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    Home»विशेष»2024 के चुनाव का मुद्दा तय कर दिया पीएम मोदी ने
    विशेष

    2024 के चुनाव का मुद्दा तय कर दिया पीएम मोदी ने

    azad sipahiBy azad sipahiAugust 5, 2022No Comments9 Mins Read
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    • भ्रष्टाचार और काले धन पर प्रहार होगा भाजपा का मुख्य हथियार: इस रणनीति के आगे अभी से पस्त दिख रहा है विपक्ष

    हिंदी सिनेमा में पिछले कई दशकों में बहुत कुछ बदल गया है, लेकिन एक चीज नहीं बदली। आज भी कोई फिल्म में जब हीरो विलेन की पिटाई करता है, तो सबसे ज्यादा तालियां उसी पर बजती हैं। लोगों को बड़ी खुशी होती है। उनको मालूम है कि यह सिनेमा है, वास्तविकता नहीं है, लेकिन उनके मन में, उनके अवचेतन में कहीं न कहीं यह बात होती है कि कोई तो है, जो बुराई के खिलाफ लड़ने के लिए तैयार है। अब यही बात भारत की राजनीति में हो, तो अंदाज लगाया जा सकता है कि लोगों की प्रतिक्रिया क्या होगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह बात समझ ली है और वह उसी रास्ते पर लगातार आगे बढ़ रहे हैं। हाल के दिनों में उनके फैसलों के बाद साफ हो गया है कि उन्होंने 2024 के लोकसभा चुनाव का मुद्दा तय कर लिया है और इस पर बड़ी तेजी से काम हो रहा है। यह मुद्दा भ्रष्टाचार और काले धन पर प्रहार है। आजादी के बाद से ही देश में एक धारणा बन गयी थी कि राजनीति में भ्रष्टाचार कोई मुद्दा नहीं है। आम लोगों के मन में एक बात घर कर गयी है कि भ्रष्टाचार पर जो भी नेता बोलते हैं, जो भी कहते हैं, दावा करते हैं, आरोप लगाते हैं, उसका कोई अर्थ नहीं है। महज कोरी भाषणबाजी है, राजनेताओं का पाखंड है। चुनाव के समय एक-दूसरे पर आरोप लगाना, एक-दूसरे के खिलाफ बोलना और उसके बाद चुप्पी। इसलिए भ्रष्टाचार के खिलाफ जो आंदोलन हुए, उनका भी नतीजा बहुत कुछ ऐसा ही हुआ। जेपी आंदोलन इंदिरा गांधी और उनकी सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ था। उसने थोड़े समय के लिए राजनीतिक परिवर्तन किया, लेकिन बाद में सब कुछ पुराने ढर्रे पर लौट गया। फिर वीपी सिंह ने भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान चलाया, लेकिन वह भी कोई बदलाव नहीं ला सका। उसके बाद अन्ना हजारे का आंदोलन भी उसी गति को प्राप्त हो गया। लेकिन अब नरेंद्र मोदी सरकार ने भ्रष्टाचार और काले धन के खिलाफ जो अभियान शुरू किया है, उससे आम लोगों में एक उम्मीद जगी है। उम्मीद की यही लौ भाजपा के ह्यमिशन 2024ह्ण का आधार है, जिसके आगे विपक्ष अभी से ही पस्त दिख रहा है? पीएम मोदी की इसी रणनीति का राजनीतिक विश्लेषण कर रहे हैं आजाद सिपाही के विशेष संवाददाता राकेश सिंह।

    भारत में दो चीजों पर लोगों का ध्यान बहुत जल्दी जाता है। इसमें पहला है राजनीति और दूसरा है चुनाव। हालांकि यह बात भी सोलह आने सच है कि भारत में राजनीति और भ्रष्टाचार-काला धन हमेशा से एक-दूसरे के पर्याय रहे हैं। इस पर बहसें भी होती रही हैं। आंदोलन भी हुए हैं, लेकिन भ्रष्टाचार और काला धन आज भारतीय राजनीति की हकीकत बन चुका है। राजनीति की हकीकत से चुनाव जैसा मुद्दा कैसे मुंह मोड़ सकता है, यह समझनेवाली बात है। भारत के लोगों ने, मतदाताओं ने देखा और समझ लिया है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन से जो बदलाव की बात करते हैं, वे घूम-फिर कर उसी जगह पर पहुंच जाते हैं, जहां से शुरू हुए थे।

