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    Home»विशेष»सारंडा से जुड़ा है झारखंड का आर्थिक और सामाजिक विकास
    विशेष

    सारंडा से जुड़ा है झारखंड का आर्थिक और सामाजिक विकास

    shivam kumarBy shivam kumarOctober 15, 2025No Comments9 Mins Read
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    पूरे क्षेत्र को अभयारण्य घोषित करने से राज्य को हो सकता था बड़ा नुकसान
    314 वर्ग किलोमीटर पर अभयारण्य घोषित कर हेमंत सरकार ने निकाला बीच का रास्ता
    सियासी रूप से भी हेमंत सोरेन सरकार ने एक बार फिर मार ली बाजी
    नमस्कार। आजाद सिपाही विशेष में आपका स्वागत है। मैं हूं राकेश सिंह।
    सारंडा को वन्य जीव अभयारण्य घोषित करने के मुद्दे पर झारखंड सरकार को बड़ी राहत मिली है। सुप्रीम कोर्ट ने ने सारंडा के 31,468.25 हेक्टेयर क्षेत्र को अभयारण्य घोषित करने की अनुमति दे दी है, जो झारखंड सरकार पहले से कहती रही है। इस तरह देखा जाये, तो झारखंड की हेमंत सोरेन सरकार का इस मामले पर उठाया गया स्टैंड सुप्रीम कोर्ट में सही साबित हो गया है। अब राज्य कैबिनेट ने सारंडा के 314 वर्ग किमी क्षेत्र को अभयारण्य और एक वर्ग किमी को संवेदनशील इलाका घोषित करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। दरअसल, सारंडा को वन्य जीव अभयारण्य घोषित करने का यह मामला झारखंड के आर्थिक और सामाजिक विकास से जुड़ा हुआ है। सारंडा इलाके में दुनिया का सर्वश्रेष्ठ गुणवत्ता का लौह अयस्क पाया जाता है और झारखंड की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा इस खनिज की रॉयल्टी से पूरा होता है। सारंडा की लौह अयस्क की खदानों पर दुनिया भर की निगाहें लगी हुई हैं। यदि पूरा सारंडा को वन्य जीव अभयारण्य घोषित कर दिया जाता है, तो इलाके में खनन कार्य बंद हो जायेंगे और लौह अयस्क का उत्पादन पूरी तरह बंद हो जायेगा। इतना ही नहीं, सारंडा इलाके में रहनेवाले करीब 66 गांवों के लोगों का जीवन भी कई तरह की समस्याओं से घिर जायेगा, क्योंकि उनकी आजीविका इसी जंगल से चलती है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने झारखंड के हितों की रक्षा की है और सारंडा के एक हिस्से को वन्य जीव अभयारण्य घोषित करने की अनुमति दे दी है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने झारखंड के विकास को ध्यान में रखा है। क्या है सारंडा वन्य जीव अभयारण्य का पूरा विवाद और क्या हैं इसके नफा-नुकसान, बता रहे हैं आजाद सिपाही के संपादक राकेश सिंह।

    झारखंड की हेमंत सोरेन सरकार ने एक बार फिर साबित किया है कि उसका फैसला राज्य के हितों को ध्यान में रख कर होता है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा सारंडा को वन्य जीव अभयारण्य घोषित करने के मामले में दिया गया फैसला झारखंड सरकार के फैसले पर मुहर लगाता है। सारंडा को वन्य जीव अभयारण्य घोषित करने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि इस इलाके के 31468.25 हेक्टेयर क्षेत्र को वन्य जीव अभयारण्य घोषित किया जा सकता है। हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया है कि सेल और अन्य वैध माइनिंग लीज वाले इलाकों को अभयारण्य के प्रभाव क्षेत्र से बाहर रखा जायेगा। झारखंड सरकार ने अदालत में जो शपथ पत्र दिया है, उसमें उसने कहा है कि वह सारंडा के 31468.25 हेक्टेयर क्षेत्र को अभयारण्य घोषित करने के लिए तैयार है। हेमंत सोरेन सरकार ने मंत्रियों के समूह की सिफारिश पर 314 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को अभयारण्य घोषित कर दिया है और एक वर्ग किमी को संवेदनशील क्षेत्र बनाया गया है। हेमंत सोरेन सरकार का यह बीच का रास्ता उसकी सियासी समझदारी का प्रतीक है।

