रांंची: राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था को खोखला करने में निजी एजेंसियां भी पीछे नहीं हैं। स्वास्थ्य विभाग में जब के विद्यासागर को जिम्मेदारी मिली, तो मेडाल पर कृपा बरस गयी। उन्होंने रिम्स में मेडाल लैब को लाकर यहां अनोखी शुरुआत कर दी। सरकारी अस्पताल में डेरा जमाकर निजी जांच एजेंसी रिम्स को खोखला तो कर ही रही है, साथ ही गरीबों की जेब पर भी डाका डाल रही है। यहीं नहीं, विशेषज्ञ नहीं होने और महंगी जांच को लेकर रिम्स प्रबंधन के पास मेडाल लैब की शिकायतों की बाढ़ सी आ गयी है, लेकिन उस पर हाथ डाले तो कौन!

मेडाल के कारण पीजी की सीटों पर खतरा : मेडाल लैब के कारण रिम्स की पैथोलॉजी और माइक्रोबॉयोलाजी की पीजी सीटों पर भी खतरा है। एमसीआइ कभी भी इसकी सीटें घटा सकती है। पहले भी पीजी की एक सीट कम हो चुकी है। विशेषज्ञ बताते हैं कि मेडिकल कॉलेजों में पीजी की सीटों का निर्धारण उक्त कॉलेज के लैब में होनेवाली जांच की संख्या के आधार पर होता है। इसे छात्रों के प्रैक्टिकल वर्क के रूप में देखा जाता है। इसके लिए वहां होनेवाली जांच का डाटा तैयार किया जाता है और देखा जाता है कि एक छात्र ने कितने जांच (प्रैक्टिकल) किये।

सरकारी अस्पताल में निजी लैब लूट रहा गरीबों को

छात्रों को नहीं मिल रहे प्रैक्टिकल के मौके : मुख्य परेशानी यहीं से शुरू हुई। रिम्स में मेडाल की स्थापना के बाद से अस्पताल के अपने सेंट्रल पैथोलॉजी लैब और माइक्रोबॉयोलॉजी लैब में जांच की संख्या काफी कम हो गयी है। आम तौर पर इन दोनों लैबों में जब मरीज जांच के लिए जाता है, तो कहा जाता है कि जांच में दो दिन लगेंगे, जबकि मेडाल लैब में तुरंत रिपोर्ट मिल जाती है। डॉक्टर भी मरीजों को वहीं से जांच कराकर लाने को कहते हैं।
इस कारण रिम्स के अपने दोनों लैब में जांच की संख्या पहले के मुकाबले 25 फीसदी से भी कम रह गयी है।

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