• सामाजिक कार्य, शिक्षा और राजनीति के बीच समन्वय स्थापित करने की है क्षमता

डॉ प्रदीप वर्मा, एक ऐसा नाम, जो अपने सामाजिक कार्यों के लिए विख्यात है। उनकी वाणी में मधुरता, बोलने के दौरान शब्दों का चयन, गीता का श्लोक जुबानी, भारत की संस्कृति, इतिहास के बारे में अकूत जानकारी और राजनीतिक समझ उनको जानने-समझने की ललक को और भी बढ़ा देती है। आजाद सिपाही के विशेष संवाददाता राकेश सिंह की कलम डॉ प्रदीप वर्मा के मुंह से निकले हर शब्द को अक्षर का रूप दे रही है। आप भी जानिये, आखिर कौन हैं डॉ प्रदीप वर्मा।

प्रदीप वर्मा का जन्म कलकत्ता, अब कोलकाता में हुआ। उनकी पढाई-लिखाई भी वहीं हुई। उनके पिता उत्तरप्रदेश के आजमगढ़ जिला के शिवपुर गांव के रहनेवाले थे। पूर्वज उत्तरप्रदेश के गाजीपुर जिले के मनिहारी गांव के रहनेवाले थे। प्रदीप वर्मा का परिवार खेती बारी पर आश्रित था। जब परिवार बढ़ने लगा और महज किसानी से परिवार का भरण पोषण में दिक्कत आने लगी, तब परिवार के लोग रोजी रोटी के लिए राज्य छोड़ दूसरे राज्यों में जाकर नौकरी ढूंढ़ने लगे। उन दिनों पूर्वी उत्तरप्रदेश से कोई भी घर छोड़ता था, तब सबसे पहले दिमाग में एक ही नाम आया करता था, वह था कोलकाता। स्वाभाविक रूप से उनके पिता भी अपनी किस्मत आजमाने कोलकाता चले गये। लंबे संघर्ष के बाद उन्होंने अपने लिए बिड़ला ग्रुप में एक नौकरी खोज ली। उन्होंने अपनी पहली नौकरी को ही अंतिम दिनों तक निभाया। एक अच्छा साफ-सुथरा उनका करियर रहा। प्रदीप वर्मा का बचपन कोलकाता में ही बीता। उनकी पूरी पढ़ाई-लिखाई कोलकाता में ही हुई। उन्होंने कलकत्ता यूनिवर्सिटी से अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद पिताजी की ही तरह बिड़ला ग्रुप में एक नौकरी ढूंढ़ ली। उनका कहना है कि वह नौकरी के मामले में सौभाग्यशाली रहे, क्योंकि थोड़े ही दिनों के बाद उन्हें नौ से पांच वाली नौकरी से मुक्ति मिल गयी। बिड़ला परिवार, जो हमेशा से सामाजिक कार्यों को करने के लिए देश में अग्रणी परिवारों में से एक माना जाता है, के कुछ सामाजिक कार्यों की देखभाल की जिम्मेदारी उनके ऊपर डाल दी गयी। उसके बाद वह बिड़ला ग्रुप के सामाजिक कार्यों का कामकाज देखने लगे। इसी सिलसिले में उन्हें रांची भेजा गया। झारखंड में उन दिनों सीएसआर के तहत सेवा के कार्य, सोशल वर्क बिड़ला परिवार के द्वारा किया जाता था। उसकी देखभाल प्रदीप वर्मा करने लगे। फिलहाल टाटीसिलवे स्थित माहिलौंग के जिस परिसर में प्रदीप वर्मा अभी रहते हैं, वह अपने जमाने का टीबी इलाज का बहुत प्रसिद्ध सेंटर हुआ करता था। उसका नाम महादेवी बिड़ला टीबी सेनिटोरियम था। यह एक ऐसा संस्थान था, जहां पर देश के कई हिस्सों से लोग टीबी का इलाज करवाने आते थे। लेकिन 1986 में यहां लोकल अशांति के कारण मजदूरों और कर्मचारियों के साथ प्रबंधन के कुछ विवाद हुआ और यह संस्थान 1986 में बंद हो गया। वैसे भी टीबी के अस्पताल की उस वक्त जरूरत नहीं रह गयी थी, क्योंकि 1986 आते-आते टीबी का इलाज एक आम बीमारी जैसा हो गया था। इसका घर पर ही इलाज संभव हो गया था। जब यह संस्थान प्रदीप वर्मा को मिला था, तब यह बंद था। उसके बाद विभिन्न प्रकार के सोशल वर्क करने के साथ इस अस्पताल को पुन: चालू करने का लक्ष्य उन्हें दिया गया। साल 2000 आते-आते यहां एक सौ बेड का सामान्य अस्पताल प्रारंभ हुआ। उसके बाद 2003 से झारखंड में आदिवासी बच्चियों को नर्सिंग का प्रशिक्षण देना शुरू किया गया। प्रदीप वर्मा कहते हैं कि झारखंड की जो हमारी ट्राइबल बहनें हैं, उनके अंदर सेवा का भाव विश्व के किसी भी स्थान के लोगों से ज्यादा है। वह कहते हैं, पहले भारत में केरल की नर्सें अपनी सेवा के लिए बहुत प्रसिद्ध रही हैं, लेकिन झारखंड में उनका 30 साल का अनुभव कहता है कि झारखंड की जो बहने हैं, विशेष कर आदिवासी बहनें, उनमें सेवा-भाव कूट-कूट कर भरा है। इस संस्थान से हमारी आदिवासी बहनें उच्चस्तरीय गुणवत्तापूर्ण प्रशिक्षण प्राप्त कर निकलने लगीं। उन पर गर्व है कि आज भारत के सभी बड़े अस्पतालों में महादेवी बिड़ला नर्सिंग स्कूल से निकली हुई बहनें प्रतिष्ठा के साथ नर्स की ड्यूटी निभा रही हैं।

