जमीनी हकीकत से दूर हैं राजनीतिक दल
जीत-हार को लेकर पार्टियां आश्वस्त नहीं
आदिवासी हित के इर्द-गिर्द घूम रहा चुनवी मुद्दा
अंडर करेंट पर भी ध्यान देने की है जरूरत
विधानसभा चुनाव का प्रचार चरम पर है। पहले फेज के लिए 13 नवंबर को वोट डाले जायेंगे। भाजपा, आजसू, झामुमो, कांग्रेस, राजद समेत सभी दल के नेता ताबड़तोड़ रैलियां, जनसंपर्क, रोड-शो आदि करने में लगे हैं। मतदाताओं से वोट देने की अपील कर रहे। सामान्य तौर पर वे अपनी जीत का दावा भी कर रहे हैं। वहीं, अगर राजनीतिक दलों के नेताओं से औपचारिक बातचीत करें, तो एकबारगी जीत को लेकर ये आश्वस्त नहीं दिख रहे। सभी दलों के नेता एड़ी-चोटी का जोर लगाने के बाद भी यह नहीं कह पा रहे कि उनकी पार्टी की जीत सुनिश्चित है। उन्हीं की ही सरकार बनेगी। इसकी मुख्य वजह पार्टियों के बड़े नेताओं का धरातल की हकीकत से दूर होना है। उन्हें सर्वे और अपने लोगों से मिले फीडबैक पर ज्यादा भरोसा है, न कि जमीनी हकीकत से। जबकि जमीनी हकीकत बता रही है कि इस बार का चुनाव बड़ा रोचक होनेवाला है। वैसे जो लोकल नेता हैं, उन्हें यह पता है कि जमीनी हकीकत क्या है और माहौल किसके पक्ष में जाता दिख रहा है। लेकिन आंकड़ों पर भरोसा करने वाले जो नेता हैं, वो जमीनी हकीकत से दूर हैं। वैसे इस चुनाव में कई ऐसी सीटें हैं, जहां उलटफेर की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है। अभी जिस सीट पर जिस दल की जीत सुनिश्चित मानी जा रही, संभव है वहां वे हार जायें और जहां से हार सुनिश्चित लग रही हो, वहां जीत जायें। यह राजनीतिक खेल का हिस्सा रहा है। इसकी मुख्य वजह है मतदाताओं का मन। कुछ मतदाता परंपरागत वोटर हैं, तो कुछ मतदाताओं का चुनाव के समय मन बदलता रहता है। यह जीत-हार का कारण बनेगा। राजनीतिक दलों के जमीनी हालात और मतदाताओं के मन को आजाद सिपाही के विशेष संवाददाता राकेश सिंह ने टटोलने का प्रयास किया है, प्रस्तुत है रिपोर्ट।
जैसे-जैसे झारखंड का विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहा है, यह बड़ा ही रोचक होता जा रहा है। रोज नये-नये समीकरण बनते और बिगड़ते भी दिख रहे हैं। बयानों के तीर भी राजनीतिक मिजाज भांप कर चलाये जा रहे हंै, लेकिन चुनाव के केंद्र में सभी प्रमुख दलों का मुद्दा आदिवासी हित के इर्द-गिर्द ही घूम रहा है। वैसे कई मौकों पर ऐसा भी प्रतीत हो रहा है कि यह विधानसभा चुनाव कुछ अलग कहानी गढ़ने के मूड में है। झारखंड में किसी न किसी की तो सरकार बनेगी, लेकिन किसकी बनेगी, यह अभी तक पहेली बनी हुई है। ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि धीरे-धीरे राजनीतिक पार्टियां खुद पर से भरोसा खोती जा रही हैं। पार्टियां हवा-हवाई बातों पर ज्यादा भरोसा कर रही हैं और जमीनी सच्चाई से दूर भागती नजर आ रही हैं। कोई भी दल खुद को लेकर कॉन्फिडेंट नहीं है। भाषणों की बात अगर छोड़ दें, तो अंतर मन से सरकार बनाने को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं। सभी शह-मात पर आश्रित हैं, मतलब दूसरे की गलती का इंतजार है, जिसे हथियार बना कर वे राजनीतिक बाजी हाथ में लेने को बेताब हैं। भले जनता उन दलों को लेकर कॉन्फिडेंट हो, लेकिन एक अजीब सा डर पार्टियों के अंदर समाया हुआ है कि इस चुनाव में उनका क्या होनेवाला है। पार्टियां सर्वे पर ज्यादा और जमीनी हकीकत पर कम, डिपेंड होती जा रही हैं। ऐसा इसलिए हो रहा है, क्योंकि दलों को किसी भी तरह बस सत्ता हासिल करनी है।
