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    Home»Jharkhand Top News»बेरमो में होगा बाटुल के अनुभव का लिटमस टेस्ट
    Jharkhand Top News

    बेरमो में होगा बाटुल के अनुभव का लिटमस टेस्ट

    azad sipahi deskBy azad sipahi deskOctober 17, 2020Updated:October 17, 2020No Comments6 Mins Read
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    झारखंड के कोयला क्षेत्र की प्रमुख विधानसभा सीट बेरमो से भाजपा ने अपने पुराने प्रत्याशी योगेश्वर महतो बाटुल को एक बार फिर उतारा है। बाटुल के चुनाव मैदान में उतरने से आगामी तीन नवंबर को होनेवाला उप चुनाव रोचक हो गया है, क्योंकि इस पुराने अनुभवी प्रत्याशी को इस बार युवा और और जोश से लबरेज प्रतिद्वंद्वी से मुकाबला करना है। इस लिहाज से बाटुल के लिए इस बार का चुनाव उनके भविष्य के लिए भी निर्णायक हो गया है। बाटुल एक बार बेरमो विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। इसलिए इलाके में उनके जनाधार से इंकार नहीं किया जा सकता, लेकिन इस बार उन्हें अपने प्रतिद्वंद्वी के साथ जुड़े सहानुभूति के फैक्टर से भी पार पाना है, जो इतना आसान नहीं है। बाटुल की चुनावी रणनीति में इस फैक्टर की काट जरूर खोजी जा रही होगी। इसके साथ ही बेरमो का उप चुनाव इस बार भाजपा के प्रादेशिक नेतृत्व के साथ आजसू के संबंधों को भी नये सिरे से परिभाषित करेगा, क्योंकि पिछले चुनाव में आजसू और भाजपा ने यहां से अलग-अलग चुनाव लड़ा था। इस तरह बेरमो के जंग में बाटुल का बहुत कुछ दांव पर तो लगा ही हुआ है, भाजपा नेताओं की प्रतिष्ठा भी इससे जुड़ी है। बेरमो विधानसभा क्षेत्र से भाजपा के उम्मीदवार योगेश्वर महतो बाटुल के सामने आनेवाली चुनौतियों और उनकी चुनावी संभावनाओं का विश्लेषण करती आजाद सिपाही पॉलिटिकल ब्यूरो की खास रिपोर्ट।