समय बीता। फिर उस परिसर में शिक्षण संस्थान खोलने पर विचार हुआ। योजना बनी सीबीएसइ पैटर्न पर स्कूल खोलने की। और इसी योजना के तहत सरला बिड़ला पब्लिक स्कूल की स्थापना हुई। एक बेहतरीन स्कूल खोलने के लिए जो भी संसाधन की जरूरत थी, बिड़ला परिवार ने उसे उपलब्ध कराया। 20 जनवरी 2010 को शुरू हुआ यह स्कूल आज शहर का एक प्रतिष्ठित विद्यालय बन गया है। यहां चार हजार से भी अधिक छात्र-छात्राएं शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। समय की मांग हुई कि झारखंड में एक विश्व स्तरीय विश्वविद्यालय हो। इसके बाद 2017 में सरला बिड़ला विश्वविद्यालय की स्थापना हुई। झारखंड की विधानसभा से सरला बिड़ला विश्वविद्यालय 2017 एक्ट बना। उसके तहत सरला बिड़ला विश्वविद्यालय की स्थापना की गयी। आज बहुत ही कम समय में विश्वविद्यालय ने काफी ख्याति अर्जित कर ली है। विश्वविद्यालय बनने से अब झारखंड से हर साल एक हजार से भी अधिक छात्र शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। डॉ वर्मा कहते हैं, पहले उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए छात्रों को भुवनेश्वर, बेंगलुरु और पुणे जाना पड़ता था। अब उन्हें अपने ही राज्य में बिना किसी कठिनाई के उच्च शिक्षा की सुविधा उपलब्ध हो गयी है। आप समझ सकते हैं कि अलग प्रदेश में जाकर वहां की बोली भाषा, खान-पान से एडजस्ट करना, आर्थिक रूप से अभिभावकों पर भोझ बढ़ना, इन चीजों से अब मुक्ति मिल जायेगी। एक बहुत ही विश्वस्तरीय, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सरला बिड़ला विश्वविद्यालय झारखंड में छात्रों को प्रदान कर रहा है।

इस विश्वविद्यालय में ट्रेनिंग और प्लेसमेंट का एक सेल है, जो पढ़ाई के दौरान बच्चों का व्यक्तित्व विकास और उन्हें बड़ी कंपनियों में प्लेसमेंट पाने में कोई कठिनाई नहीं आये, इसका ध्यान रखता है। अगले ही साल 700 बच्चों का एक बड़ा बैच प्लेसमेंट की ओर रुख करेगा। उसकी योजना अभी से ही बनायी जा चुकी है कि कैसे सभी 700 छात्रों का प्लेसमेंट हो जाये। बिड़ला ग्रुप खुद में देश का बहुत बड़ा औद्योगिक ग्रुप है। इसका लाभ बच्चों को प्लेसमेंट के दौरान मिलेगा, नौकरी मिलेगी।

सवाल: जो भी कार्य आरंभ करो, गंभीरता से पूर्ण करो और तब तक संतुष्ट ना हो, जब तक अपना सर्वश्रेष्ठ ना दे दो। यह शब्दों में पिरोये हुए सफलता का वह सार है, जो डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी के मुंह से निकला था। यही वह पहला सवाल था, जो मैंने डॉ प्रदीप वर्मा से पूछा। यह सवाल इसलिए भी बनता था, क्योंकि वह इस विचारधारा को अपने जीवन में हमेशा लागू करते रहे हैं। सवाल यही था कि इस वाक्य को आप अपने जीवन में कितनी गंभीरता से लेते हैं?

