सीएम रघुवर दास के झमाडा (झारखंड खनिज क्षेत्र विकास प्राधिकार) को नगर निगम में विलय करने और उम्रदराज कर्मियों को वीआरएस देने के प्रस्ताव पर धनबाद में बवाल मचा हुआ है. सीएम के प्रस्ताव पर माडा कर्मचारियों में भारी आक्रोश है. झारखंड में एक समय के सबसे मालामाल प्राधिकार में शुमार झमाडा, आज पूरी तरह से कंगाल हो गया है. आय की तुलना में खर्च अधिक होने के कारण आर्थिक बदहाली ऐसी है कि माडा कर्मचारियों का 40 माह से वेतन लंबित है. अब तो यहां के 12 सौ कर्मचारी सरकार से वेतन नहीं बल्कि वीआरएस की मांग कर रहे हैं.
सन् 1915 में ब्रिटिश काल में स्थापित झरिया वॉटर बोर्ड 1986 में माडा बनी और 2011 से झामाडा बन गई. लेकिन पिछले एक दशक से झामाडा की माली हालत लगातार खराब होती रही और सरकार ने इसे बचाने के बजाय धीरे-धीरे इसके आमदनी के स्रोत कम कर दिए. कोयला सेस और रॉयल्टी बंद होने के बाद इसके पास सिर्फ ‘जल कर’ ही कमाई का जरिया बचा है. झामाडा कर्मी 2014 से ही ‘जल कर’ दर बढ़ाने की मांग कर रहे हैं. लेकिन सरकार ने इस पर निर्णय नहीं लिया है.इधर माडा की आर्थिक स्थिति इतनी खराब है कि कर्मचारी अब नौकरी से मुक्ति के लिए वीआरएस की मांग कर रहे हैं. लेकिन शर्त ये है कि सरकार छठे और सांतवे वेतन मान के साथ सभी तरह का भुगतान करे. मालूम हो कि धनबाद झामाडा की वर्तमान आमदनी 25 करोड़ सालाना है जबकि खर्च 50 करोड़ वार्षिक है. नतीजा आय व्यय के भारी अंतर के कारण प्रति माह कर्मियों को वेतन नहीं मिल पा रहा है. नतीजा समय से पहले बूढ़े और बीमार हो चुके सैकड़ों झमाडाकर्मियों की असामयिक मौत हो चुकी है.
दिलचस्प बात ये है की सरकार ने झमाड़ा को नगर निगम में समायोजन कर इसकी हालत सुधारने के लिए 2012 में एक्ट भी पास किया था. लेकिन बाद में इसे अमल में लाने से मना कर दिया. आश्चर्य की बात है कि झमाडा कर्मियों को भले ही प्रतिमाह वेतन नहीं मिलता है, लेकिन झमाड़ा एमडी का वेतन एवं अन्य सुविधाएं हमेशा मिलती हैं.