विशेष
भाजपा ने 66 प्रत्याशियों में से एक दर्जन महिलाओं को दिया है टिकट
कांग्रेस की पांच और झामुमो की चार महिला प्रत्याशी दिखेंगी मैदान में
गांडेय, झरिया और रामगढ़ सीट पर महिलाओं के बीच होगा मुकाबला
नमस्कार। आजाद सिपाही विशेष में आपका स्वागत है। मैं हूं राकेश सिंह।
विधानसभा चुनाव की गहमागहमी के बीच झारखंड में इस बार एक नया ट्रेंड देखने को मिल रहा है। यह ट्रेंड है महिलाओं की बढ़ती भागीदारी का। इस बार के विधानसभा चुनाव में अब तक भाजपा ने 66, आजसू ने 10, जदयू ने दो, लोजपा (आर) ने एक और कांग्रेस ने 21 प्रत्याशियों की सूची जारी की है। इनमें यदि महिला प्रत्याशियों की बात की जाये, तो उनकी संख्या झारखंड में अब तक हुए विधानसभा चुनावों में सर्वाधिक है। भाजपा ने जहां 12 महिला प्रत्याशियों को टिकट दिया है, वहीं कांग्रेस ने पांच महिला प्रत्याशियों को उतारा है। झामुमो ने अपने प्रत्याशियों की सूची जारी नहीं की है, लेकिन ऐसी संभावना है कि वह तीन निवर्तमान महिला विधायकों के अलावा एक या दो अन्य महिलाओं को टिकट जरूर देगी। आजसू ने भी एक महिला प्रत्याशी को टिकट दिया है। झारखंड की राजनीति में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी इस बात का संकेत है कि यहां महिलाओं के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण बड़ी तेजी से बदल रहा है। आज राजनीति में महिलाएं जितनी प्रभावशाली तरीके से आगे आ रही हैं, उससे तो यही साबित होता है कि झारखंड अपनी आधी आबादी का नेतृत्व स्वीकार करने के लिए पूरी तरह तैयार है।

वैसे भी राज्य की कम से कम 27 ऐसी विधानसभा सीटें हैं, जहां पुरुषों के मुकाबले महिला मतदाताओं की संख्या अधिक है। जनजातीय समाज में महिला नेतृत्व की पुरानी परंपरा है और यहां अधिकांश गंभीर आंदोलनों की कमान महिलाओं ने सफलतापूर्वक संभाली है। झारखंड की राजनीति में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी का क्या हो सकता है असर, बता रहे हैं आजाद सिपाही के विशेष संवाददाता राकेश सिंह।

झारखंड में विधानसभा चुनाव की गहमा-गहमी के बीच जिस एक महत्वपूर्ण वर्ग पर लोगों का ध्यान गया है, वह है राजनीति में महिलाओं की भागीदारी। यह जानना सुखद है कि झारखंड की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ रही है। आसन्न विधानसभा चुनाव में तो स्थिति यह है कि इस बार सबसे अधिक महिलाएं चुनाव मैदान में दिखेंगी। इस चुनाव के लिए भाजपा ने अपने 66 प्रत्याशियों में से 12 महिलाओं को टिकट दिया है, जबकि कांग्रेस के 21 प्रत्याशियों की सूची में पांच महिलाओं के नाम हैं। आजसू ने 10 प्रत्याशियों में से एक महिला को टिकट दिया है, जबकि झामुमो की सूची अब तक जारी नहीं हुई है, लेकिन ऐसे संकेत हैं कि वह तीन निवर्तमान विधायकों के अलावा और एक या दो महिलाओं को टिकट दे सकता है। यानी इतना तय है कि विभिन्न राजनीतिक दलों की तरफ से इस बार दो दर्जन के करीब महिलाएं चुनाव मैदान में उतरेंगी। छोटी पार्टियों द्वारा उतारी गयी महिला प्रत्याशियों और निर्दलीय के रूप में मैदान में उतरीं महिलाओं की संख्या अब तक साफ नहीं है।

तीन सीटों पर मुकाबला महिलाओं के बीच
इस बार झारखंड विधानसभा चुनाव में कम से कम तीन ऐसी सीटें हैं, जहां मुकाबला महिलाओं के बीच होगा। ये विधानसभा सीटें रामगढ़, गांडेय और झरिया हैं। इनमें से रामगढ़ और झरिया में 2019 में भी महिलाओं के बीच ही मुकाबला हुआ था। रामगढ़ सीट पर मुकाबला आजसू की सुनीता चौधरी और कांग्रेस की ममता देवी के बीच होगा। 2019 में ममता देवी ने सुनीता चौधरी को हराया था, लेकिन बाद में एक आपराधिक मामले में अदालत द्वारा सजा सुनाये जाने के बाद उनकी विधायकी चली गयी थी। तब उपचुनाव में सुनीता चौधरी ने ममता देवी के पति को हराया था। अब ममता देवी की सजा पर रोक लगायी जा चुकी है और वह एक बार फिर सुनीता चौधरी को चुनौती देने मैदान में उतर रही हैं।

गांडेय विधानसभा सीट पर झामुमो की कल्पना सोरेन का मुकाबला भाजपा की मुनिया देवी से होगा। 2019 में यहां से झामुमो के सरफराज अहमद ने जीत हासिल की थी, लेकिन पिछले साल के अंत में उन्होंने इस्तीफा दे दिया था। तब गांडेय में मई में उपचुनाव हुआ और झामुमो ने कल्पना सोरेन को मैदान में उतारा था। उन्होंने भाजपा प्रत्याशी को मात दी थी। इस बार भाजपा ने यहां से मुनिया देवी को उतारा है, जो कल्पना सोरेन को चुनौती देंगी। झरिया विधानसभा सीट पर 2019 की तरह इस बार भी कांग्रेस की पूर्णिमा नीरज सिंह का मुकाबला भाजपा की रागिनी सिंह से होगा। पिछले चुनाव में पूर्णिमा नीरज सिंह ने रागिनी सिंह को मात दी थी। इस बार दोनों ही दलों ने इन दोनों पर फिर से भरोसा जताया है।