इस सवाल का जवाब डॉ प्रदीप वर्मा ने बहुत ही अनोखे अंदाज में दिया। कहा: देखिये मेरा अपना मानना है कि मनुष्य के रूप में जब हमें पृथ्वी पर आना हुआ और वह भी भारत जैसे देश में, तो हम दुनिया के अन्य देश के लोगों से अलग हो जाते हैं। इसे ऐसे समझिये। दुनिया के अन्य देशो में मनुष्य यानि शरीर, लेकिन भारत में जब आपका जन्म हो जाता है, तो आप केवल शरीर नहीं रहते। आप मन, बुद्धि, आत्मा और शरीर हो जाते हैं। तो आपका दायित्व दुनिया के किसी अन्य हिस्से में जन्मे मनुष्य से ज्यादा हो जाता है। क्योंकि आपके पूर्वजों ने इस मनुष्य को केवल शरीर नहीं माना, मन, बुद्धि, आत्मा के साथ शरीर मिल कर मनुष्य बन गया। तो स्वाभाविक है कि हमें अपनी संपूर्णता से, जो भी दायित्व या कार्य हमारे सामने, इच्छा या अनिच्छा से उपस्थित हुए, उनके संपादन में नियति ने मेरी भूमिका तय कर दी है। हमारे देश में मन, बुद्धि, आत्मा के सुख के बाद शरीर के सुख की कल्पना है। कोई भी कार्य पूरी तन्मयता से उसके पूर्ण होने तक लगे रहना यह हमारा चॉइस नहीं है। भारत में जन्म लेते ही इसके अलावा कोई चॉइस नहीं है। हमारे अपने सुख के लिए ही हम अपने कर्तव्यों का निर्वहन बिना किसी फल की इच्छा के करें, ऐसा गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने भी कहा है। कर्म प्रधान विश्व करी राखा, जो तस करहीं सो तस फल चाखा।

सवाल : आप सोशल वर्क भी करते हैं, बच्चों का कैसे विकास हो सके, उसके लिए सरला बिड़ला स्कूल और सरला बिड़ला यूनिवर्सिटी के माध्यम से उनका भविष्य भी संवार रहे हैं। पॉलिटिक्स में भी आपकी रुचि है, वर्तमान में आप भाजपा के प्रदेश महामंत्री भी हैं। इन तीनों में आप कैसे समन्वय स्थापित कर पाते हैं?

जवाब : मेरा मानना है कि जन सेवा, सोशल सेवा, और पोलिटिकल वर्क एक ही चीज है। केवल शब्द अलग-अलग हैं। मुझे इन कार्यों को करने के लिए कभी भी कुछ अलग से भार जैसा नहीं लगा। मैं अपना काम करते-करते पोलिटिकल और सोशल कार्यों को भी देखता हूं। इन कार्यों के लिए मुझे अलग से कोई योजना नहीं बनानी पड़ती। मेरा मानना है कि जिस विचारधारा से हम जुड़ कर अपनी राजनीतिक गतिविधियों को संपादित करते हैं, वह पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी और डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी की विचारधारा है। इस विचारधारा का प्रारंभ स्वामी रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद के समय में हुआ था। भारत के ये दो ऐसे महापुरुष हुए, जिन्होंने भारत के कल्याण के लिए भारतीय दर्शन की श्रेष्ठता को साबित किया। उन दिनों लोग हिंदू दर्शन और हिंदू होने पर भी शर्म महसूस करते थे। इन दोनों हस्तियों ने यह स्थापित किया कि न तो हिंदू दर्शन हीन है न हिंदू होना हीनता का भाव पैदा करेगा। उन्होंने कहा कि हमें गर्व होना चाहिए कि हम हिंदू हैं और हिंदू संस्कृति ही विश्व का कल्याण कर सकती है। उसके बाद 1925 में डॉ हेडगेवार और 1940 में उनकी मृत्यु के बाद गुरुजी के नाम से विख्यात माधवराव सदाशिवराव गोलवरकर ने उस विचारधारा को न सिर्फ आगे बढ़ाया, बल्कि पूरे भारत में संपूर्ण मनुष्य जाति के कल्याण की कामना लेकर, हिंदू होने का गर्व बोध और हिंदू समझ को संगठित करने के कार्य को आगे बढ़ाया। 1951 में पंडित दीनदयाल उपाध्याय और डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने इसे एक बड़े मंच पर ले जाकर प्रस्तुत किया और भारतीय जनसंघ के रूप में हमारी विचारधारा की राजनीतिक यात्रा प्रारंभ हुई। और अब यह 6 अप्रैल 1980 के बाद भारतीय जनता पार्टी के रूप में आगे बढ़ रही है। इसे अटल-आडवाणी जी ने घर-घर तक पहुंचाया। आज प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी और अमित भाई शाह के नेतृत्व में यह विचारधारा पूरे विश्व में प्रशंसा प्राप्त कर रही है। इस विचारधारा के साथ काम करना अलग से कभी मेरे साथ स्ट्रेस या भार जैसा नहीं रहा। कारण यह विचारधारा अलग से हमें कुछ करने को नहीं करती। चिरंतन काल से जो भारत का चित रहा है, जो स्वभाव रहा है और जो हमारी सामान्य गतिविधियां रही हंै, हमारी राजनीतिक गतिविधियां भी वही हैं, तो हमारे लिए अलग से कुछ करने जैसा नहीं है। इस देश में जन्म लेने के कारण एक भौगोलिक सांस्कृतिक कल्चर, जो हमारा है, उसे ही हम निभाते हुए अपनी राजनीतिक गतिविधियों का संचालन करते हैं। डॉॅ वर्मा कहते हैं कि किसी पोलिटिकल पार्टी का मेंबर या पदाधिकारी न होते हुए भी हर व्यक्ति उतना कर रहा है, जो भारतीय जनता पार्टी का कार्यकर्ता कर रहा है। हम अलग से कुछ नहीं करते। यह समाज हमारा है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय के दिया गया अंत्योदय हो या चाहे आज प्रधांनमंत्री नरेंद्र मोदी का दिया हुआ सबका साथ सबका विकास हो, विश्व कल्याण का भाव लेकर के चलनेवाला हिंदू समाज बस एक राजनीतिक मंच से वह काम कर रहा है, जो हिंदू होने के नाते हम सदा से करते आ रहे हैं।

