रांची। झारखंड में इन दिनों राजनीतिक यात्राओं का दौर जारी है। यात्रा पॉलिटिक्स में लाल से लेकर हरा झंडा और सत्ता पक्ष से लेकर विपक्ष तक ने मिशन 2019 तक अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। कोई संघर्ष यात्रा पर है, तो कोई स्वाभिमान यात्रा पर। इन राजनीतिक यात्राओं को लेकर सियासी पारा चढ़ गया है। झामुमो और आजसू के बीच राजनीति गरमा गयी है। वजह साफ है कि दोनों क्षेत्रीय पार्टियां हैं और दोनों का अस्तित्व स्थानीय वोटरों पर निर्भर है। झामुमो का गढ़ संथाल, कोल्हान और कोयलांचल का क्षेत्र है। आजसू के मुख्य वोटर महतो कम्युनिटी के लोग हैं। झामुमो ने पिछले चुनाव में महतो बहुल क्षेत्र में अपने प्रभाव को स्थापित किया था। आजसू सुप्रीमो सुदेश महतो ने अपनी स्वाभिमान यात्रा के प्रथम चरण में महतो बहुल क्षेत्र का ही चयन किया। वजह साफ है कि सुदेश की इस क्षेत्र में सक्रियता को देखकर झामुमो हांफने लगा है। उसे लगता है कि सुदेश की यह यात्रा अगले चुनाव में महतो बहुल क्षेत्र में उसके लिए खतरे की घंटी है।
जिस तरह से स्वाभिमान यात्रा में सुदेश को जनता का समर्थन मिला, उसने झामुमो सहित सभी दलों के कान खड़े कर दिये हैं। खासकर झामुमो को यह लगने लगा है कि झारखंड की सत्ता में आने में सबसे बड़ा रोड़ा आजसू ही बनेगा। इसी कारण झामुमो ने सुदेश की स्वाभिमान यात्रा के पहले चरण की समाप्ति के साथ ही आजसू पर खुलकर हमला बोल दिया है।
आजसू पार्टी ने कभी आंदोलन को नहीं बेचा : देवशरण भगत
आजसू पार्टी के प्रवक्ता देवशरण भगत ने कहा कि सरकार का सहयोगी दल होने के नाते आजसू का यह कर्तव्य है कि सरकार की योजनाओं की जमीनी हकीकत को जाना जाये। जनता की नब्ज को टटोला जाये। इसी कारण स्वाभिमान यात्रा पार्टी कर रही है। आजसू पार्टी ने कभी आंदोलन को नहीं बेचा है। कभी बालू और जंगल को नहीं बेचा है। जमीन नहीं हड़पी है। यह बात पूरा राज्य जानता है कि कैसे हेमंत सोरेन ने सीएनटी और एसपीटी एक्ट का उल्लंघन कर संथाल, कोयलांचल और राजधानी रांची में गरीब आदिवासियों की जमीन को औने-पौने दाम पर अपने या परिवार के लोगों के नाम कराया है। यह इतिहास तो सिर्फ झामुमो का रहा है। देवशरण भगत ने कहा कि स्वाभिमान यात्रा बिरसा मुंडा के अबुआ दिशुम, अबुआ राज के सपनों को साकार करने के लिए है। महात्मा गांधी के स्वराज के नारे को मूर्त रूप देने के लिए है। इस यात्रा के माध्यम से यह देखने का प्रयास हो रहा है कि इस राज्य में गण कहां खड़ा है।
देवशरण भगत ने कहा कि झामुमो का इतिहास ही आंदोलन को बेचने का रहा है। जब भी मौका आया, उसने बेचने और हड़पने का काम किया है। जिस पार्टी के सुप्रीमो ने ही झारखंड आंदोलन को बेच दिया, वह झारखंड का क्या भला कर सकता है। स्थानीय नीति को लेकर सरकार गिरा दी, लेकिन खुद 14 महीने सीएम रहने के बाद स्थानीय नीति नहीं बनायी। इस दौरान सिर्फ अपना उल्लू सीधा किया। इस दौरान भी हेमंत सोरेन ने झारखंड के बालू को मुंबई के ठेकेदार के हाथों बेच दिया।
झामुमो को बयान देने के पहले यह सोचना चाहिए कि हेमंत की सरकार ने कैसे 500 करोड़ से ज्यादा में झारखंड के बालू घाटों को राज्य के बाहर की कंपनियों के हाथों बेच दिया। इस फैसले का उस समय मंत्रिमंडल में शामिल सहयोगी दल के मंत्रियों ने भी खुलकर विरोध किया था। भगत ने कहा कि हेमंत ने अपने भाई बसंत सोरेन को बालू घाटों की नीलामी का दायित्व सौंपा था। आजसू प्रवक्ता ने कहा कि जिसने गरीब आदिवासियों की जमीन हड़प ली, जो नेता स्वाभिमान यात्रा पर सवाल उठा रहे हैं, उन्हें एक बार अपनी गिरेबां में झांक कर देखना चाहिए।
आजसू ने बेच दिया झारखंड का स्वाभिमान : झामुमो
झामुमो नेता विनोद पांडेय ने कहा कि आजसू ने झारखंड के आदिवासियों और मूलवासियों के स्वाभिमान को गिरवी रखकर सत्ता की मलाई हमेशा खायी है। आजसू अलग राज्य बनने के बाद कुछ समय को छोड़ कर हर वक्त सत्ता में रही। आजसू ने हमेशा सत्ता हित के लिए समझौता किया है और राज्य के आदिवासियों-मूलवासियों के स्वाभिमान को गिरवी रखा। स्थानीय नीति से लेकर सरकारी स्तर से शराब बेचने और स्कूलों को विलय किये जाने के निर्णय का आजसू ने समर्थन किया। झारखंड की आत्मा सीएनटी और एसपीटी एक्ट में संशोधन के समय सरकार का साथ दिया। भूमि अधिग्रहण कानून का विरोध तक नहीं किया और आज किस मुंह से स्वाभिमान यात्रा निकाल रही हैं। इस यात्रा में किसके स्वाभिमान की बात हो रही है। स्वाभिमान की बात आजसू के मुंह से शोभा नहीं देती है। यह आजसू पार्टी की दोहरी राजनीति को दर्शाती है।