देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस ने अपना नया अध्यक्ष चुन लिया है। मतदान पूरा हो गया है और परिणाम भी लगभग तय हो गया है कि मल्लिकार्जुन खड़गे ही पार्टी की कमान संभालेंगे। एक दिन पहले हुए चुनाव को लेकर बहुत सारी बातें की जा रही हैं, लेकिन एक बड़ा सवाल तो यह पैदा हो रहा है कि इस एकतरफा चुनाव का क्या औचित्य था। जिस तरह पूरी चुनाव प्रक्रिया, तारीख की घोषणा से लेकर मतदान तक पर गांधी-नेहरू परिवार का असर दिखा, उससे सहज ही यह सवाल पैदा होता है। पार्टी अध्यक्ष के चुनाव में कौन वोट देगा और किसे वोट देगा, यह बाकायदा हाइकमान ने तय किया था और इसका परिणाम यह हुआ कि चुनाव के एक प्रत्याशी शशि थरूर कई राज्यों में पोलिंग एजेंट तक के लिए तरस गये। इस चुनाव पर गांधी-परिवार के असर का आलम यह था कि कई राज्यों में थरूर को एक भी वोट शायद ही मिला हो। इतना ही नहीं, कई राज्यों में पार्टी के समर्पित कार्यकर्ताओं-नेताओं को डेलीगेट्स नहीं बनाया गया। कारण पार्टी को यह अंदेशा था कि शायद वे कार्यकर्ता-नेता मल्लिाकार्जुन खड़गे को वोट न दें। परिणाम की औपचारिक घोषणा से पहले ही कांग्रेसी मान चुके हैं कि खड़गे ही चुनाव जीतेंगे, लेकिन मनीष तिवारी जैसे पार्टी के पुराने नेता कहने लगे हैं कि ऐसे तो किसी क्लब का भी चुनाव नहीं होता। उनका कहना सही भी है कि यदि इसी तरह चुनाव करना था, तो फिर सीधे-सीधे खड़गे को अध्यक्ष पद पर मनोनीत कर दिया जाता और बाद में मतदाताओं से उनके नाम की स्वीकृति ले ली जाती। मनीष तिवारी के इस बयान के बाद से अब कांग्रेसी ही नहीं, आम लोग और यहां तक कि कांग्रेस समर्थक भी यह सवाल करने लगे हैं कि यदि रबर स्टांप अध्यक्ष ही बनाना था, तो फिर इतनी कवायद क्यों की गयी। इसने पार्टी की पहले से खराब स्थिति को और भी हास्यास्पद बना दिया है। कांग्रेस अध्यक्ष के इस चुनाव के परिणाम की घोषणा से पहले ही इसके सभी पहलुओं का विश्लेषण कर रहे हैं आजाद सिपाही के विशेष संवाददाता राकेश सिंह।
देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी और करीब साढ़े छह दशक तक दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के राजनीतिक क्षितिज पर एकछत्र राज करनेवाली कांग्रेस ने अपना नया अध्यक्ष चुन तो लिया है, लेकिन इस पूरी चुनाव प्रक्रिया ने अपने पीछे कई सवाल छोड़ दिये हैं। इस चुनाव का परिणाम अभी घोषित नहीं हुआ है, लेकिन यह लगभग तय है कि मल्लिकार्जुन खड़गे ही पार्टी के नये अध्यक्ष होंगे। चुनाव में उनके प्रतिद्वंद्वी रहे शशि थरूर को बुरी तरह पराजित होना पड़ेगा। वैसे तो यह कांग्रेस का आंतरिक मामला है, लेकिन इस चुनाव ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि कांग्रेस आज भी गांधी-नेहरू परिवार की छाया से अलग नहीं हो सकी है। लोग सवाल कर रहे हैं कि आखिर यह कैसा आंतरिक लोकतंत्र है कि सब कुछ परिवार की सहमति और स्वीकृति से हुआ। उम्मीदवार चयन से लेकर किसे वोट देना है, यह सब कुछ आलाकमान ने तय कर दिया था और सब कुछ उसके अनुरूप ही हुआ। चूंकि गांधी-नेहरू परिवार ने खड़गे को उम्मीदवार बनाया था, इसलिए उनका समर्थन करने का निर्देश सभी प्रदेशों में पहले ही भेज दिया गया था। यही नहीं, कांग्रेस के उन समर्पित कार्यकर्ताओं-नेताओं को डेलीगेट्स की सूची में शामिल नहीं किया गया, जो पार्टी में लोकतंत्र की बात करते हैं। झारखंड को ही लीजिए, यहां पचास से ऊपर समर्पित नेताओं-कार्यकर्ताओं को यह अधिकार नहीं दिया गया। यहां तक कि देवघर के केएन झा जैसे पुराने नेता भी यह अधिकार नहीं पा सके। कांग्रेस के महानगर अध्यक्ष को भी इस लायक नहीं समझा गया कि वे डेलीगेट्स बन सकें। शशिभूषण राय जैसे नेता किनारे कर दिये गये। इसलिए खबर है कि शशि थरूर को कई राज्यों में वोट तो दूर, पोलिंग एजेंट तक नहीं मिले।