सवाल : आज लगभग 500 सालों के बाद असंख्य राम भक्तों, कार सेवकों की कुर्बानी के बाद राम मंदिर का निर्माण हो रहा है। आपके लिए राम मंदिर क्या है?

जवाब : राम मंदिर का आंदोलन, राम मंदिर का महत्व और राम मंदिर बनाने के लिए राजनीतिक मंच का उपयोग, ये वे लोग नहीं समझ पायेंगे, जो मनुष्य को केवल शरीर मानते हैं। अगर मनुष्य के साथ मन, बुद्धि, और आत्मा के सुख को वह समझ पायेंगे, उनकी कल्पना कर पायेंगे, तभी वे राम मंदिर के विषय को समझ पायेंगे। चूंकि हमारा राजनीतिक आधार मन, बुद्धि, आत्मा शरीर का सुख है। हम इस देश की जनता के लिए केवल रोटी, कपड़ा और मकान उपलब्ध कराने को लेकर अपनी पोलिटिकल एक्टिविटी को सीमित नहीं रख सकते। हमें उनकी आत्मा को भी सुखी करना है, उनकी बुद्धि को भी सुख पहुंचाना है और उनके मन को भी प्रसन्न रखना है। तो राम मंदिर इस देश के करोड़ों जनमानस के लिए शरीर भूखा रहे, तो रहे उनके मन, बुद्धि आत्मा और शरीर को सुखी करनेवाला विषय है। इसलिए भारतीय जनता पार्टी के लिए यह पोलिटिकल विषय है, अन्य राजनीतिक दल इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते। क्योंकि वे सिर्फ शरीर के सुख की सोचते हैं- रोटी, कपड़ा और मकान से ज्यादा वे सोच भी नहीं सकते। भारतीय जनता पार्टी के लिए राम मंदिर इस देश के करोड़ों लोगों के आत्मसम्मान को पुन: प्रतिष्ठित करने का विषय है। 1526 में जब मीर बांकी बाबर के सेनापति द्वारा भगवान राम के जन्म स्थान पर बने हुए भव्य राम मंदिर को पैरों तले रौंद कर तोड़ा गया, तो वह सिर्फ एक मंदिर नहीं टूटा, भगवान राम की जन्मभूमि का अपमान ही नहीं हुआ, बल्कि भगवान राम को आराध्य माननेवाले संपूर्ण भारतवर्ष, बल्कि संपूर्ण हिंद महासागर के क्षेत्र में वास करने वाले लोग, जिनके आदर्श राम थे, उनकी आत्मा को दुख पहुंचाया गया। उनके सम्मान को आघात पहुंचाया गया। उनके सम्मान को पैरों तले रौंदा गया और तब से लेकर आज तक, जब आदरणीय प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी जी के नेतृत्व में मंदिर के पुनर्निर्माण की नींव पूजन हो रही थी, तो यह विगत 500 वर्षों में लाखों हिंदुओं की इस राम मंदिर के निर्माण के लिए अपने प्राणों की आहूति का प्रतिफल था, भाजपा ने तो उनकी तुलना में बहुत कम किया है। भाजपा ने सिर्फ उस आंदोलन को एक जनांदोलन का रूप दिया है। उसे पूरे देश का विषय बनाया है।