    14 अक्टूबर को बेरमो विधानसभा सीट से भाजपा उम्मीदवार के रूप में नामांकन दाखिल करने से पहले योगेश्वर महतो बाटुल ने मीडिया से बातचीत करते हुए जब कहा कि इस बार वह तमाम राजनीतिक अटकलों को गलत साबित करेंगे, तब उनके चेहरे पर विश्वास से अधिक अनुभव का रंग अधिक गहरा था। अपने बेटे की उम्र के प्रतिद्वंद्वी कुमार जयमंगल उर्फ अनुप सिंह के मुकाबले कहीं अधिक राजनीतिक अनुभव रखनेवाले बाटुल के नामांकन में मौजूद भाजपा और आजसू नेताओं ने भी बाद में जब उनकी जीत की भविष्यवाणी की, तब ऐसा लगा, मानो दिसंबर में हुई पराजय को भाजपा प्रत्याशी कहीं पीछे छोड़ चुके हैं।
    करीब 65 साल के योगेश्वर महतो बाटुल 2014 में बेरमो से विधायक रह चुके हैं। दिसंबर में हुए चुनाव में उन्हें 25 हजार से अधिक मतों के अंतर से पराजय का मुंह देखना पड़ा था। उस समय उनकी हार का कारण निजी से कहीं अधिक भाजपा के खिलाफ पैदा हुए एंटी इनकमबेंसी फैक्टर को बताया गया था, हालांकि बेरमो के लोग मानते हैं कि अपने कार्यकाल के दौरान बाटुल ने कोई छाप नहीं छोड़ी। इसलिए जनता ने उनका समर्थन नहीं किया था।
    बेरमो विधानसभा क्षेत्र गिरिडीह संसदीय क्षेत्र के तहत आता है और यह झारखंड के कोयला क्षेत्र का प्रमुख क्षेत्र माना जाता है। झारखंड में कोयला क्षेत्र की राजनीति दूसरे इलाकों के मुकाबले अधिक आक्रामक और अलग किस्म की होती है। इस बार बाटुल के सामने जो प्रतिद्वंद्वी हैं, उनके पास चुनाव लड़ने का अनुभव नहीं है। इसलिए बाटुल के सामने पहली और सबसे बड़ी चुनौती उनकी आक्रामक राजनीति की काट खोजने की है। बाटुल की राजनीति को नजदीक से जाननेवाले बताते हैं कि वह कोयला क्षेत्र की अपेक्षा ग्रामीण इलाकों पर अधिक ध्यान देते हैं। विधायक के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान भी उन्होंने कोयला मजदूरों के हित की बात शायद ही कभी उठायी। दूसरी तरफ उनके प्रतिद्वंद्वी कोयला मजदूरों की समस्याओं के साथ दूसरे मतदाताओं पर भी ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। इसका तोड़ बाटुल जितनी जल्दी खोज लें, उनके लिए उतना ही अच्छा होगा।
    बाटुल के सामने दूसरी बड़ी चुनौती बेरमो के लोगों को यह भरोसा दिलाने की है कि इस बार वह विधानसभा में अधिक सक्रियता दिखायेंगे। बाटुल के लिए समस्या यह है कि पिछले 10 महीने के दौरान ऐसा कोई बड़ा मुद्दा नहीं पैदा हुआ है, जिसे उठा कर वह जनता का समर्थन हासिल कर सकें। सत्तारूढ़ गठबंधन के खिलाफ भी उनके पास कोई मुद्दा नहीं है और न ही दिवंगत विधायक राजेंद्र प्रसाद सिंह के कामकाज पर टिप्पणी ही की जा सकती है। इसलिए उनके सामने दुविधा की स्थिति है। एक बात उनके लिए राहत देनेवाली है और वह यह है कि इस बार आजसू का पूरा समर्थन उन्हें मिल रहा है। दिसंबर में हुए चुनाव में आजसू ने बेरमो से अपना उम्मीदवार खड़ा किया था और उसे 18 हजार के करीब वोट मिले थे। इस बार यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या आजसू अपना वोट भाजपा के पक्ष में ट्रांसफर करा पाती है। यदि ऐसा हो गया, तो यह झारखंड की राजनीति के लिए नये अध्याय की शुरुआत होगी।
    बाटुल के साथ एक बड़ी समस्या यह है कि प्रदेश की राजनीति में उनकी कोई भूमिका कभी नजर नहीं आयी। बेरमो का विधायक रहने के बावजूद वह कभी राजनीति की मुख्यधारा में नहीं रहे। भाजपा के भीतर भी उनकी कभी कोई भूमिका सामने नहीं आयी। बेरमो के लोगों को शायद इतना अंतर्मुखी प्रतिनिधि रास नहीं आता है। इसलिए बाटुल को इस बार लोगों को यह भरोसा भी दिलाना होगा कि वह अपनी कार्यशैली को बदलेंगे।
    इन तमाम मुद्दों के साथ यह साफ हो जाता है कि बाटुल के लिए बेरमो की राह आसान नहीं होनेवाली है। वैसे भी बेरमो का चुनाव भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष दीपक प्रकाश और विधायक दल के नेता बाबूलाल मरांडी की नेतृत्व क्षमता से जुड़ गया है। इसलिए यहां केवल बाटुल की किस्मत का ही फैसला नहीं होगा, बल्कि यह बहुत से नये समीकरणों को जन्म देगा। भाजपा पहली बार विपक्ष में रहते हुए चुनाव लड़ रही है, जिसकी कीमत का उसे अच्छी तरह एहसास है। ऐसे में बेरमो सीट पर उसकी स्वीकार्यता भी दांव पर लगी हुई है। यदि बाटुल यह जंग जीत लेते हैं, तो उनका नाम भाजपा के वैसे योद्धाओं में शुमार हो जायेगा, जिन्हें करिश्माई कहा जाता है। लेकिन इसके लिए उन्हें अपना सब कुछ झोंकना होगा। कोयला क्षेत्र की सीट से चुनाव लड़नेवाले यदि कोयले के रंग को उपेक्षित नजरों से देखेंगे, तो इसकी कीमत तो उन्हें चुकानी ही होगी। इसलिए बाटुल को इस बार इस जंग को जीतने के लिए बहुत पापड़ बेलने होंगे। उनका अनुभव और उनकी मेहनत क्या परिणाम देती है, यह तो 10 नवंबर को ही पता चल पायेगा, लेकिन इतना जरूर है कि पिछले चुनाव में भाजपा की सरकार होने के कारण उन्हें जो मदद मिलेगी, इस बार नहीं मिल पायेगी।

    Batmus experience will be litmus test in Bermo
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