    पूरा मामला राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) से जुड़ा हुआ है
    यह पूरा मामला राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) से जुड़ा हुआ है। एनजीटी ने 12 जुलाई, 2022 को एक आदेश दिया था, जिसमें कहा गया था कि सारंडा को वन्य जीव अभयारण्य घोषित किया जाये। एनजीटी ने सारंडा के चार सौ वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को ही अभयारण्य बनाने का निर्देश दिया था। जब राज्य सरकार की ओर से इस निर्देश का पालन नहीं किया गया, तब मामला सुप्रीम कोर्ट में चला गया। मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को हलफनामा दायर करने को कहा। इसके बाद 29 अप्रैल को सरकार की ओर से हलफनामा दायर किया गया।

    झारखंड सरकार की दलील
    झारखंड सरकार ने हलफनामे में वन एवं पर्यावरण विभाग द्वारा खान-भूतत्व और उद्योग विभाग से मंतव्यों को उद्धृत किया था। दोनों विभाग पूरे वन क्षेत्र को अभयारण्य घोषित करने के पक्ष में नहीं थे। इन विभागों का कहना था कि पूरे वन क्षेत्र को अभयारण्य बनाना राज्य के लिए नुकसानदेह होगा। बाद में झारखंड सरकार के वित्त विभाग ने भी इन दोनों विभागों की राय पर सहमति जतायी। उसने कहा कि ऐसा होने से खनन रॉयल्टी की संभावना भविष्य में और जटिल हो जायेगी। हलफनामा में बताया गया कि राज्य सरकार ने 31468.25 हेक्टेयर के एनजीटी के मूल प्रस्ताव की जगह 57519.41 हेक्टेयर क्षेत्र को वन्य जीव अभयारण्य के रूप में अधिसूचित करने का प्रस्ताव किया है। 13.06 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को ससांगदाबुरु संरक्षित रिजर्व क्षेत्र के रूप में अधिसूचित करने का प्रस्ताव है।

    उलझ गया मामला
    यह मामला उस समय झारखंड सरकार के खिलाफ चला गया, जब वन विभाग के सचिव ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर किया। वह हलफनामा पूर्व प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्य प्राणी) सत्यजीत कुमार की ओर से तैयार प्रस्ताव था। पूर्व पीसीसीएफ द्वारा तैयार प्रस्ताव में कहा गया था कि पांच सौ वर्ग किलोमीटर को अभयारण्य घोषित किया जायेगा, जबकि एनजीटी ने केवल चार सौ वर्ग किलोमीटर को ही अभयारण्य बनाने को निर्देश दिया था। पूर्व पीसीसीएफ ने अपने इस प्रस्ताव को लेकर न तो सरकार से कोई मंतव्य लिया और न ही विभागीय सचिव को जानकारी दी। जब सरकार को इस बात की जानकारी हुई, तो खान विभाग ने आपत्ति दर्ज करते हुए कहा कि ऐसा करने से सारंडा क्षेत्र में चल रही लौह अयस्क परियोजनाएं प्रभावित हो जायेंगी। पूरे क्षेत्र में 90 से अधिक लौह अयस्क खदान हैं। इनमें करीब चार बिलियन टन का रिजर्व भी है। यहीं से यह मामला सरकार के खिलाफ चला गया।

    राज्य सरकार हुई एक्टिव
    जब मामला सरकार के खिलाफ चला गया और सुप्रीम कोर्ट ने भी कड़ी टिप्पणी की, तब सरकार ने पांच सदस्यीय मंत्रियों के समूह का गठन किया। इसकी अध्यक्षता वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने की। अन्य मंत्रियों में दीपिका पांडेय सिंह, संजय प्रसाद यादव, सुदिव्य कुमार सोनू और दीपक बिरुआ शामिल थे। इस टीम ने ग्रामीणों से बातचीत कर सरकार को जो रिपोर्ट सौंपी, उसमें साफ कहा गया कि पूरे सारंडा को वन्य जीव अभयारण्य घोषित करने से झारखंड के सामाजिक और आर्थिक हितों को नुकसान पहुंचेगा। इस समूह ने सारंडा इलाके में अवस्थित करीब 66 गांवों के लोगों से बातचीत की, जिन्होंने एक स्वर से वन्य जीव अभयारण्य बनाये जाने का विरोध किया। ग्रामीणों ने कहा कि उनकी आजीविका ही इस जंगल से चलती है और इसे यदि आरक्षित कर दिया गया, तो वे कहां जायेंगे।