    लेकिन पिछले आठ साल में यह धारणा तेजी से बदली है। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व और मार्गदर्शन में दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी भाजपा ने भारत के इस नजरिये को बदला है। चाहे नोटबंदी हो या प्रत्यक्ष सब्सिडी जैसे उपाय, मोदी सरकार ने भारत की शासन प्रणाली में बन आये भ्रष्टाचार रूपी छेदों को बंद करने में गंभीरता दिखायी है। और अब 2024 के चुनाव में भाजपा इसे अपना मुख्य हथियार बनाने जा रही है।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले आठ साल में इस धारणा को बदलने का प्रयास किया है कि यह मुद्दा महज राजनीति के लिए है, धरातल पर कुछ नहीं होता। उनके शासनकाल में जिस तरह से भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान चल रहा है, जिस तरह से कार्रवाई हो रही है, उससे अब लगने लगा है कि यह सरकार भ्रष्टाचार और काले धन के अभिशाप से मुक्ति के लिए गंभीर है। भाजपा की इस रणनीति के आगे विपक्ष पूरी तरह पस्त दिखने लगा है। उसकी पूरी ऊर्जा केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई के खिलाफ आंदोलन में खर्च हो रही है। इससे लोगों को पता चल गया है कि भ्रष्टाचार और कालेधन का असली लाभुक कौन है।

    अब हाल के दिनों में केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई की तरफ लौटते हैं। विभिन्न राज्यों में इडी और सीबीआइ की छापेमारी में एक के बाद एक अलग-अलग राजनीतिक पार्टियों के तमाम विपक्षी नेता एक-एक कर भ्रष्टाचार के मामलों में फंसते जा रहे हैं। कांग्रेस से शुरू करें, तो सोनिया गांधी, राहुल गांधी, रॉबर्ट वाड्रा, एनसीपी के प्रफुल्ल पटेल, आम आदमी पार्टी के सत्येंद्र जैन, मनीष सिसोदिया, सपा के आजम खान और उनकी पत्नी समेत तमाम नेता, बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती, शिवसेना के नेता संजय राउत, टीएमसी के नेता पार्थ चटर्जी समेत कइयों पर शिकंजा कसता जा रहा है। और ये मामले सीधे-सीधे भ्रष्टाचार के हैं। मुख्य विपक्षी पार्टियों में शायद ही कोई पार्टी है, जिनके नेताओं पर भ्रष्टाचार के मामले नहीं हैं या उन पर इडी की रेड या सीबीआइ जांच या फिर जेल जाने की नौबत नहीं आयी है।

    इस वक्त इडी शब्द की गूंज राजनीतिक गलियारों में सबसे अधिक सुनाई पड़ रही है। बंगाल में अभी नोटों की गड्डी देखकर लोगों का मुंह खुला का खुला ही है। मेहनत-मजदूरी करके कैसे भी घर चलाने वाले लोग जब ऐसी तस्वीरें देखते हैं, तो उनके यही रिएक्शन होता है कि अरे बाप रे इतना पैसा। उनके मन में सवाल उठता है कि आखिर इतना पैसा आता कहां से है। आम आदमी ठगा हुआ महसूस करता है। लेकिन राजनितिक व्यक्ति के माथे पर शिकन तक नहीं आती। लेकिन अब आ रही है। क्यों कि ये मोदी राज है। यहां न खाऊंगा न खाने दूंगा वाला हिसाब चलता है। इसके साथ ही इडी की कार्रवाई महाराष्ट्र में जारी है।

    विपक्ष की ओर से यह कहा जा रहा है कि सरकार जानबूझ कर निशाना बना रही है। हालांकि पब्लिक यह भी देख रही है कि ऐसे लोग भी पकड़े जा रहे हैं, जिनके पास अकूत दौलत है। जिन्हे गुमान था अपनी ताकत पर। जीने गुमान था कि उनके एक इशारे पर देश की जनता उनके लिए सड़कों पर उतर आएगी। लेकिन यह मजह उनके खयाली पुलाव थे। नकली गुमान था। चुनाव में मुद्दा कुछ भी हो सकता है, लेकिन लोगों की भावनाएं भी ऐसे मुद्दों से जुड़ी होती हैं। जिस प्रकार से एक के बाद एक छापेमारी हो रही है, उससे इस बात के संकेत तो मिल ही रहे हैं कि आने वाले वक्त में यह चुनावी मुद्दा जरूर बनेगा।