पांचवीं विधानसभा में महिलाओं की स्थिति
झारखंड की पांचवीं विधानसभा में कुल 12 महिला विधायक थीं। इनमें भाजपा की तीन, कांग्रेस और झामुमो की चार-चार और आजसू की एक महिला विधायक शामिल थीं। भाजपा की तरफ से पुष्पा देवी, अपर्णा सेनगुप्ता और नीरा यादव थीं, तो कांग्रेस की तरफ से अंबा प्रसाद, दीपिका पांडेय सिंह, शिल्पी नेहा तिर्की और पूर्णिमा नीरज सिंह थीं। झामुमो की महिला विधायकों में बेबी देवी, सबिता महतो, जोबा मांझी और सीता सोरेन शामिल थीं। इनमें जोबा मांझी सांसद बन गयी हैं, जबकि सीता सोरेन ने झामुमो से इस्तीफा दे दिया है। झामुमो की कल्पना सोरेन गांडेय उपचुनाव जीत कर विधायक बनी थीं। आजसू की सुनीता चौधरी भी विधायक थीं।

झारखंड की महिला नेतृत्व का इतिहास
झारखंड के आदिवासी समुदायों में लड़कियों के जन्म को गोहार भरने के साथ जोड़ा जाता है। लड़कियां ‘सयानी बेटी’ के रूप में घर, परिवार और समाज में स्वीकार की जाती हैं। कन्या भ्रूण हत्या यहां न के बराबर है। अत: आदिवासी क्षेत्रों में लड़कियों की सघन उपस्थिति देखी जाती है। आदिवासी स्त्रियों की नेतृत्व क्षमता को सिनगीदई से लेकर दयामनी बारला तक साफ तौर पर देखा जा सकता है। विद्रोहों और आंदोलनों में महिलाएं बढ़-चढ़ कर भाग लेती थीं। तिलका मांझी की अगुवाई में चले विद्रोह में फूलमनी मझिआइन ने भी अंग्रेजी सभा का मुकाबला किया। 1831 ई. के कोल विद्रोह के समय सिंगराय बहनों ने अपनी निडरता का परिचय दिया। 30 जून 1855 को भोगनाडीह में सिदो-कान्हू, चांद-भैरव, के नेतृत्व में हूल (विद्रोह) का आगाज किया गया था। संथाल हूल के समय सिदो-कान्हू, चांद-भैरव की दो बहनों ने फूलो और झानो ने आंदोलनकारियों और विद्रोहियों के हौसला को बनाये रखा। बिरसा मुंडा के उलगुलान में महिलाएं भी शामिल थीं।
बिरसा मुंडा की दो महिला अंगरक्षक भी थीं। 1930 के नमक सत्याग्रह के समय खूंटी के टाना भगतों की सभा में आधी संख्या स्त्रियों की थी। झारखंड आंदोलन में भी महिला नेत्रियों ने बढ़-चढ़ कर भाग लिया। इसके अलावा कई जनांदोलनों में भी महिलाओं ने अहम भूमिका निभायी है।

झारखंड बनने के बाद चुनाव में महिलाओं की स्थिति
वैसे झारखंड में महिलाओं का राजनीतिक प्रतिनिधित्व 2000 में राज्य के अस्तित्व में आने के बाद से लगातार बढ़ रहा है। राज्य की विधानसभा में महिला विधायकों का अनुपात 2000 में पांच फीसदी से दोगुना होकर 2014 में 10 फीसदी हो गया। राज्य के गठन के बाद से राज्य की विधानसभा में चुनाव लड़ने वाली महिलाओं की संख्या में 50 फीसदी की वृद्धि देखी गयी है। विधानसभा में अधिक महिलाएं चुनी जा रही हैं। झारखंड में 75 फीसदी महिला विधायक आदिवासी समुदाय से हैं। यह राज्य के गठन के शुरूआती वर्षों के मुकाबले 33 फीसदी अधिक है। झारखंड में विधानसभा में चुनी गयी महिलाओं की संख्या में भी लगातार वृद्धि देखी हुई है। 2000 में राज्य की पहली विधानसभा में चार महिला विधायक थीं। 2005 में जब नये राज्य में पहली बार विधानसभा के चुनाव हुए, तब केवल तीन महिलाएं चुनी गयीं। हालांकि, 2009 में अगले चुनाव में महिला विधायकों की संख्या बढ़कर आठ हो गयी, जो 2014 के चुनावों में भी जारी रही। 2019 के चुनाव में तो 12 महिलाएं चुनाव जीत कर विधायक बनीं।

झारखंड में होने वाले चुनावों में ज्यादा महिलाएं चुनाव लड़ रही हैं। 2005 में पहले चुनाव और 2019 में आखिरी चुनाव के बीच महिला उम्मीदवारों की संख्या में 50 फीसदी की वृद्धि हुई। कुल उम्मीदवारों में महिला उम्मीदवारों का अनुपात भी 2005 में पांच फीसदी से बढ़कर 2019 में 12 फीसदी हो गया। यह महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसी अवधि में झारखंड में पुरुष उम्मीदवारों की संख्या में 20 फीसदी की कमी आयी है।

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