कन्याकुमारी से लेकर कश्मीर तक, अरुणाचल प्रदेश से लेकर गुजरात तक के लोग राम मंदिर को अपनी अस्मिता, अपनी प्रतिष्ठा, अपना आत्मसम्मान, अपना मान-सम्मान का विषय समझने लगे। यह राष्ट्र गौरव का प्रतीक बन गया। आज राम मंदिर का निर्माण कार्य पीएम नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में हो रहा है। राम मंदिर देश के करोड़ों लोगों की आत्मा, मन और बुद्धि को सुख पहुंचाने का विषय है।

हम सौभाग्यशाली हैं कि पीएम मोदी को नेतृत्व करते देख रहे हैं : डॉ प्रदीप

डॉ दिनेशानंद गोस्वामी, डॉ रवींद्र राय, लक्ष्मण गिलुवा और अब डॉ दीपक प्रकाश के चहेते हैं डॉ वर्मा

2011 में मैंने भाजपा के कार्यकर्ता के रूप में काम करना प्रारंभ किया। कैसे व्यक्तित्व निर्माण के कार्यक्रमों के माध्यम से संघ इस राष्ट्र का पुनर्निर्माण कर रहा है ये विषय बहुत स्पष्टता से समझ में आया। उसके बाद जब नितिन गडकरी जी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने, तो उन्होंने भाजपा के भीतर एक प्रशिक्षण की योजना बनायी। प्रवेश वर्ग, प्रगति वर्ग, और प्रवीण वर्ग। इन तीन स्तरों पर कार्यकर्ताओं को उन्होंने प्रशिक्षित करने का कार्यक्रम बनाया। भाजपा में प्रशिक्षण के कार्यक्रमों को देखने के लिए कुछ कार्यकर्ता संघ से लगाये गये, जिनमें से एक मैं भी था।

सवाल : छात्र जीवन में हमें बाबर, उसके खानदान के बारे में पढ़ाया गया। हमें विदेशी आक्रांताओं की शौर्य गाथा पढ़ायी गयी। उनका महिमामंडन पढ़ाया गया। लेकिन महाराणा प्रताप, वीर शिवाजी और भी अन्य योद्धाओं, देशभक्तों के बारे में सीमित मात्रा में जानकारी दी गयी। हमें भारत की संस्कृति के बारे में सही तरीके से अवगत ही नहीं करवाया गया। उस वक़्त की शिक्षा नीति और अभी की नयी शिक्षा नीति में आप क्या अंतर पा रहे हैं?