नकारात्मक सोच खुद को डूबोता है:
भाजपा के लोकल नेताओं को तो पता है कि उनकी स्थिति क्या है, लेकिन जो लोग इस चुनाव को टेक्निकल अंदाज में तौल रहे हैं, उनके मन में अभी भी संशय है। यह भाजपा की सेहत के लिए ठीक नहीं है। कभी-कभी अच्छी स्थिति में होते हुए भी नेगेटिव सोच खुद को डूबो डालती है। यह हाल सिर्फ भाजपा के साथ नहीं है। झामुमो भी इससे अछूता नहीं है। इसलिए झामुमो एक अलग रणनिति के हिसाब से काम कर रहा है। झामुमो एक-एक वोट पक्का करने की रणनिति पर काम कर रहा है। वह पॉकेट वोट बैंक को साध रहा है। इसके लिए कई लोग मैदान में काम कर रहे हैं।
भाजपा और झामुमो के बीच दिख रही लड़ाई:
इस विधानसभा चुनाव के दौरान एक बात जो साफ दिखायी पड़ रही है, वह यह कि यहां चुनाव तो कई दल लड़ रहे हैं, लेकिन ऐसा लगता है कि मैदान में झामुमो और भाजपा ही आमने-सामने है। भाजपा की तरफ से बल्लेबाजों की फौज खड़ी है। बाबूलाल मरांडी, हिमंता बिस्वा शर्मा, शिवराज सिंह चौहान, अमित शाह और अब पीएम मोदी अपनी पारी खेलते हुए दिखायी पड़ रहे हैं। वहीं झामुमो का मोर्चा हेमंत सोरेन और उनकी विधायक पत्नी कल्पना सोरेन ने मजूबती के साथ संभाला हुआ है। कहीं से भी वे कम दिखायी नहीं पड़ते। खासकर कल्पना सोरेन की सभाओं में जुट रही भीड़ झामुमो को उत्साहित कर रही है, यानी झारखंड में अच्छी फाइट देखने को मिल रही है।
झामुमो के लिए परफॉरमेंस दोहराने की चुनौती:
झामुमो को 2019 में 30 सीटें आयी थीं। यह उसका अब तक का बेस्ट परफॉरमेंस था। यह परफॉरमेंस तब आया, जब झारखंड में भाजपा के खिलाफ, खासकर पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास के खिलाफ माहौल बन गया था। भाजपा-आजसू ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था। इन सबके बीच झाविमो के भी उम्मीदवार थे। इस बार स्थिति बदली हुई है। मुद्दे बदले हुए हैं। माहौल बदला हुआ है। झामुमो के सामने यह परफॉरमेंस दोहराने की चुनौती है। चुनौती इसलिए कि इस चुनाव में महागठबंधन के उम्मीदवार तीन सीटों पर आमने-सामने हैं। इनमें से दो सीटें छतरपुर और विश्रामपुर पलामू से हैं, जबकि एक सीट राजधनवार है, जहां माले और झामुमो उम्मीदवार आमने-सामने हैं। झामुमो को सरायकेला सीट पर कब्जा बरकरार रखने की बड़ी चुनौती है, क्योंकि वहां उसके एक समय कद्दावर नेता रहे पूर्व सीएम चंपाई सोरेन ने भाजपा का दामन थाम लिया है और चुनाव मैदान में हैं।
कांग्रेस और राजद पूरी तरह झामुमो पर आश्रित
इस चुनाव में कांग्रेस कहां गायब है, पता ही नहीं चल रहा है। कुछ चेहरों को छोड़ दिया जाये तो लगभग इसके ज्यादातर नेता झामुमो के रहमो-करम पर निर्भर हैं। कांग्रेस को इस विधानसभा चुनाव में नुकसान होता भी दीखता है। वह भी अच्छा खासा। राजद का भी वही हाल है। झारखंड में राजद भी पूरी तरह झामुमो पर आश्रित है। कांग्रेस से तो वह दो सीटों पर दो-दो हाथ ही कर रहा है।
हरियाणा में आप जैसा जयराम की पार्टी का दिख रहा रोल:
जयराम महतो की पार्टी जेएलकेएम ठीक वही काम करनेवाली है, जो आम आदमी पार्टी ने हरियाणा चुनाव में किया था। उसका रोल हरियाणा जैसा ही दिखता है। कुछ सीटों पर जयराम की पार्टी भाजपा की सेहत पर प्रभाव डालेगी, तो कई जगहों पर उसे संजीवनी दे रही है।
