रणनीति : विश्वनाथ कॉरिडोर के उद्घाटन से होगा सियासी जयघोष
अपने दूसरे कार्यकाल के सफर के मध्य में पहुंच कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सोमवार को वाराणसी में विश्वनाथ कॉरिडोर का उद्घाटन कर देश के सांस्कृतिक पुनर्जागरण का पहला पड़ाव तय करेंगे और इसके साथ ही वह अपनी पार्टी के विराट संकल्प को पूरा करने की दिशा में एक और मजबूत कदम बढ़ायेंगे। विश्वनाथ कॉरिडोर दुनिया की प्राचीनतम नगरी काशी को दुनिया के धार्मिक नक्शे पर फिर से स्थापित तो करेगा ही, इससे यूपी में अगले चार महीने में होनेवाले विधानसभा चुनाव में नया सियासी समीकरण भी सधेगा। पीएम मोदी के इस कार्यक्रम का सियासी मतलब चाहे कुछ भी निकाला जाये और कुछ भी असर हो, इतना तय है कि विश्वनाथ की इस नगरी के सांस्कृतिक रूपांतरण का श्रेय भारत के इस सर्वाधिक लोकप्रिय प्रधानमंत्री के माथे पर ही सजेगा। विश्वनाथ कॉरिडोर का उद्घाटन केवल एक धार्मिक-सांस्कृतिक परियोजना का उद्घाटन नहीं है, बल्कि यह भारत को एक सूत्र में पिरोने की दिशा में उठाया जानेवाला कदम भी होगा। यह भारत को एक सूत्र में पिरोनेवाली उस अदृश्य शक्ति का प्रतीक भी होगा, जिसे ईश्वर कहा जाता है। वही ईश्वर, जिसके अस्तित्व को नकारते हुए स्टीफन हॉकिंग ने बड़ी-बड़ी बातें की थीं, लेकिन बाद में उसकी मौजूदगी को अपने वैज्ञानिक दलीलों से साबित भी उन्हें ही करना पड़ा। अयोध्या में श्री राम मंदिर के शिलान्यास समारोह से लेकर वाराणसी के विश्वनाथ कॉरिडोर के उद्घाटन तक के सामाजिक और राजनीतिक पहलुओं पर नजर डालती आजाद सिपाही के विशेष संवाददाता राकेश सिंह की खास रिपोर्ट।
वह 2014 का दिन था, जब 16वीं लोकसभा के लिए होनेवाले चुनाव से पहले दुनिया की प्राचीनतम नगरी के रूप में विख्यात वाराणसी में नरेंद्र मोदी ने कहा था: न मैं आया हूं और न लाया गया हूं। मुझे तो मां गंगा ने बुलाया है। उस समय मोदी भाजपा के प्रधानमंत्री पद के दावेदार थे, लेकिन ठीक साढ़े सात साल बाद 13 दिसंबर को वह जब उसी वाराणसी में मां गंगा के तट पर विश्वनाथ कॉरिडोर का उद्घाटन कर रहे होंगे, तो उनके साथ 130 करोड़ लोगों का यह देश उस सपने को साकार होते देख रहा होगा, जो पिछले साल पांच अगस्त को अयोध्या में देखा गया था। काशी को मोक्षदायिनी भी कहा जाता है और पीएम मोदी इसे इस विशाल देश में चल रहे सांस्कृतिक पुनर्जागरण के एक पड़ाव का श्रेय भी देंगे।
बाबा विश्वनाथ और सदानीरा गंगा की यह पवित्र नगरी आज भगवा नगरी में रंगी है, तो इसके पीछे की परिकल्पना किसी सियासी धरातल पर नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक एकता पर आधारित है। हालांकि यह अलग बात है कि विश्वनाथ कॉरिडोर के उद्घाटन के इस मौके को सियासत से जोड़ कर देखा जा रहा है, क्योंकि यूपी में अगले कुछ महीनों में चुनाव होने हैं। पीएम मोदी या भाजपा को इससे कोई आपत्ति भी नहीं है, क्योंकि अयोध्या के बाद काशी उसके विराट संकल्प का एक पड़ाव तो है ही। यह भाजपा ही है, जिसने देश के मंदिरों के जीर्णोद्धार के लिए एक होड़ सी पैदा कर दी है। तेलंगाना हो, ओड़िशा हो, छत्तीसगढ़ हो, मध्य प्रदेश या फिर उत्तर प्रदेश, हर जगह मंदिरों के जीर्णोद्धार के लिए तेजी से काम हो रहा है। भाजपा से लेकर कांग्रेस तक और अन्य क्षेत्रीय दलों तक अपने राज्य में प्राचीन मंदिरों का जीर्णोद्धार करके सत्ता की कुर्सी का रास्ता साफ करना चाहते हैं।
यह स्थापित तथ्य है कि भारतीय राजनीति में राजनीतिक पार्टियां चाह कर भी खुद को हिंदुत्व और मंदिरों के मुद्दे से दूर नहीं रख पाती हैं। उन्हें पता है कि देश की बहुसंख्यक आबादी को अगर अपने पाले में लाना है, तो इन मुद्दों को छूना ही पड़ेगा। पहले मंदिर और हिंदुत्व का मुद्दा केवल भाजपा के पाले का माना जाता था, लेकिन अब दूसरे राजनीतिक दल भी इस मुद्दे को अपनाने में कोई परहेज नहीं कर रहे हैं। वह जब प्रधानमंत्री बने, तो उन्होंने बनारस को भारत का क्योटो बनाने का सपना दिखाया और वह सपना अब साकार होने जा रहा है। काशी विश्वनाथ कॉरिडोर उसी सपने का हिस्सा है।