जवाब : देखिये यह देश का दुर्भाग्य रहा कि हमारा इतिहास उन लोगों ने लिखा, जो हमारे ऊपर आक्रमणकारी और आतताई बन कर के आये। हमें लूटने-खसोटने वालों ने, हमारी मां बहनों का शोषण करनेवाले, हमारी धन संपदा की लूट करनेवाले, हमारे मंदिरों, संस्कृति और शिक्षा के केंद्रों को नष्ट करनेवाले लोगों ने इस देश का इतिहास लिखा है। चाहे वह मुगल हों, चाहे वे अंग्रेज हों। हमारे देश का जो सच्चा इतिहास ह, जो यथार्थ है, उसका परिचय ही भारतवासियों को नहीं होने दिया गया। ऐसी एक धारणा बनायी गयी कि भारत एक हजार साल तक गुलाम रहा। यह गलत है। डॉ वर्मा कहते हैं कि भारत कभी भी संपूर्ण रूप से गुलाम नहीं था। न औरंगजेब के समय भारत पूरा गुलाम था, न अकबर के समय भारत पूरा गुलाम था, न ही अंगे्रजों के समय भारत पूरा गुलाम था। जिस समय मुगल सत्ता दिल्ली में अपने पूरे शौर्य पर थी, उस समय भी असम में लाचित बड़फूकन नाम के देशभक्त योद्धा ने मुगल सेना को बंगाल पार नहीं होने दिया। उस समय हमारे शिवाजी महाराज थे, जिन्होंने आक्रांताओं की नींद हराम कर दी थी। कभी भी बुंदेलखंड गुलाम नहीं हुआ। कभी भी नेपाल गुलाम नहीं हुआ। भारत का बहुत बड़ा हिस्सा हमेशा स्वतंत्र और स्वाधीन रहा। जब दक्षिण में हैदर अली और टीपू सुल्तान का शासन था, तब उत्तर भारत स्वतंत्र था। जब उत्तर भारत में मुगलों का शासन था, तब दक्षिण स्वतंत्र था। भारत कभी पूरे तरीके से गुलाम नहीं रहा। लेकिन हमारा इतिहास उन लोगों ने लिखा, जो दिल्ली पर शासन कर रहे थे और केवल दिल्ली पर शासन करनेवाला व्यक्ति भारत की गुलामी का इतिहास लिखेगा, तो गलत होगा ही।
हमारे इतिहास की जो भी घटनाएं थीं, जिनसे भारत का गौरव बोध पुन: जागृत हो, उन सारी चीजों को योजनापूर्वक इतिहास के पन्नो से हटाया गया। वह इसलिए कि हमेशा से यह जाति एक दलित और बुरी तरीके से टूटी हुई हताश-निराश जाति के रूप में परिवर्तित हो जाये, ताकि हमेशा मुट्ठी भर लोग इस देश पर शासन कर सकें। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। भारत में इतने सारे महापुरुष हुए, जिन्होंने जागरण के कार्य प्रारंभ किये। भारत का स्वतंत्रता संग्राम, आप झारखंड़ में ही देख लीजिए सिदो-कान्हू, तिलका मांझी, भगवान बिरसा मुंडा, देश के कोने-कोने से पूरा समाज उठ खड़ा हुआ। हालत यह हुई कि जिन लोगों ने यह प्रचारित करने का प्रयास किया था कि हम भारत को गुलाम बना कर रखे हुए हैं, उन्हें यहां से भागना पड़ा। आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रयास से हम इतिहास संकलन का नया कार्य प्रारंभ कर चुके हैं। इस दिशा में बहुत काम हुआ है और हो रहा है। जो भारत का यथार्थ इतिहास है, जो शिक्षा इतिहास है, जिससे हमारे देश के लोगों का परिचय होना चाहिए, उसके पुनर्लेखन का कार्य प्रारंभ हो चुका है। आप रोज देखते होंगे कि कुछ न कुछ नयी चीजें अब सामने आ रही हैं। जो हमारा गौरवशाली इतिहास रहा है, उसका परिचय हमारी आनेवाली पीढ़ियों को भी होना चाहिए। बहुत सारी गलत चीजें आप देख रहे होंगे पाठ्यक्रम से रोज हटायी जा रही हैं। हमारे मार्गों के नाम, जो गलत रख दिये गये थे, उसे बदला जा रहा है। हमारे ऊपर अत्याचार करनेवालों के नाम पर जो शहरों का नामकरण हुआ, उसे भी अब बदला जा रहा है। भारत एक ऐसे सनातन संस्कृति और सभ्यता का प्रदेश है, जिसे हमेशा के लिए आप दबा कर नहीं रख सकते। जिस प्रकार से समुद्र की लहर एक बार पीछे जाती है, लेकिन वही लहर दुबारा अपनी प्रचंड ताकत के साथ और भी अधिक जलराशि को लेकर वापस किनारे तक लौटती है, तो भारत की संस्कृति बिल्कुल उसी प्रकार से है। जब-जब वक़्त ने इसे पीछे धकेला है, इसे दबाने का प्रयास किया है, थोड़ा पीछे यह हटी जरूर है ,लेकिन यह अपनी चौगुनी शक्ति के साथ प्रचंड वेग से वापस आयी है। भारत के इतिहास में ही विश्व का कल्याण छुपा हुआ है। भारत की सभ्यता और संस्कृति ही पूरे विश्व में शांति और भाईचारा स्थापित कर सकती है।