    झारखंड को 14 लाख करोड़ का नुकसान
    खान विभाग ने कहा है कि सारंडा वन क्षेत्र के करीब 26 फीसदी हिस्से में लौह अयस्क का भंडार है। यहां करीब 4700 मिलियन टन लौह अयस्क है, जिसकी कीमत 25 से 30 लाख करोड़ रुपये आंकी गयी है। इससे राज्य सरकार को करीब 14 लाख करोड़ रुपये की रॉयल्टी मिल सकती है। यदि इस क्षेत्र को अभयारण्य घोषित किया जाता है, तो खनन कार्य रुक जायेंगे। इससे खनिज की उपलब्धता पर असर पड़ेगा। राज्य में सालाना करीब 20 मिलियन टन लौह अयस्क का उत्पादन होता है। अभयारण्य घोषित होने से उत्पादन घटेगा। रॉयल्टी, सेस ओर डीएमएफटी के लिए होने वाले संग्रह में सालाना पांच से आठ हजार करोड़ रुपये का नुकसान होगा।

    उद्योग विभाग ने भी जतायी आपत्ति
    उद्योग विभाग ने अपनी आपत्ति में कहा कि पूरे वन क्षेत्र को अभयारण्य घोषित करने से वर्ष 2030-31 तक तीन सौ मिलियन टन कच्चे इस्पात उत्पादन के लक्ष्य को पूरा करने में परेशानी होगी। सारंडा के लौह अयस्क भंडार से टाटा स्टील, सेल और निजी खनन कंपनियां चल रही हैं। इस क्षेत्र के खान एवं उद्योग से करीब 4.20 लाख लोगों को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिला है। इलाके में दो हजार एमएसएमइ इकाइयां भी हैं। ऐसे प्रस्ताव से औद्योगिक विकास, राजस्व और रोजगार पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। यहां से होने वाला 44 सौ करोड़ रुपये का निर्यात भी प्रभावित होगा।

    क्या कहा वित्त विभाग ने
    इन दोनों विभागों की राय जानने के बाद वित्त विभाग ने लिखा कि मुख्य सचिव की अध्यक्षता में सभी संबंधित विभागों के साथ बैठक की गयी। बैठक में खान एवं भूतत्व विभाग और उद्योग विभाग ने आपत्तियां दर्ज की हैं। खान एवं भूतत्व विभाग ने धारण क्षमता के अध्ययन पर भारत सरकार द्वारा निर्धारित लक्ष्य का विरोध किया है। इससे आजीविका पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। वित्त विभाग ने अपने मंतव्य में लिखा है कि तैयार प्रस्ताव स्वीकृत होने से खनन विभाग द्वारा संभावित खनन रॉयल्टी की संभावना भविष्य में और भी जटिल हो जायेगी। इस क्षेत्र में खनन कार्य नहीं होने से राजस्व प्राप्ति की संभावना पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा।

    क्या कहा राजनीतिक दलों ने
    सारंडा के मुद्दे पर इतना शोरगुल स्वाभाविक तौर पर सियासी हलकों में भी गूंजता रहा। सत्ताधारी झामुमो और सहयोगी दलों ने जहां सारंडा पर सरकार के फैसले का समर्थन किया, वहीं विरोधी दलों ने इसे लेकर सरकार को घेरा। वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने तो कह दिया कि ओड़िशा की इस्पात लॉबी ने यह पूरा विवाद खड़ा किया है। झामुमो ने कहा कि दुनिया के सबसे बड़े साल के जंगल की रक्षा की जानी चाहिए और साथ ही जंगल में रहने वाले आदिवासी समुदायों के हितों की भी रक्षा की जानी चाहिए। सारंडा में वन्य जीव अभयारण्य स्थापित करने और जन भावनाओं को ध्यान में रखने का निर्णय सरकार का है और कोई अन्य यह निर्णय नहीं ले सकता। पर्यावरण संरक्षण के लिए काम करनेवाले जदयू विधायक सरयू राय ने भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर प्रसन्नता जतायी।

    सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अब झारखंड सरकार ने राहत की सांस ली है। सारंडा के एक इलाके को वन्य जीव अभयारण्य घोषित किये जाने में कोई नुकसान नहीं है, लेकिन यह ध्यान रखना होगा कि इससे राज्य के आर्थिक और सामाजिक हितों पर चोट नहीं पहुंचे।

    सारंडा को वन्य प्राणी अभयारण्य बनाने के खिलाफ आदिवासियों ने निकाली जन आक्रोश रैली
    आदिवासी संगठनों ने कहा कि सारंडा जंगल को किसी भी कीमत पर वन्य प्राणी अभयारण्य घोषित नहीं होने दिया जायेगा। उनका कहना है कि सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक दृष्टिकोण से सारण्डा जंगल से हमारा अटूट सम्बंध है। इसी जंगल में हमारे तमाम देवस्थल, सरना, देशाउली, ससनदिरी, मसना आदि अवस्थित है। जिनसे हमारी विशिष्ट सामाजिक पहचान और अस्तित्व सुनिश्चित होती है।

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