वे सहज हैं, सरल हैं और विनम्रता उनमें कूट-कूट कर भरी हुई है। क्षेत्र में इतने लोकप्रिय हैं कि नाला क्षेत्र की जनता ने उन्हें तीन बार विजयी बना कर झारखंड विधानसभा भेजा है। हम जिनकी बात कर रहे हैं, वे विधानसभा अध्यक्ष रवींद्रनाथ महतो हैं। जामताड़ा के मोहजोरी के खमार गांव में 12 जनवरी 1960 को जन्मे रवींद्रनाथ महतो साहित्यिक अभिरुचि के व्यक्ति हैं। समय मिलने पर वे प्रेमचंद और शरतचंद्र जैसे साहित्यकारों की रचनाएं पढ़ते हैं। श्री महतो से उनके कांके रोड स्थित आवास पर दयानंद राय ने लंंबी बातचीत की। प्रस्तुत है उस बातचीत के संपादित अंश।

सवाल : बाबूलाल मरांडी के दल-बदल का मामला आपके न्यायाधिकरण में लंबित है। इस मामले में फैसला कब आयेगा?
जवाब : बाबूलाल मरांडी का मामला न्यायाधिकरण का विषय है। हाइकोर्ट में भी यह मामला विचाराधीन है। ऐसे में इस पर कुछ अधिक कहना उचित नहीं होगा, पर इस मामले में सभी कानूनी पहलुओं पर विचार करने के बाद विधिसम्मत निर्णय लिया जायेगा।
सवाल : ऐसी क्या परिस्थितियां बनीं कि आपको विधानसभा में भाजपा विधायक रणधीर सिंह को मार्शलों से बाहर कराने का निर्णय लेना पड़ा?
जवाब : कभी-कभी विधानसभा के सामने यह संकट उत्पन्न होता है। जन प्रतिनिधि जनसमस्याओं को लेकर और अन्य विषयों को लेकर अति उत्साहित हो जाते हैं। उनका अति उत्साहित होना लाजमी है, पर उन्हें ध्यान रखना चाहिए कि उन्हें जो कुछ भी कहना है या करना है, वह संसदीय आचरण के अनुरूप करना है। संसदीय आचरण पहले से ही परिभाषित है। जब आसन को लगता है कि संसदीय आचरण के प्रतिकूल कुछ हो रहा है, तो आसन को कठोर निर्णय लेना पड़ता है। इसी क्रम में ऐसा कदम उठाना पड़ा।
सवाल : नाला क्षेत्र की जनता ने आपको तीन दफा चुनाव जिता कर विधानसभा में भेजा। क्षेत्र में आपकी लोकप्रियता का राज क्या है?
जवाब : किसी जनप्रतिनिधि की लोकप्रियता जनता की इच्छाओं के अनुरूप काम करने का प्रतिफल है। जबसे मैं राजनीति में आया, तबसे यही कोशिश रही कि जनता के सुख-दुख में भागीदार बनूं, उनकी उम्मीदों और आकांक्षाओं के अनुरूप काम करूं और इसी कोशिश का प्रतिफल जनता के प्यार के रूप में मुझे मिला है। विधानसभाध्यक्ष होने के बावजूद क्षेत्र की जनता से मैं कनेक्ट रहता हूं। जब भी क्षेत्र में रहता हूं, तो पूरा समय उनके लिए ही रहता है। सेवा की भावना मेरे हृदय में है और इसी भावना से मैं काम करता हूं। मैं एक कृषक परिवार से आता हूं और ग्रामीणों की जरूरत से भलीभांति वाकिफ हूं। मेरा मानना है कि यदि आप लोगों की इच्छा के अनुरूप चलना अपनी आदत बना लेंगे, तो लोग आपके साथ रहेंगे। वहीं जिस दिन आप यह सोचने लगेंगे कि लोग आपके अनुरूप चलेंगे, तो दिक्कतें आयेंगी। हमने लोगों के साथ चलने की आदत बनायी है। आगे भी साथ लेकर चलेंगे।
सवाल : राजनीति में आने के पूर्व आपने डॉक्टर बनने के लिए परीक्षाएं दीं, उत्कल यूनिवर्सिटी से बीएड भी किया। क्या शिक्षक न बन पाने का आपको मलाल है?
