चुनाव प्रचार में मोदी-शाह-राजनाथ-गडकरी और स्मृति का सामना कौन करेगा, पता नहीं
प्रचार में व्यक्तित्व संकट से जूझ रहा है विपक्ष
भाजपा की टॉप टू बॉटम टीम झारखंड के चुनावी रण में उतर चुकी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र से लेकर अमित शाह तक कांग्रेस के ऊपर बाउंसर पर बाउंसर फेंक रहे हैं। विपक्ष के पास ऐसी बड़ी शख्सियतें नहीं दिख रहीं, जो इन्हें प्रचार युद्ध में बराबर जवाब दे सके। झारखंड में विधानसभा चुनाव के अब तक प्रचार पर एक नजर डालें, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि भारतीय जनता पार्टी के आगे विपक्षी खेमा तन कर खड़ा नहीं हो पाया है। नेता प्रतिपक्ष हेमंत सोरेन के कंधे पर जहां झामुमो की नैया को पार कराने की जिम्मेदारी है और वह इसका प्रयास भी कर रहे हैं, लेकिन अकेले वह कैसे भाजपा के दो दर्जन नेताओं के हमलों का जवाब दे पायेंगे? जहां तक दिशोम गुरु शिबू सोरेन का सवाल है, तो वह सिर्फ नाम के लिए प्रचार अभियान में लगेंगे। उम्मीद जतायी जा रही है कि वह संथाल परगना की कुछ सीटों पर अपनी उपस्थिति दर्ज करायेंगे, जबकि झामुमो के दूसरे नेताओं का कद उतना बड़ा नहीं है कि वे मतदाताओं के ऊपर अपना प्रभाव छोड़ सकें। वे सभी के सभी हेमंत सोरेन पर आश्रित हो गये हैं।
भाजपा के शीर्ष नेता आ गये हैं मैदान में
भाजपा की सक्रियता का आलम यह है कि पार्टी के ब्रह्मास्त्र प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री सह पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह, कार्यकारी अध्यक्ष जेपी नड्डा, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी और रवि किशन जैसे स्टार प्रचारक प्रथम चरण में ही चुनाव प्रचार में विपक्ष और खासकर कांग्रेस पर बाउंसर फेंक चुके हैं। इन स्टार प्रचारकों ने प्रथम चरण की सभी सीटों उपस्थिति दर्ज करा दी है। ऐसा नहीं है कि सिर्फ प्रचार में ही भाजपा के स्टार प्रचारकों का जमावड़ा लगा है, बल्कि इसकी तैयारी तो चुनाव के पहले ही शुरू हो गयी थी, जब पार्टी के नेताओं ने डेढ़ माह में तीन बार अलग-अलग प्रमंडलों में झारखंड का दौरा किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गत 12 सितंबर को एक विशाल रैली की। हालांकि, यह कार्यक्रम सरकारी था, लेकिन झारखंड से पूरे देश को किसान मानधन योजना समेत कई सौगातें देने के स्पष्ट मायने थे। ‘जोहार जन आशीर्वाद यात्रा’ के रथ की कमान मुख्यमंत्री रघुवर दास स्वयं संभाले हुए थे। वहीं, पार्टी के सभी मोर्चा अपने-अपने स्तर से सक्रिय दिखते रहे। बूथ इकाइयों की सक्रियता पर संगठन के स्तर से निगाह रखी जाती रही थी।
समझौते के बावजूद विपक्षी एक मंच पर नहीं