आजसू की अपनी स्टाइल:
आजसू के काम करने की अलग स्टाइल है। वह अपने ढर्रे पर ही चल रहा है। एनडीए में शामिल होने के बाद मजबूत भी दिखायी पड़ रहा है। सुदेश महतो की अपनी एक स्टाइल है, वह उसी के हिसाब से काम करते हैं। जो सीटें आजसू की मिली हंै, उसमें वह ज्यादा से ज्यादा सीटें कैसे जीत सके, उस रणनीति के हिसाब से काम चल रहा है। सुदेश महतो साइलेंट तरीके से चुनाव प्रचार अभियान में लगे हुए हैं और जमीनी हकीकत को ध्यान में रख कर रणनीति बना रहे हैं।
भाजपा के समर्थक विश्वास से लबरेज
इस विधानसभा चुनाव में भाजपा के समर्थकों में अलग तरह की ऊर्जा दिखायी पड़ रही है। लोकसभा चुनाव में जो उत्साह ठंडा पड़ गया था, वह अब धीरे-धीरे हाइ जोश की की तरफ जा रहा है। इसमें कोई दो राय नहीं कि हिमंता बिस्वा सरमा ने भाजपा के अंदर की अंदरूनी नाराजगी को बहुत हद तक साध लिया है और कई नेताओं को बिछुड़ने से रोक लिया है। आपसी गुटबाजी का मसला भी बहुत हद तक दूर हुआ है। लेकिन भाजपा के नेताओं को यह ध्यान में रखना चाहिए कि सरकार बनाने की लालसा में छोटी-छोटी चूक भी बड़ा खेला कर देती है। सब कुछ आंकड़े नहीं कहते। अंडर करंट को पहचानने के लिए जनता की नब्ज को टोटलना जरूरी है। इसमें कोई दो राय नहीं कि बाहरी-भीतरी का मुद्दा भी इस चुनाव में अंडर करंट प्ले कर रहा है। इस मुद्दे पर पार्टियां भी साइलेंट रूप से काम कर रही हैं। दिखाने के लिए तो मुद्दे कई उछाले जा रहे हैं। उसमें से कुछ मुद्दों ने रंग भी दिखाना शुरू कर दिया है, लेकिन असल मुद्दा कुछ और ही है। आर्थिक लाभ का मुद्दा हमेशा ही प्रभावी होता है। वह चाहे मंईयां सम्मान योजना हो या फिर गोगो दीदी योजना। जनता इन योजनाओं पर किसे चुनती है और भरोसा करती है, यह देखने वाली बात होगी। वैसे भाजपा ने संकल्प पात्र जारी कर दिया है। उस संकल्प पत्र की कुछ घोषणाएं जनता को आकर्षित कर रही हैं। यह भी सही है कि जहां महागठबंधन की नैया को पार लगाने की पूरी जिम्मेदारी हेमंत सोरेन और कल्पना सोरेन पर है, दूसरी तरफ भाजपा की तरफ से ताबड़तोड़ अमित शाह और उसके बाद पीएम मोदी का झारखंड दौरा भाजपा में उत्साह भर रहा है। पीएम मोदी भी इस बार अलग ही अंदाज में दिखायी दे रहे हैं। उन्होंने सरकार पर हमला तो बोला लेकिन हेमंत सोरेन पर तीखा हमला नहीं किया। हां सीता सोरेन वाले मुद्दे पर उन्होंने हेमंत सोरेन को घेरा जरूर। पीएम मोदी एक बात पर बिल्कुल स्पष्ट हैं कि उन्हें आदिवासी अस्मिता का पूरा ध्यान भी रखना है। इसी को ध्यान में रख कर उन्होंने अपना पूरा फोकस कांग्रेस और राजद के क्रियाकलापों पर कर दिया है। आदिवासी अस्मिता को ध्यान में रख कर वह हेमंत सोरेन पर निजी हमले से बच रहे हैं। प्रधानमंत्री को पता है कि महागठबंधन में कमजोर कड़ी कांग्रेस और राजद ही है।
नजदीकी लाभ, हानिकारक होता:
वैसे इस चुनाव में पार्टियों को एक बात पर ध्यान देने की जरूरत है। राजनीति में नजदीकी लाभ बहुत ही हानिकारक होता है। दूरदृष्टि ही किसी राजनीति की बुनियाद होती है। क्षणिक लाभ से पार्टियों को बचना चाहिए। खुद पर भरोसा करना चाहिए। हवा में तैरती सूचनाओं से राजनीति नहीं होती, जमीन की खुशबू और चप्पलों पर लगी धूल ही राजनीतिक दशा और दिशा तय करती है।