जवाब : शिक्षक न बन पाने का मलाल है। शिक्षक बनना अच्छी चीज है। बच्चों के बीच रहते और उन्हें पढ़ाते। जो शिक्षक बच्चों को अच्छा पढ़ाते हैं, उन्हें बच्चे कभी भूलते नहीं। उनके प्रति बच्चों का सम्मान हमेशा बना रहता है। यह सम्मान हमलोगों को नहीं मिलेगा इसका मलाल रहेगा। हमलोगों की भी इच्छा थी कि शिक्षक बनें। मेरे परिवार में कई लोग शिक्षक हैं, मेरे पिता भी मिडिल स्कूल के टीचर रहे और अब रिटायर्ड हैं। ऐसे में शिक्षक बनने की इच्छा स्वाभाविक थी पर नियति को कुछ और मंजूर था।
सवाल : आप झारखंड आंदोलनकारी भी रहे हैं और आपने झारखंड अलग राज्य के आंदोलन को करीब से देखा है। आखिर झारखंड अलग राज्य आंदोलन की जरूरत एकीकृत बिहार में क्यों पड़ी। अब राज्य बने 20 साल हो चुके हैं, क्या लोगों की आकांक्षाएं पूरी हो पायी हैं?
जवाब : एकीकृत बिहार मेें हमने देखा कि संथाल परगना और छोटानागपुर में बसे तमाम लोगों का शोषण हो रहा था। हम महसूस कर रहे थे कि हमारे साथ सौतेला व्यवहार हो रहा है। विकास की रफ्तार मंद थी और ऐसा लगता था कि संथाल परगना और छोटानागपुर का हिस्सा उपनिवेश है। इसी क्रम में दिशोम गुरु शिबू सोरेन के नेतृत्व में अलग झारखंड राज्य का आंदोलन शुरू हुआ। उस आंदोलन में मैं भी कूद पड़ा। आंदोलन के दौरान कई बार मुझे जेल भी जाना पड़ा। कई आंदोलनकारियों ने इसमें अपनी शहादत भी दी। झारखंडी लोगों की आकांक्षाओं के अनुरुप नये झारखंड का गठन करने के लिए झारखंड आंदोेलन हुआ और वह नया झारखंड बनाने का प्रयास जारी है। जिस आंदोलन के गर्भ से इस राज्य का जन्म हुआ। अभी जिस नेतृत्व के हाथ में इस राज्य की बागडोर है, उन्हें झारखंड के लोगों के दुख-दर्द की जानकारी है। आनेवाले समय में दिखेगा कि जिस वजह से अलग झारखंड राज्य बना वह चाहत पूरी होने जा रही है।
सवाल : 7 जनवरी को बतौर विधानसभाध्यक्ष आपके कार्यकाल के एक साल पूरे हो जायेंगे। इस कार्यकाल की उपलब्धियां क्या हैं
जवाब : विधानसभाध्यक्ष के रूप में मेरी उपलब्धियां लोगों के सामने हैं। एक साल के भीतर विधानसभा का जो शिड्यूल्ड वर्क है उसका निर्वाह करना। बजट पास करना तथा बजट मेें स्वस्थ चर्चा कराना। चर्चा के दौरान पक्ष और विपक्ष को भागीदारी दिलाना, यही तो मेरी उपलब्धि है। विधानसभाध्यक्ष के रूप में एक साल के दौरान जन मुद्दों पर गहन चर्चा हुई और मैं समझता हूं कि मैंने अपने दायित्व का शत-प्रतिशत निर्वाह किया है।
सवाल : आप एक कृषक परिवार से आते हैं, आपके पिता भी शिक्षक हैं। क्या आपने सोचा था कि कभी विधायक और विधानसभाध्यक्ष बनेंगे?
जवाब : जब पढ़ाई पूरी करने के बाद मैं अलग झारखंड राज्य के आंदोलन में कूदा था तो कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि विधायक या विधानसभाध्यक्ष बनूंगा। बस यही सोचा था कि जनता की आवाज बनूंगा और उनके दुख-दर्द को कम करने की कोशिश करूंगा। यह जनता का आशीर्वाद ही है जिसने पहले मुझे विधायक और फिर विधानसभाध्यक्ष बनाया। अब जनता ने मुझे जो जिम्मेवारी दी है, उसका बखूबी निर्वाह करूं यही मेरी तमन्ना है।

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