इधर, भाजपा केविपरीत, झारखंड मुक्ति मोर्चा को छोड़कर पूरा विपक्षी खेमा अब तक विधानसभा चुनाव प्रचार में बिखरा-बिखरा दिख रहा है। गठबंधन के दलों ने सीटों पर समझौता तो जरूर कर लिया है, पर अब तक एक मंच पर कभी नहीं दिखे। प्रदेश अध्यक्ष रामेश्वर उरांव भी अपने विधानसभा क्षेत्र में सिमटे हुए हैं। यहां तक कि कांग्रेस के तमाम प्रदेश स्तरीय दिग्गज नेता भी अपने किसी प्रत्याशी के प्रचार के लिए एक मंच पर नहीं जुटे। सभी वरीय नेता अपनी-अपनी सीटों पर सिमटे हैं। इस चुनाव में झारखंड के सभी कद्दावर कांग्रेस नेता खुद चुनाव लड़ रहे हैं। वह चाहे रामेश्वर उरांव हों या ददई दुबे, राजेंद्र सिंह हों या आलमगीर आलम, सभी अपनी-अपनी सीटों पर सिमट चुके हैं। सुबोधकांत सहाय इस चुनाव से अपने को लगभग अलग किये हुए हैं।
जहां तक झारखंड विकास मोर्चा की बात है, तो इस चुनाव में पूरा भार बाबूलाल मरांडी पर है। पार्टी में बाबूलाल मरांडी अकेले स्टार प्रचारक दिखते हैं। प्रदीप यादव और बंधु तिर्की सेकेंड लाइनर ही कहे जा सकते हैं और इनका प्रभाव अपनी सीटों को छोड़ कर कहीं और नहीं है। और ये दोनों भी चुनाव लड़ रहे हैं, लिहाजा पहले उन्हें अपना क्षेत्र देखना है। ऐसे में बाबूलाल मरांडी अकेले ही मोर्चा संभाले हुए हैं। प्रत्याशियों के क्षेत्र में मौका निकाल कर प्रचार करने पहुंच रहे हैं। राजद की क्या कहें, उनके तो प्रमुख नेता ही जेल में हैं। बचे तेजस्वी यादव, तो फिलहाल वह चुनाव प्रचार से गायब हैं। सीटों के गठबंधन को लेकर वह झारखंड जरूर आये, लेकिन इसके बाद से उनका अता-पता नहीं है। पता नहीं वह इन दिनों बिहार में क्या कर रहे हैं, जबकि झारखंड में चुनावी रणभेरी बज चुकी है।
झारखंड में एक और प्रमुख दल आजसू की बात करें, तो पार्टी अपने पूरे दमखम के साथ चुनाव लड़ रही है, यह स्पष्ट दिखता है। प्रत्याशियों के नामांकन से लेकर चुनाव प्रचार तक में पार्टी प्रमुख सुदेश महतो, पार्टी के एकमात्र सांसद चंद्रप्रकाश चौधरी, डोमन सिंह मुंडा, केंद्रीय प्रवक्ता डॉ देवशरण भगत मौजूद दिखते हैं। नामांकन और प्रचार सभा में इन नेताओं को सुनने भीड़ भी आ रही है। पार्टी पूरी मजबूती से अपना कुनबा बढ़ा रही है। अपने एजेंडे पर मजबूती से बात कर रही है। आनेवाले दिनों में विस्तारित आजसू का रंग रूप और आकार बड़ा एवं विशाल होगा, यही संभावना जतायी जा रही है।
सोनिया-राहुल अब तक नहीं आये झारखंड
सोनिया, राहुल और प्रियंका ऐसे चेहरे हैं, जिनसे न सिर्फ कांग्रेस को, बल्कि पूरे विपक्ष को आशा थी। लोकसभा चुनाव की तरह ही इन स्टार प्रचारकों के भरोसे वे अपने पक्ष में एक माहौल बनाने की चाहत रखते थे, जो अब प्रथम चरण के चुनाव में पूरी होती नहीं नजर आ रही। इसी आधार पर कहा जा सकता है कि प्रचार वार में भाजपा ने फिलहाल तो लीड ले रखी है। चुनाव प्रचार में एक ओर भाजपा जहां आक्रामक हो गयी है, वहीं विपक्ष पूरे रक्षात्मक मोड में नजर आ रहा है। इसमें कोई दो राय नहीं कि चुनाव में प्रचार अभियान का बहुत बड़ा महत्व है, और उससे भी बड़ा महत्व हो जाता है दल के सुप्रीमो का प्रत्याशियों की हौसला आफजाई करना। कांग्रेस है कि अब तक दिल्ली से झारखंड की ओर से देख भी नहीं रही है। हां, केंद्रीय नेता के रूप में आरपीएन सिंह का जरूर साथ मिल रहा है, लेकिन वे अकेले कैसे भाजपा के ब्रह्मास्त्र का जवाब दे पायेंगे, यह समय ही बतायेगा।