जुर्माना वसूलना उपलब्धि नहीं, दुर्भाग्यपूर्ण है
दो दिन पहले मीडिया की सुर्खियों में एक खबर छायी हुई थी कि दिल्ली में एक स्कूटी सवार को नये ट्रैफिक कानून तोड़ने के जुर्म में 50 हजार रुपये का जुर्माना किया गया। पिछले पांच दिन से देश के विभिन्न हिस्सों से ऐसी खबरें आ रही हैं। हर दिन शाम को मीडियाकर्मियों को यह मैसेज मिल रहा है कि उनके शहर में रिकॉर्ड जुर्माना वसूला गया। यातायात पुलिस के लिए यह उपलब्धि के रूप में लिया जाने लगा है, लेकिन क्या यह वाकई उपलब्धि है।
किसी भी सभ्य समाज में कानून का घोषित उद्देश्य लोगों के जीवन को सहज-सरल बनाना होता है। सरकार ने नया मोटर वाहन कानून लागू कर सड़क हादसों को रोकने के लिए बेहद शानदार कदम उठाया है। इस काम के लिए उसकी तारीफ होनी चाहिए। लेकिन क्या यह कानून लोगों के जीवन को सहज-सरल बना रहा है, इस पर भी विचार करने की जरूरत है।
अधिक जुर्माना उपलब्धि नहीं
अक्सर यह देखा जाता है कि जिस थाना क्षेत्र में अपराध अधिक होते हैं, वहां के थाना प्रभारी को दंडित किया जाता है। जिस स्कूल के अधिकांश बच्चे परीक्षा में फेल कर जाते हैं, वहां के शिक्षकों को अयोग्य माना जाता है। फिर जिस शहर में ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन करनेवालों से बहुत अधिक जुर्माना वसूला जाता है, वहां की यातायात पुलिस शाबासी की पात्र कैसे हो सकती है। लोगों के मन में यह सवाल उठने लगा है। जहां एक महीने में भी आपको ड्राइविंग लाइसेंस नहीं मिल सकता है, जहां अपने वाहन के रजिस्ट्रेशन के लिए लोगों को दलालों की सेवा लेनी पड़ती है, जहां बीमा कंपनियां अपने डंडे से लोगों को हांकती हैं, जहां प्रदूषण नियंत्रण सर्टिफिकेट लेने के लिए आपको अपने काम से छुट्टी लेनी पड़ती हो, वहां यदि आप चाक-चौबंद व्यवस्था का कल्पना करते हैं, तो इसे नासमझी ही कहा जा सकता है।
दोहरा मापदंड क्यों
किसी शहर में ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन के बहुत अधिक मामले यदि सामने आ रहे हैं, तो इसका दोष वहां की ट्रैफिक पुलिस पर भी आना स्वाभाविक है। यदि किसी शहर में जुर्माने की रकम अप्रत्याशित रूप से बढ़ गयी है, तो फिर व्यवस्था को यह सोचना होगा कि आखिर क्यों लोग कानून तोड़ने पर आमादा हैं। इस सवाल का जवाब डंडे की जोर पर नहीं मिल सकता। इसका निदान बातचीत और आपसी संवाद से ही संभव है। सवाल यह भी है कि किसी शहर में अपराध बढ़ने पर वहां के पुलिस कप्तान को हटा दिया जाता है, तो फिर यातायात नियमों का उल्लंघन भी तो अपराध है और यदि इस अपराध में वृद्धि होती है, तो फिर ट्रैफिक पुलिस क्यों जिम्मेदार नहीं ठहराये जा सकते।
हर समस्या का निदान डंडा नहीं हो सकता
कानून लोगों की सहूलियत-मदद के लिए बनाये जाते हैं। आज भी अधिकांश लोग कानून का पालन करना चाहते हैं। किसी भी सभ्य समाज की यह निशानी होती है। लेकिन नये ट्रैफिक कानून से तो हर किसी को डर लगने लगा है। यदि लोग कानून से डरने लगें, तो समझना चाहिए कि यह प्रभावशाली नहीं है। लोगों को इमरजेंसी के दिनों का परिवार नियोजन अभियान याद रखना चाहिए। वह अभियान देश हित में था, लेकिन उसे जिस तरीके से लागू किया गया, वह बेहद शर्मनाक और जनविरोधी था। इसलिए उसकी खिलाफत हुई। प्रशासन को याद रखना चाहिए कि हर काम डंडे के जोर पर नहीं कराया जा सकता है। इसका दूसरा उदाहरण कर्फ्यू भी हो सकता है। जब हालात बेकाबू हो जाते हैं, तो अक्सर प्रशासन को कर्फ्यू या आपातकालीन कानून लागू करना पड़ता है, लेकिन यह हमेशा के लिए नहीं होता। कुछ समय के बाद प्रशासन को इन कानूनों को हटाना ही पड़ता है। अदालतें भी इस बात पर विचार करती हैं कि कानून तोड़नेवाले की मंशा क्या थी। इसके बाद ही अपराधी को सजा दी जाती है। लेकिन नये ट्रैफिक कानून को लागू कराने के लिए क्या हो रहा है। बिना हेलमेट के आप किसी चौक-चौराहे से गुजरें, तो वहां तैनात यातायात पुलिसकर्मी आप पर ऐसे झपटेंगे, मानो आप कोई पेशेवर अपराधी हैं। आपसे किसी अपराधी की तरह सलूक होता है और आपको बीच चौराहे पर बेइज्जत किया जाता है। यहां ट्रैफिक पुलिस को यह सोचना होगा कि कानून तोड़नेवाले की मंशा क्या थी। उसका काम केवल कानून का पालन कराना नहीं, बल्कि लोगों को जागरूक करना भी है।
यह खतरनाक भी हो सकता है
प्रशासन को यह समझना होगा कि यदि वह आम लोगों की भावनाओं के प्रति संवेदनशील नहीं होगा, तो उसे प्रतिरोध का सामना करना होगा। पुलिस के प्रति लोगों का भरोसा वैसे ही हिला हुआ है। नये कानून को लागू कराने के लिए ट्रैफि पुलिस को बेहद समझदारी से काम करना होगा, वरना यह खतरनाक हो सकता है। लोग उसके खिलाफ हो सकते हैं। इससे कानून-व्यवस्था की समस्या ही पैदा होगी, जिसका असर लोगों के जनजीवन पर पड़ेगा।
क्या है विकल्प
नया ट्रैफिक कानून बहुत बढ़िया है। सड़क हादसों को रोकने के लिए यह बेहद जरूरी था। लेकिन इसे लागू करने के लिए पहले लोगों को जागरूक किये जाने की जरूरत है। लोग आदतन कानून नहीं तोड़ते, बल्कि अधिकांश मामलों में किसी मजबूरी या परिस्थितियों के कारण उन्हें ऐसा करना होता है। इसलिए नया कानून लागू करते समय उन परिस्थितियों-मानसिकता को भी ध्यान में रखना होगा। यदि लोग जुर्माना देने से मना कर देंगे, तो प्रशासन के पास उन्हें जेल भेजने का विकल्प होगा। तो क्या किसी शहर की बड़ी आबादी को जेल भेजना उचित कहा जा सकता है। इसलिए कानून को लागू करने से पहले उसके प्रति लोगों को जागरूक करना होगा।