यह केवल सियासी रणनीति नहीं, बल्कि भारत को सांस्कृतिक रूप से एक सूत्र में बांधने का अभियान है, जिसकी शुरूआत भाजपा ने सबसे पहले अयोध्या में भव्य राम मंदिर निर्माण से की, जो अब काशी में बाबा विश्वनाथ कॉरिडोर से होता हुआ मथुरा के श्रीकृष्ण मंदिर के जीर्णोद्धार तक पहुंचने वाला है।
2014 के लोकसभा चुनाव में जब प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेंद्र मोदी ने पूरे देश में चुनाव लड़ने के लिए वाराणसी को चुना, तब से ही भाजपा ने एक मैसेज दे दिया था कि उसकी सरकार किन मुद्दों पर आगे बढ़ेगी। 2019 का लोकसभा चुनाव आते-आते राम मंदिर का मुद्दा भी हल हो गया और अब अयोध्या में भी एक भव्य राम मंदिर का निर्माण हो रहा है। मोदी 2014 में जीते, प्रधानमंत्री बने और उसके बाद 2019 का लोकसभा चुनाव वाराणसी से जीते और उन्होंने वाराणसी को काशी विश्वनाथ कॉरिडोर एक तोहफे की तरह दिया। काशी विश्वनाथ कॉरिडोर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सपना है। इसे एक हजार करोड़ की लागत से बनाया गया है। इसके लिए सरकार ने 5.5 लाख वर्गफीट जमीन का अधिग्रहण किया है।
यहां यह सवाल भी पूछा जा रहा है कि आखिर चुनाव से ठीक पहले मंदिरों के जीर्णोद्धार की परियोजना को पूरा कर भाजपा धर्म को सियासत से जोड़ने पर आतुर क्यों है। इसका उत्तर साफ है। यूपी चुनाव को भाजपा ने 2024 के आम चुनाव का सेमीफाइनल माना है और उसकी तैयारी भी इसी तरह की है। ऐसे में यदि वह विश्वनाथ कॉरिडोर के उद्घाटन के मौके पर 18 राज्यों के मुख्यमंत्रियों को बुला कर इसे एक बड़ा सियासी आयोजन बनाना चाहती है, तो इसमें कुछ बुराई नहीं है। भाजपा को यह दांव इसलिए भी चलना पड़ा है, क्योंकि वह कोई खतरा मोल लेना नहीं चाहती। भाजपा की चिंता इसलिए भी है कि यूपी में ओबीसी मतदाता लोकसभा चुनाव में तो मुख्य रूप से उसको वोट देते हैं, लेकिन विधानसभा चुनाव में वो अलग-अलग जातियों में बंटकर वोट करते हैं। इस आशंका को पूरी तरह निर्मूल करने का रास्ता इसी विश्वनाथ कॉरिडोर से होकर गुजरता है।
आज वाराणसी में पूरे भारत की सांस्कृतिक एकता परिलक्षित हो रही है। भारत की इस एकता को आज बेहद करीब से महसूस किया जा सकता है। आजादी के बाद शायद यह पहला मौका है, जब पूरा देश किसी मुद्दे पर इतनी मजबूती से एक होकर खड़ा है। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक और कच्छ से लेकर कलिंपोंग तक इसे एक बड़े घटनाक्रम के रूप में लिया जा रहा है। विश्वनाथ कॉरिडोर का उद्घाटन इसलिए भी भारत के शानदार धार्मिक और सांस्कृतिक इतिहास का एक सुनहरा अध्याय है, क्योंकि इसने देश के लोगों में उनकी सांस्कृतिक विरासत का एहसास फिर से जगा दिया है। पिछले चार दशकों में भारत के लोग अपने सांस्कृतिक इतिहास से विमुख होने लगे थे, क्योंकि उन्हें लगने लगा था कि इसके सहारे आगे बढ़ने का प्रयास बेकार है। इसलिए यह भारत के लोगों के लिए संकल्प लेने का दिन है। यह संकल्प देश को इसी तरह एकजुट और मजबूत रखने का होना चाहिए।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधनों में इसे रेखांकित भी किया है कि हम जितने ताकतवर होंगे, क्षेत्र में उतनी ही शांति होगी। इसलिए यह दिन भारत के 130 करोड़ लोगों के लिए अपने विवेक पर, अपने संयम पर और अपनी क्षमता पर दोबारा विश्वास करने का होगा, जिससे हमारी आनेवाली पीढ़ियों की नजर में हमारी अहमियत कम नहीं हो। हम विरासत में ऐसा देश छोड़ें, जिसका नागरिक होने पर उन्हें गर्व हो और वे यह कह सकें कि ‘हम उस देश के वासी हैं, जिस देश में गंगा बहती है’।