सवाल : आपका आरएसएस से लगाव और जुड़ाव कैसे हुआ? कैसे आप भाजपा से जुड़े?
जवाब : हमारे पिताजी का थोड़ा-बहुत जुड़ाव संघ से था। जब मैं रांची आया, तो उस समय संघ के पूर्णकालिक कार्यकर्ता, प्रचारक हुआ करते थे आनंद तुलस्यान जी। उनके, विजय घोष और यहां के सेवा का काम देखनेवाले बहुत ही वरिष्ठ प्रचारक श्री गुरुशरण जी के संपर्क में मैं आया। इस बीच मेरे पुत्र आदित्य ने संघ का प्राथमिक शिक्षा वर्ग किया, और जब प्रशिक्षण कर के मेरा पुत्र आदित्य आया, तो उसने कैंपस में शाखा लगाना प्रारंभ किया। उस समय डॉ अशोक वार्ष्णेय यहां प्रांत प्रचारक हुआ करते थे। हम लोग शाखा आने-जाने लगे। धीरे-धीरे संघ के अधिकारियों का यहां शाखा पर प्रवास होने लगा। हम सब उनके संपर्क में आये और धीरे-धीरे हम सब संघ के काम में लग गये। उसके बाद मैं संघ का कार्यकर्ता भी बन गया। मैंने संघ का प्रथम वर्ष और द्वितीय वर्ष दोनों का प्रशिक्षण प्राप्त किया और सेवा भारती में प्रांत के सह सचिव के नाते दायित्व लेकर के मैंने एक कार्यकर्ता के रूप में कार्य करना प्रारंभ किया। फिर 2011 में मैंने भाजपा के कार्यकर्ता के रूप में काम करना प्रारंभ किया। कैसे व्यक्तित्व निर्माण के कार्यक्रमों के माध्यम से संघ इस राष्ट्र का पुनर्निर्माण कर रहा है ये विषय बहुत स्पष्टता से समझ में आया। उसके बाद जब नितिन गडकरी जी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने, तो उन्होंने भाजपा के भीतर एक प्रशिक्षण की योजना बनायी। प्रवेश वर्ग, प्रगति वर्ग, और प्रवीण वर्ग। इन तीन स्तरों पर कार्यकर्ताओं को उन्होंने प्रशिक्षित करने का कार्यक्रम बनाया। भाजपा में प्रशिक्षण के कार्यक्रमों को देखने के लिए कुछ कार्यकर्ता संघ से लगाये गये, जिनमें से एक मैं भी था। डॉ दिनेशानंद गोस्वामी उस समय प्रदेश अध्यक्ष थे। उन्होंन गणेश मिश्रा जी, जो उस समय प्रदेश के प्रशिक्षण प्रमुख थे, उनके साथ सह प्रशिक्षण प्रमुख के रूप में काम पर लगाया और भाजपा की प्रदेश कार्यसमिति का सदस्य बनाया। 2013 आते-आते रवींद्र राय झारखंड भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बने और उन्होंने अपनी कमेटी में मुझे प्रदेश मंत्री का दायित्व दिया। यह मेरे लिए बड़ा आश्चर्य का विषय था। मुझे बड़ी सुखद अनुभूति भी हुई। वर्ष 2016 में लक्ष्मण गिलुआ प्रदेश अध्यक्ष बने। तब उन्होंने मुझे प्रदेश का उपाध्यक्ष बनाया। और 2020 में जब दीपक प्रकाश प्रदेश अध्यक्ष बने, तो मुझे प्रदेश महामंत्री का दायित्व दिया गया। आज दीपक प्रकाश के बारे में मैं कह सकता हूं कि वह एक बहुत ही सुलझे हुए, समझदार, बहुत लंबे समय से झारखंड की राजनीति को समझनेवाले एक जमीनी कार्यकर्ता हैं। एक आम कार्यकर्ता को भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने पार्टी का राज्य मुखिया बनाया। यह वह समय था, जब 2019 में सत्ता से हाथ धोने के बाद भाजपा का कार्यकर्ता चुनावी हार से हताश, निराश हो गया था। उस निराशा के महासागर से उन्हें निकाल कर लाना भी एक चुनौती से कम नहीं था। लेकिन जैसे ही दीपक प्रकाश ने नेतृव की कमान संभाली, वैसे ही वही हताश, निराश कार्यकर्ता फिर से उत्साह के साथ मैदान में पूरे दम-खम के साथ कूद पड़े। कार्यकर्ताओं में अभूतपूर्व उत्साह का संचार हुआ। 2019 में हुई हार को कार्यकर्ता भूल गये, क्योंकि अब उनके ही बीच के एक कार्यकर्ता के हाथों प्रदेश की कमान थी।
आज भाजपा का कोई भी आंदोलन हो, जमीनी कार्यकर्ता से लेकर, सांसद, विधायक उस आंदोलन का हिस्सा बनते हैं। यह दीपक प्रकाश की सादगी ही है और नेतृत्व क्षमता ही है, जो कोने-कोने से भाजपा के हर कार्यकर्ता को उनसे जुड़ने को मजबूर कर देती है। आज भाजपा के वर्तमान संगठन महामंत्री धर्मपाल सिंह ने हमारे प्रदेश अध्यक्ष दीपक प्रकाश के कंधे से कंधा मिला कर कार्यकर्ताओं को निराशा के भंवर से निकालने का काम किया।
प्रदीप वर्मा कहते हैं कि ऐसा सदियों में होता है, जब ऐसा एक क्रांतिकारी विचारधारा वाला, देश की तसवीर और तकदीर बदलने वाला व्यक्ति देश का नेतृत्व करता है। हम सभी बहुत ही सौभाग्यशाली हैं कि नरेंद्र भाई मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में आज देश का नेतृत्व करते हुए हम देख रहे हैं। आज भारत विश्व में फिर से एक नेतृत्वकर्ता के रूप में भूमिका निभाता हुआ दिख रहा है।
प्रधानमंत्री का स्नेह झारखंड के प्रति कितना है, आप समझ सकते हैं कि आयुष्मान भारत योजना, जो एक क्रांतिकारी योजना है, उसकी शुरूआत रांची से करना खुद में बता देता है कि झारखंड के लोगों और यहां की गरीब जनता के लिए उनके मन में कितना स्नेह है। प्रधानमंत्री ने झारखंड के लिए हमेशा बढ़-चढ़ कर कार्य किया। चाहे एम्स हो, नये मेडिकल कॉलेज हों, नया एयरपोर्ट हो, सिंदरी खाद कारखाने को पुनर्जीवित करने का विषय हो, आइएसएम धनबाद को आइआइटी का दर्जा देने का विषय हो, ऐसी बहुत सारी चीजें हैं जो केंद्र सरकार की योजना से होनी थीं। आज भारतमाला रोड झारखंड से गुजर रही है, ये इसलिए ताकि झारखंड देश की इकोनॉमिक कॉरिडोर से जुड़े।