चुनाव खत्म होने के बाद कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने कहा है कि यदि कांग्रेस को अध्यक्ष पद के चुनाव के नाम पर औपचारिकता का ही परिचय देना था, तो फिर अच्छा होता कि चुनाव कराये ही न जाते। अध्यक्ष पद के चुनाव की प्रक्रिया यदि कुछ कह रही है तो यही कि आंतरिक लोकतंत्र का दिखावा किया जा रहा है। उन्होंने यहां तक कह दिया कि ऐसे तो किसी क्लब का भी चुनाव नहीं होता।
कैसे पूरी हुई चुनाव प्रक्रिया
इसी साल उदयपुर अधिवेशन में जब कांग्रेस ने यह तय कर लिया था कि वह एक व्यक्ति-एक पद के सिद्धांत पर चलेगी, तब राहुल गांधी की ओर से यह स्पष्ट करने की आवश्यकता ही नहीं थी कि यदि अशोक गहलोत पार्टी अध्यक्ष बनते हैं, तो उन्हें मुख्यमंत्री पद छोड़ना होगा। अच्छा होता कि लगे हाथ वह यह भी साफ कर देते कि अशोक गहलोत के कांग्रेस अध्यक्ष बनने की सूरत में सचिन पायलट राजस्थान के मुख्यमंत्री बनेंगे या नहीं? राहुल ने जिस तरह कांग्रेस के भावी अध्यक्ष अशोक गहलोत की सीमाएं तय कर दीं, उससे यही रेखांकित हुआ कि पार्टी की कमान कोई भी संभाले, वह उनके और परिवार के अन्य सदस्यों के हिसाब से चलने के लिए विवश होगा। इसके बाद इसमें कोई संशय नहीं रहा कि कांग्रेस नेतृत्व यानी गांधी परिवार मल्लिकार्जुन खड़गे को ही अध्यक्ष बनाना चाहता है।
इसका एक अर्थ यह भी है कि कांग्रेस में परिवार शीर्ष पर बना रहेगा। अशोक गहलोत प्रकरण में किरकिरी के बाद गांधी-नेहरू परिवार ने जिस आपाधापी में खड़गे को अपना उम्मीदवार बनाया, उससे तो यही लगा कि पार्टी अध्यक्ष पद का चुनाव महज एक औपचारिकता है। ऐसे में यह सवाल तो उठता ही है कि यह चुनाव महज एक दिखावा है। इसमें सब कुछ उस परिवार की सहमति और स्वीकृति से हुआ, जो करीब दो दशक से कांग्रेस को अपनी निजी जागीर की तरह चला रहा है। यदि कांग्रेस को अध्यक्ष पद के चुनाव के नाम पर औपचारिकता का ही परिचय देना था, तो फिर इस कवायद की जरूरत ही नहीं थी। अध्यक्ष पद के चुनाव की प्रक्रिया यदि कुछ कह रही है तो यही कि आंतरिक लोकतंत्र का दिखावा किया जा रहा है। इस दिखावे से कांग्रेस यह दावा करने में भले समर्थ हो जाये कि आखिरकार उसने अपने नये अध्यक्ष का चुनाव कर लिया, लेकिन इससे पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र की जड़ों को मजबूती नहीं मिलनेवाली।
इसके अलावा 80 वर्षीय खड़गे के चयन के माध्यम से गांधी परिवार ने कुछ कड़े संदेश दिये हैं। पहला यही कि स्वायत्तता को लेकर बड़ी बातों के बावजूद वह पार्टी पर अपना नियंत्रण छोड़ने को तैयार नहीं है। दूसरा वफादारी उनके लिए सबसे बढ़ कर है। आलाकमान का तीसरा संदेश यह भी है कि परिवार अपने वारिस राहुल गांधी के लिए कोई प्रतिस्पर्धा नहीं चाहता। पहली नजर में भले ही इस व्यवस्था में कुछ खोट नजर आये, लेकिन व्यावहारिक नजरिये से यही तार्किक है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि राजनीतिक टिप्पणीकार क्या कहते हैं, लेकिन इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि जनता कांग्रेस को गांधी परिवार से ही जोड़ कर देखती है। जब तक पार्टी खुद ही न बिखर जाये, तब तक इस रिश्ते को खत्म नहीं किया जा सकता।
दूसरी ओर शशि थरूर को भी अपनी जीत के कोई आसार नहीं दिखते और लगभग तय हार को वह स्वीकार कर चुके हैं, लेकिन अपने घोषणा पत्र के माध्यम से उन्होंने कुछ महत्वपूर्ण संदेश जरूर दिये हैं। उनमें सबसे महत्वपूर्ण पीढ़ीगत परिवर्तन और पार्टी को भविष्य के लिए तैयार करने का है। इसके साथ ही उन्होंने शायद देश की सबसे पुरानी पार्टी में कायाकल्प का बीजारोपण कर दिया है।