    यही कारण है कि जिस तरह से 2014 में भाजपा ने यूपीए की सरकार पर भ्रष्टाचार का मुद्दा बनाते हुए जनता का दिल जीता था, 10 साल बाद पार्टी सत्ता में रहने के बावजूद विपक्षियों के खिलाफ फिर से एक बार भ्रष्टाचार का मुद्दा जोर-शोर से खड़ा कर रही है। यहां तक कि राजनीतिक गलियारे में अब विपक्षी पार्टियों के नेता दबी जुबान में भी सरकार के खिलाफ बोलने से कतराने लगे हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए भाजपा 2024 के चुनाव में भी विपक्षी पार्टियों के भ्रष्टाचार के मुद्दे को अपना सबसे प्रमुख मुद्दा बनाने जा रही है, हालांकि साथ में जन भावनाओं को देखते हुए बाकी मुद्दों को भी तरजीह दी जायेगी, चाहे वह हिंदुत्व का मुद्दा हो या फिर राम मंदिर का निर्माण, ज्ञानवापी का मुद्दा हो या फिर मथुरा का या फिर अनुच्छेद 370 का कश्मीर से हटाया जाना।

    पार्टी इनमें से कई मुद्दों पर 2019 का चुनाव जीत चुकी है और उसे ऐसा लगता है कि इन्हीं मुद्दों को दोहराये जाने पर अब 2024 में जनता पर कुछ खास असर नहीं पड़ने वाला है। यही वजह है कि पार्टी यू-टर्न लेते हुए वापस भ्रष्टाचार के मुद्दे को हर राज्य में मुख्य मुद्दा बनाती जा रही है। भाजपा इस पर अच्छी-खासी योजना तैयार कर रही है, जिसमें भाजपा के तमाम वरिष्ठ नेताओं के साथ-साथ सांसद और केंद्रीय मंत्री अलग-अलग राज्यों में जाकर विपक्षी पार्टियों के खिलाफ चल रहे भ्रष्टाचार के मुद्दों को जनता तक पहुंचायेंगे। साथ ही साथ इस बात का भी दावा करेंगे कि पिछले आठ सालों में मोदी सरकार का शायद ही कोई ऐसा नेता होगा, जिसके घर से करोड़ों रुपये मिले या जिसके ऊपर भ्रष्टाचार के आरोप लगाये गये। यदि इक्का-दुक्का घटनाएं हुईं भी, तो पार्टी ने जीरो टॉलरेंस अपनाते हुए उसे तुरंत पार्टी के तमाम पदों से और पार्टी से बर्खास्त कर दिया। बावजूद इसके दूसरी पार्टियों ने ऐसे कोई कड़े कदम अपने भ्रष्टाचारी नेताओं पर नहीं उठाये। इन्हीं बातों को पार्टी हर राज्य में मुद्दा बनाने जा रही है।

    एजेंडा अगेंस्ट करप्शन
    वैसे ‘एजेंडा अगेंस्ट करप्शन’ भारतीय जनता पार्टी की शुरू से नीति रही है। उसका यह कोई चुनावी एजेंडा नहीं है, ना ही इडी-सीबीआइ या कोई भी एजेंसी दलगत राजनीति पर काम करती है। हालांकि इस सवाल पर कि आखिर लोकसभा चुनाव के आखिरी दो साल में ही प्रवर्तन निदेशालय इतना ज्यादा सक्रिय क्यों हो गया है, पार्टी का कहना है कि इन बातों को तूल मीडिया में दिया जा रहा है, जबकि प्रवर्तन निदेशालय पिछले आठ वर्षों से ऐसे ही कार्य कर रहा है। लेकिन जब करोड़ों की कमाई किसी के घर से निकलती है, तो वह आम जनता के बीच भी कौतूहल का विषय बन जाती है। ऐसी बातें फिर मीडिया और जनता तक पहुंचना भी लाजिमी है। भाजपा का दावा है कि पार्टी शुरूआत से ही जीरो टॉलरेंस पर काम करती रही है। यही वजह है कि पिछले आठ सालों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार में कोई भी ऐसा बड़ा नेता, चाहे वह भाजपा का हो या एनडीए के गठबंधन की किसी भी पार्टी का हो, किसी भी तरह के भ्रष्टाचार में लिप्त नहीं पाया गया। यह किसी भी सरकार के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। भाजपा की पहचान और ताकत हिंदुत्व है। हिंदुओं की एकजुटता और उनका जगना, भाजपा के लिए बड़ी ताकत का काम करेगी। भाजपा को इसका पूरा-पूरा लाभ मिलेगा इसमें कोई दो राय नहीं है। हिंदुत्व की असली ताकत भी 2024 में दिखाई देगी। अंत-अंत में पीओके का भी मुद्दा अगर तूल पकड़े तो आश्चर्य की बात नहीं होगी।

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