विधानसभा के पिछले चुनाव में 30 सीटों पर दूसरे नंबर पर रही थी पार्टी

चार दिन पहले जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रांची आये थे, तब भाजपा के बहुत से नेताओं ने उनके सामने अपना चेहरा चमकाने की कोशिश की थी। दूसरे दलों के कई नेता भी अवसर को हाथ से जाने नहीं देना चाहते थे और कई इस उद्देश्य में सफल भी रहे। लेकिन अब यह बात साफ हो गयी है कि भाजपा इस विधानसभा चुनाव में कोई रिस्क लेने के लिए तैयार नहीं है। पीएम की यात्रा के फौरन बाद प्रदेश चुनाव प्रभारी ओम प्रकाश माथुर ने साफ कर दिया कि इस बार पार्टी उन उम्मीदवारों को ही टिकट देगी, जो चुनाव जीत सकते हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि यह बात दूसरे दलों से भाजपा में आनेवाले नेताओं पर भी लागू होती है। उनके कहने का मतलब साफ था कि भाजपा इस बार किसी को भी टिकट की गारंटी नहीं दे सकती है।
नयी व्यवस्था में सब कुछ नया
भाजपा में अमित शाह और नरेंद्र मोदी का दौर शुरू होेने के बाद से ही साफ हो गया कि पार्टी में सब कुछ नये तरीके से होगा। लोकसभा के पिछले दो चुनावों में इस नये तरीके से भाजपा के लोग परिचित भी हो चुके हैं। भाजपा में अब थोथी दलीलों से काम नहीं चलता। यहां सब कुछ सामने रखना होता है। यहां तक कि पार्टी के प्रत्येक नेता की गतिविधि की दैनिक जानकारी भी पार्टी मुख्यालय तक देनी पड़ती है। सांसदों और विधायकों की तो बात ही और है। टिकट के हरेक दावेदार की पूरी कुंडली पहले ही खंगाली जाती है और एक मानक तय कर दिया जाता है। इस मानक पर खरा नहीं उतरनेवालों के नाम पर कोई विचार नहीं किया जाता। जैसे लोकसभा के पिछले चुनाव में 75 वर्ष की आयु पूरी कर चुके नेताओं को टिकट नहीं देने का फैसला किया गया। इस मानक पर लालकृष्ण आडवाणी, डॉ मुरली मनोहर जोशी, कड़िया मुंडा और सुमित्रा महाजन जैसी शख्सियतें भी खरी नहीं उतरीं, तो उनका टिकट भी काट दिया गया। यह भाजपा में ही संभव है, क्योंकि यहां कमरे के अंदर चाहे जितना भी विवाद कर लें, सार्वजनिक रूप से विवाद पैदा करने की अनुमति नहीं है। यह अनुशासन ही किसी संगठन या संस्था को मजबूत बनाता है।
झारखंड के लिए भी तय हुए मानक
झारखंड विधानसभा के लिए होनेवाले चुनाव में भाजपा अपने लक्ष्य के प्रति कितनी गंभीर है, यह इसी बात से साफ होता है कि उसने लोकसभा चुनाव के तत्काल बाद ही इसकी तैयारी शुरू कर दी। इतना ही नहीं, अपने हरेक विधायक की रिपोर्ट कार्ड भी पार्टी ने तैयार करायी। इसके बाद हरेक विधानसभा क्षेत्र में पार्टी ने आंतरिक सर्वे कराया और राजनीतिक परिस्थिति की रिपोर्ट तैयार करायी। इसके बाद पार्टी ने टिकट के लिए कुछ मानक तय कर दिये हैं।
इसमें पहला है, जीतने की संभावना। पार्टी उन उम्मीदवारों को ही इस बार मैदान में उतारेगी, जिनके जीतने की संभावना है। भाजपा ने ऐसे किसी भी उम्मीदवार को टिकट नहीं देने का फैसला किया है, जो पिछले चुनाव में हार गये थे। हालांकि पार्टी नेता कहते हैं कि इसमें एकाध-दो सीटों पर अपवाद हो सकता है, लेकिन अब यह लगभग तय हो चुका है।
यह फैसला लेने के पीछे पार्टी का तर्क है कि 2014 के चुनाव में मोदी लहर के बावजूद जो उम्मीदवार चुनाव नहीं जीत सके थे, वे इस बार तो किसी भी हालत में जीत नहीं सकते हैं। भाजपा इस बात का भी ध्यान रख रही है कि इस बार वह अपनी सरकार के कामकाज को लेकर जनता के बीच जा रही है और इसमें एंटी-इंकमबैंसी का खतरा भी हो सकता है।
हालांकि यह सच है कि रघुवर दास सरकार के खिलाफ विपक्ष के पास कोई मुद्दा नहीं है और जनता के बीच भी सरकार के कामकाज के प्रति कोई नाराजगी नहीं है, लेकिन भाजपा कोई खतरा मोल नहीं लेना चाहती है।
भाजपा ने तीसरा मानक विधायकों-नेताओं के कामकाज के बारे में रिपोर्ट को बनाया है। जिस विधायक या नेता का कामकाज उसके निर्वाचन क्षेत्र में ठीक नहीं है, उसे किसी हाल में टिकट नहीं दिया जायेगा। कामकाज का आकलन पार्टी द्वारा कराये गये आंतरिक सर्वे की रिपोर्ट के आधार पर किया जा रहा है।
भाजपा के लिए झारखंड विधानसभा का चुनाव एक बड़ी चुनौती है। हालांकि रघुवर दास सरकार के पिछले पांच साल के कामकाज और बिखरे विपक्ष के कारण उसका चुनावी सफर बहुत कठिन होने की संभावना नहीं के बराबर है, फिर भी पार्टी कोई भी खतरा मोल नहीं लेना चाहती। भाजपा के पास नेताओं की कमी नहीं है और वह आज स्थिति में है कि किसी को भी चुनाव मैदान में उतार सकती है। इसके बावजूद वह केवल जीतनेवाले उम्मीदवार पर ही दांव खेलने का मन बना चुकी है।

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