं कि क्या पार्टी विधानसभा चुनाव भी जैसे-तैसे हाल में लड़ेगी। कांग्रेस का यह हाल उस दौर में है जब बीजेपी-आजसू ने लोकसभा चुनाव में राज्य की 14 में से 12 सीटों पर जीत दर्ज की है और 63 विधानसभा क्षेत्रों में उन्होंने विपक्षी दलों से बढ़त ली है। बीजेपी को मिले वोट ने कांग्रेस समेत सभी विपक्षी दलों को सकते में डाल रखा है। लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद झारखंड में कांग्रेस की गतिविधियों पर गौर करें, तो बिन पतवार की नाव की तरह वह दिख रही है। मीडिया कमेटी पहले की तरह सक्रिय जरूर है। कांग्रेस के प्रवक्ता बीच-बीच में प्रदेश अध्यक्ष डॉ अजय कुमार का निर्देश व्हाट्सएप पर आगे-पीछे जरूर करते रहे हैं। पार्टी के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं कि मीडिया कमेटी ही विधानसभा चुनाव लड़ेगी। जमीन पर नहीं पार्टी दफ्तर में बैठकर और बयानों के जरिये। जबकि जनता यह देखती और परखती है कि किसी भी पार्टी का नजरिया क्या है, कितनी एका है। नेता कितने संघर्षशील हैं और जमीनी पैठ कितनी है। कांग्रेस शायद इस बात से बेफिक्र है कि वक्त कम है और बीजेपी की चुनावी तैयारियां रणनीति के साथ सिर चढ़ती जा रही हैं। मामले में कांग्रेस विधायकों की राय भी कुछ अलग नहीं है।
विधायक इरफान अंसारी मौजूदा हालात पर कहते हैं, हमें अब कुछ नहीं कहना। अपना क्षेत्र संभाल रहे हैं। सच बोलने से पार्टी में लोगों को तीता लगता है, तो चुप ही रहना अच्छा है।