सवाल : आपने कहा कि आप राजनीति सिर्फ पद के लिए नहीं करना चाहते हैं। आप भाजपा के कार्यकर्ता हैं और उसी रूप में रहना चाहते हैं। आप लोगों को भाजपा की विचारधारा बताना चाहते हैं, राजनीति में आने के लिए प्रेरित करना चाहते हैं। आखिर आप भाजपा में ऐसा क्या पाते हैं?

जवाब : जवाब देते समय डॉ प्रदीप वर्मा भावुक हो जाते हैं। कहते हैं, भाजपा की जो राजनीति है, वह कोई कार्यक्रम आधारित नहीं है, कोई घटना आधारित नहीं है या किसी व्यक्ति को सत्ता प्राप्त करने को लेकर नहीं है। हम शुद्ध रूप से एक वैचारिक विषय को लेकर राजनीति करते हैं। हमारा वैचारिक विषय क्या है- भारत माता की जय। जैसे ही हम भाजपा में भारत माता की जय बोलते हैं तो इस देश के 138 करोड़ लोगों की माता भारत माता हो जाती हैं और सबकी एक माता होने के नाते हम सभी आपस में सहोदर भाई बहन हो जाते हैं। तो आपस में भाई-बहन का भाव लेकर, भारत माता की संतान होने का दायित्व लेकर, भारत माता को परम वैभव पर स्थापित करने के लिए इस महान राष्ट्र के पुनर्निर्माण की प्रक्रिया का हिस्सा हैं हम सब। यह हमारी विचारधारा का मूल है और इस विचारधारा को लेकर और इस वैचारिक अनुष्ठान में खड़े होकर भारतीय जनता पार्टी का कार्यकर्ता राजनीति करता है। वह वैचारिक विषय हमारी आनेवाली पीढ़ी, हमारे जो नवयुवक कार्यकर्ता हैं, उन तक लगातार पहुंचता रहे। और इस वैचारिक विषय को लेकर स्पष्ट लक्ष्य के साथ भारत माता को विश्व के सर्वश्रेष्ठ आसन पर स्थापित करने का संकल्प लेकर हमारी आनेवाली पीढ़ी जो राजनीति के क्षेत्र में कार्य करना चाहती है, वह आगे बढ़े, यह दायित्व हमारा है।
वह कहते हैं, माना कि राजनीति के क्षेत्र में कई प्रकार के कार्य रहते हैं, तो सभी लोग यह नहीं कर सकते, लेकिन हम जैसे कुछ लोगों को इस प्रकार का कार्य करते रहना होता है कि हमारे वैचारिक विषयों का प्रवेश नये लोगों में हो और उससे पार्टी का विस्तार होता रहे। मेरा मानना है कि राजनीति लोकसंग्रह का काम है। आप जितने ज्यादा लोगों को अपने राजनीतिक दल, अपनी विचारधारा से जोड़ते हैं, आप उतने सफल होते हैं। तो भाजपा की विचारधारा जन-जन तक पहुंचाने और उस वैचारिक विषय को लेकर हमारी आनेवाली पीढ़ी भाजपा की राजनीति को आगे बढ़ाये। ये मैं अपना एक दायित्व व्यक्तिगत रूप से मानता हूं।

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